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पानी ही सभ्यता, समृद्दि और सामाजिक समानता और पर्यावरण के कल्याण का है आधार- अर्चना वर्मा

जल की कमी से जल के प्रति मज़बूती तक

– श्रीमती अर्चना वर्मा

पानी हमारी सभ्यता, समृद्धि, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक समानता और पर्यावरण के कल्याण का आधार है। फिर भी, इस पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन बारिश के पैटर्न को बदल रहा है, बाढ़ और सूखे की स्थिति को गंभीर बना रहा है, ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रहा है और अचानक बहुत ज़्यादा बारिश या सूखे जैसी चरम घटनाओं की आवृत्ति में भी इताफा कर रहा है। पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में आई बाढ़, बादल फटने की घटनाओं और भूस्खलन इस बात का संकेत हैं कि पानी से जुड़े जोखिम अब दूर की बात नहीं रह गए हैं।

ऐसे में जब नई दिल्ली 22-26 सितंबर के दौरान “जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन” थीम के तहत 9वें इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक (आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू-2026) की मेज़बानी करने की तैयारी कर रही है, तो सवाल यह नहीं है कि क्या जल प्रणालियों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने की ज़रूरत है। सवाल यह है कि वे कितनी तेज़ी से और कितनी व्यापक रूप से ऐसा कर सकती हैं।

भारत के लिए, विकसित भारत @2047 की यात्रा में जल सुरक्षा एक अहम हिस्सा है। अगर जल संसाधन कमज़ोर, प्रदूषित या खराब तरीके से प्रबंधित रहते हैं, तो समावेशी समृद्धि लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती। इसके लिए एकीकृत प्रबंधन की ज़रूरत है, जलग्रहण क्षेत्र से लेकर उपभोक्ता तक और स्रोत से लेकर सुरक्षित पुनर्पयोग तक।

हमारे सामने चुनौतियां

भारत की जल संबंधी चुनौतियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं। अनियमित बारिश से जल की कमी और विनाशकारी अधिकता दोनों उत्पन्न होती हैं और ऐसी घटनाएं कभी-कभी एक ही क्षेत्र में भी देखने को मिलती है। भूजल का स्तर घटने से कृषि और पेयजल आपूर्ति खतरे में हैं, तीव्र शहरीकरण से जल की मांग बढ़ती है, जबकि पुनर्भरण क्षेत्र कम होते जाते हैं और प्रदूषण से सुरक्षित रूप से उपयोग होने वाले योग्य जल की मात्रा घट जाती है। पुरानी अवसंरचना, प्रतिस्पर्धी मांगें और असमान क्षमता इस दबाव को और बढ़ा देती हैं।

कोई एक उपाय इस चुनौती का समाधान नहीं कर सकता। जल का प्रबंधन जलग्रहण क्षेत्रों, नदियों, जलभंडारों, जलाशयों, खेतों, शहरों, उद्योगों और समुदायों की एक समन्वित प्रणाली के रूप में किया जाना चाहिए। इसके लिए संरक्षण, संवर्धन, दक्षता, अवसंरचना, डेटा, विनियमन और जनभागीदारी को समन्वित करना बेहद ज़रुरी है।

भारत ने यह बदलाव पहले ही शुरू कर दिया है। जल संचय जन भागीदारी: कैच द रेन अभियान में समुदायों को जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और जल निकायों के पुनरुद्धार के केंद्र में रखा गया है। इसका संदेश- बारिश का पानी, जहां है, वहीं संचित करें और जब गिरे, तब संचित करें, यह मानता है कि जब नागरिक, स्थानीय निकाय, किसान और पंचायतें सरकार के साथ मिलकर काम करते हैं, तो जल सुरक्षा और मजबूत होती है।

इस प्रयास में कृषि मुख्य भूमिका निभाती है। पानी का सबसे बड़ा उपभोक्ता होने के नाते, कृषि क्षेत्र सूक्ष्म-सिंचाई, खेत पर बेहतर जल प्रबंधन और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत “हर खेत को पानी” और “हर बूंद पर अधिक फसल” जैसे व्यापक लक्ष्यों के ज़रिए अधिक कुशल और जलवायु-अनुकूल बन सकता है। इसी तरह, भूजल प्रबंधन में वैज्ञानिक मूल्यांकन, भूजल भंडार की समझ, मांग प्रबंधन और समुदाय-आधारित योजना को शामिल किया जा सकता है।

जल के लिए एक नया समझौता

भारत अपनी जल प्रणालियों की सुरक्षा, निगरानी और पारिस्थितिक स्वास्थ्य को भी मजबूत कर रहा है। बांध सुरक्षा अधिनियम, 2021 और बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना खासकर पुराने होते बुनियादी ढांचे, अनियमित जल प्रवाह और चरम मौसम की घटनाओं के बीच, बांधों की सुरक्षा और कार्यक्षमता को बेहतर बनाने के लिए एक संस्थागत और इंजीनियरिंग ढांचा प्रदान करते हैं।

नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट, समय पर और भरोसेमंद जल-संसाधन डेटा और निर्णय लेने में मदद करने वाले टूल्स के ज़रिए जल प्रबंधन के डिजिटल आधार को मज़बूत कर रहा है। बेहतर डेटा से पूर्वानुमान लगाने, जलाशय के संचालन, बाढ़ प्रबंधन और बेसिन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।

बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ नदियों को बहाल करने का काम भी होना चाहिए। ‘नमामि गंगे’ ने प्रदूषण कम करने के काम को गंगा के संरक्षण और पुनरुद्धार से जोड़ा है। हमारी भविष्य की कोशिशों में गंदे पानी के ट्रीटमेंट, इकोलॉजिकल फ्लो, सहायक नदियों, वेटलैंड्स, नॉन-पॉइंट प्रदूषण और नदी के प्राकृतिक कार्यों को बहाल करने पर लगातार ध्यान दिया जा सकता है।

भारत के पास चक्रीय जल अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का भी मौका है। सही गुणवत्तापूर्ण मानकों और सुरक्षा उपायों के साथ, ट्रीट किए गए गंदे पानी का इस्तेमाल उद्योगों, खेती, बागवानी, निर्माण, लैंडस्केपिंग और म्युनिसिपल सेवाओं में पीने के अलावा दूसरे कामों के लिए किया जा सकता है। इससे ताज़े पानी की ज़रुरत पर दबाव कम हो सकता है, शहरों की क्षमता बेहतर हो सकती है और संसाधनों को फिर से हासिल किया जा सकता है।

जल प्रबंधन स्थानीय और प्रोजेक्ट-विशेष कार्यों से आगे बढ़कर, पूरे बेसिन के स्तर पर एकीकृत प्लानिंग की ओर बढ़ सकता है। सतह और भूजल में तालमेल का प्रबंधन, ऊपर और नीचे के इलाकों के बीच सहयोग, आधुनिक अवसंरचना, मांग संबंधी प्रबंधन और बेसिन के बीच सावधानी से किए गए कार्यों से मज़बूती, बराबरी और पर्यावरण की अखंडता को बढ़ावा मिल सकता है।

आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू-2026 से क्या उम्मीदें हैं

आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू -2026 एक अहम समय पर हो रहा है। यह नीतिनिर्माताओं, वैज्ञानिकों, काम करने वालों, नई सोच रखने वालों, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों को एक साथ एक मंच पर लाएगा। इसके लिए अधिवेशनों, देश-स्तरीय फ़ोरम, तकनीकी सत्र, प्रदर्शनी और दूसरी अंतरराष्ट्रीय डब्ल्यूएएसएच कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएंगी। इसके एजेंडे में शहरों में बाढ़, डिजिटल तकनीक, भूजल, नदियों की मज़बूती और जलवायु के अनुसार ढलने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

यह कार्यक्रम साझेदारी, बड़े पैमाने पर लागू होने वाले समाधान और ऐसे वादे करने का मंच बन सकता है, जिन्हें मापा जा सके। तीन नतीजों पर खास ध्यान देने की ज़रूरत है।

पहला, यह हाइड्रोलॉजिकल फोरकास्टिंग यानी पानी से जुड़े पूर्वानुमान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ग्लेशियर झील के फटने से आने वाली बाढ़ की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग, पानी की गुणवत्ता की बेहतर निगरानी और डिजिटल बेसिन मॉडलिंग के ज़िम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा दे सकता है। तकनीक उस वक्त सबसे ज़्यादा काम की होती है, जब वह काबिल संस्थाओं और स्थानीय जानकारी के साथ मिलकर काम करती है।

दूसरा, यह चक्रीय वेस्टवॉटर प्रणाली और पानी के दोबारा इस्तेमाल के व्यावहारिक मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू करने में मदद कर सकता है। इसके लिए सही मानक, भरोसेमंद कामकाज, साफ संस्थागत ज़िम्मेदारी और टिकाऊ फाइनेंसिंग की ज़रूरत होगी। इनके डेमो शहर, औद्योगिक क्लस्टर, खेत और ग्रामीण बस्तियों के लिए ऐसे मॉडल बन सकते हैं, जिन्हें दूसरी जगहों पर भी अपनाया जा सके।

तीसरा, आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू-2026 वैज्ञानिक संस्थाओं, बिज़नेस, सरकारी एजेंसियों और ग्राम पंचायतों के बीच की दूरी को कम कर सकता है। मिश्रित फाइनेंसिंग, नतीजों पर आधारित निवेश, निजी-सार्वजनिक साझेदारी और सामुदायिक स्वामित्व से नवाचार को लैब और पायलट प्रोजेक्ट से निकालकर रोज़मर्रा के कामकाज में शामिल करने में मदद मिल सकती है।

भारत में पानी से जुड़ी चुनौती का कोई एक समाधान नहीं है। कई स्थितियों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर की अहमियत बनी रहेगी, जबकि स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण, एक्विफर को रिचार्ज करना, संरक्षण और व्यवहार में बदलाव भी उतने ही ज़रूरी हैं। कमज़ोर शासन की भरपाई तकनीक से नहीं हो सकती और सामुदायिक भागीदारी बेहतर इंजीनियरिंग की जगह नहीं ले सकती। असल विकास अवसरंचना, संस्थाओं, विज्ञान और जन-भागीदारी को एक साथ लाने में ही है।

जलवायु से जुड़ी चुनौतियां हमारे सामूहिक संकल्प की परीक्षा लेती है। फिर भी, वैज्ञानिक सटीकता, दूरदर्शी नीतियां, जवाबदेह संस्थाएं और समुदायों की सार्थक भागीदारी पानी को कमज़ोरी के स्रोत से बदलकर टिकाऊ समृद्धि का ज़रिया बना सकती हैं। आईआईडब्ल्यूडब्ल्यू-2026 के ज़रिए भारत पूरी दुनिया से अपील करता है कि सब मिलकर सहयोग, नवाचार और साझा प्रयासों से एक ऐसे भविष्य का निर्माण करें, जो पानी के मामले में सुरक्षित हो, जलवायु के लिहाज़ से मज़बूत हो और सभी के लिए न्यायपूर्ण हो।

(लेखक जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग में सचिव हैं।)

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