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हेल्दी एजिंग के लिए योग: ज़िंदगी के हर साल को बेहतर कैसे बनाएं

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत की सदियों से एक खास पहचान रही है। यह पहचान ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के महान विचार में छिपी है – यानी पूरी दुनिया को एक यूनिट और सभी जीवों को एक मानना। भारत के इसी आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित, योग एक पुराना विज्ञान है जो शरीर, मन और आत्मा के बीच बैलेंस बनाता है। योग के बेसिक एलिमेंट्स में आसन (फिजिकल पोस्चर), प्राणायाम (सांस लेने की तकनीक) और मेडिटेशन शामिल हैं। इन एलिमेंट्स के कॉम्बिनेशन से फिजिकल फिटनेस, मेंटल क्लैरिटी और इमोशनल बैलेंस बेहतर होता है।

27 सितंबर, 2014 को यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली को संबोधित करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दुनिया को रहने लायक और सस्टेनेबल बनाने के मकसद से लोगों की लाइफस्टाइल में बदलाव लाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया था। उन्होंने कहा था कि योग मन और शरीर, सोच और काम, संयम और संतोष, इंसान और प्रकृति के बीच तालमेल और हेल्थ और वेल-बीइंग से जुड़े एक होलिस्टिक विज़न का संगम है। माननीय प्रधानमंत्री के अनुरोध पर, 11 दिसंबर 2014 को, यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली ने 174 से ज़्यादा देशों के एक जॉइंट प्रस्ताव को मंज़ूरी दी, जिसमें 21 जून को ‘इंटरनेशनल योग दिवस’ घोषित किया गया। 2015 से, दुनिया भर में लाखों लोग योग करने के लिए पब्लिक जगहों पर एक साथ आ रहे हैं, इस तरह हमारे पुराने ज्ञान को एक ग्लोबल मूवमेंट में बदल रहे हैं।

इस साल 21 जून को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कोलकाता में योग दिवस समारोह की अगुवाई करेंगे, जबकि मैं इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए लद्दाख में रहूँगा। पिछले कई सालों में, मैंने भी योग और पंचकर्म के नियमित अभ्यास के लाभों का अनुभव किया है। इन दोनों को अक्सर सिस्टर साइंस कहा जाता है। इन बहुत समृद्ध करने वाले व्यक्तिगत अनुभवों ने मुझे योग और मानव कल्याण पर इसके गहरे प्रभाव पर अपने विचार साझा करने के लिए प्रेरित किया है।

योग: भारत की एक शाश्वत विरासत
‘योग’ का शाश्वत अभ्यास, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण से जुड़ा है, माना जाता है कि हमारी सभ्यता की शुरुआत के साथ ही शुरू हो गया था। योग की परंपरा में, जहाँ भगवान शिव को पहला योगी या ‘आदि योगी’ और पहला गुरु या ‘आदि गुरु’ माना जाता है, वहीं महर्षि पतंजलि को ‘शास्त्री योग का जनक’ माना जाता है क्योंकि उन्होंने ‘योग सूत्रों’ में योग के सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप से शामिल किया था। महर्षि पतंजलि का तमिलनाडु के साथ गहरा आध्यात्मिक संबंध है। ऐसा माना जाता है कि उनकी शारीरिक जीव समाधि भी तिरुपत्तूर में है।

हमारे पूजनीय ऋषियों और मुनियों ने दुनिया को योग का अनमोल खजाना दिया। सालों के ध्यान, तपस्या और आध्यात्मिक अभ्यास के बाद, इन ऋषियों और मुनियों ने एक पूरा सिस्टम बनाया जो शरीर, मन और आत्मा को जोड़ता है। श्री रामकृष्ण परमहंस ने योग के तीन महान रास्ते बताए हैं – ज्ञान योग, जो ज्ञान और समझ का रास्ता है; कर्म योग, जो निस्वार्थ सेवा और सही काम का रास्ता है; और भक्ति योग, जो शुद्ध प्रेम और भक्ति का रास्ता है। उन्होंने सिखाया कि तीनों रास्ते आखिरकार परम सत्य की प्राप्ति में मिल जाते हैं।

आज, योग भूगोल, संस्कृति और धर्म की सीमाओं को पार कर चुका है। यह भारत के ऋषियों के शाश्वत ज्ञान और मानवता की भलाई में उनके शाश्वत योगदान का जीता-जागता सबूत है।

स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग
हर साल, हमारे देश में पूरे जोश और एक सार्थक थीम के साथ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम ‘स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग’ का खास महत्व है। हेल्थकेयर और पब्लिक हेल्थ सिस्टम में अच्छी तरक्की और मौत की दर में कमी की वजह से, दुनिया भर में लोगों की औसत उम्र बढ़ी है। भारत भी इस बड़े डेमोग्राफिक बदलाव को देख रहा है। यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023’ के मुताबिक, 2050 तक भारत में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति 60 साल से ज़्यादा उम्र का होगा।

लंबी उम्र के इस अनमोल तोहफे का जश्न मनाते हुए, समाज की यह भी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह यह पक्का करे कि ज़िंदगी के इन ज़्यादा सालों का मतलब सिर्फ़ उम्र बढ़ना ही नहीं है, बल्कि उन सालों में ज़िंदगी की क्वालिटी भी बेहतर हो। इस संदर्भ में, इंटरनेशनल योगा डे (IDY) 2026 की थीम – “स्वस्थ उम्र बढ़ने के लिए योग” – एक बहुत ही सही संदेश के तौर पर सामने आई है।

इस डेमोग्राफिक बदलाव की वजह से भारत में ‘सिल्वर इकॉनमी’ बढ़ी है, जो मुख्य रूप से हेल्थकेयर से जुड़े सामान और सर्विस और सीनियर सिटिज़न्स की ज़रूरतों पर फोकस करती है। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि इसकी कीमत अब लगभग 73,000 करोड़ रुपये है। आने वाले सालों में इस सेक्टर के काफी बढ़ने की उम्मीद है।

आज के दौर में बढ़ती उम्र की असलियत ने दिखाया है कि कैसे बुज़ुर्ग लोग अलग-अलग तरह की चुनौतियों और कमज़ोरियों के एक मुश्किल जाल से जूझ रहे हैं। इस बारे में, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन ने भी दुनिया भर में बुज़ुर्गों में नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियों, मेंटल हेल्थ की चिंताओं और सोशल आइसोलेशन के बढ़ते बोझ पर बार-बार ज़ोर दिया है।
मेरा यह भी मानना ​​है कि लोगों को कम उम्र से ही योग से जोड़ना आज की ज़रूरत है। योग की प्रैक्टिस जितनी जल्दी शुरू की जाएगी, ज़िंदगी भर उतने ही ज़्यादा फ़ायदे मिलेंगे। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में योग को हेल्थ, वेल-बीइंग और वैल्यूज़-बेस्ड एजुकेशन के एक ज़रूरी हिस्से के तौर पर खास जगह दी गई है। यह युवाओं को योग से जोड़ने की दिशा में एक पॉज़िटिव कदम है। इससे स्टूडेंट्स में डिसिप्लिन, कॉन्संट्रेशन, इमोशनल बैलेंस और एक हेल्दी लाइफस्टाइल को ज़रूर बढ़ावा मिलेगा।

इस तरह, हम पाते हैं कि दुनिया भर में बदलते डेमोग्राफिक हालात के बीच, भारत दुनिया को सफल तरक्की का एक अनोखा मॉडल दे रहा है – एक ऐसा मॉडल जो पुरानी सभ्यताओं के ज्ञान और मॉडर्न साइंटिफिक सबूतों के बीच एक अच्छा तालमेल बनाता है – और वह है योग।

योग – आज के ज़माने में बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्याओं का समाधान
आज, मॉडर्न साइंस हमारे ऋषियों और योगियों की हमेशा रहने वाली बातों को सही साबित कर रहा है, जिन्होंने अनुशासित जीवन, योग और आध्यात्मिक अभ्यास से बहुत लंबी उम्र, स्फूर्ति और मानसिक स्पष्टता हासिल की। ​​हाल के सालों में योग के इलाज वाले पहलुओं में एकेडमिक और क्लिनिकल दिलचस्पी तेज़ी से बढ़ी है।

नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ (NIH) और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल जैसे बड़े संस्थानों और लैंसेट जैसे कई जाने-माने रिसर्च जर्नल्स ने अपनी रिसर्च में दिखाया है कि रेगुलर योग करने से बुज़ुर्गों में बैलेंस, फ्लेक्सिबिलिटी और मोबिलिटी बेहतर होती है। इससे उनके गिरने का डर और खतरा बहुत कम हो जाता है। रिसर्च से यह भी पता चला है कि योग हड्डियों की डेंसिटी बढ़ाता है, आर्थराइटिस का दर्द कम करता है, सांस लेने की क्षमता में सुधार करता है, ब्लड प्रेशर को स्थिर करता है और कार्डियोवैस्कुलर हेल्थ को बेहतर बनाता है।

फसल से आगे : किसान की नई आर्थिक आज़ादीभारत की नई कृषि यात्रा : फसल से आगे, समृद्धि की ओर

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों में भारतीय कृषि एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। पहले हमारी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि देश में अनाज की कमी न हो, किसी तरह भूख से बचाव हो जाए। आज मोदी जी की दूरदर्शिता और किसान‑हितैषी नीतियों ने कृषि को सिर्फ “उत्पादन का क्षेत्र” नहीं रहने दिया, बल्कि किसान की समृद्धि, जोखिम‑सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का समन्वित आधार बना दिया है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियों का फोकस केवल “कितना उत्पादन” पर नहीं, बल्कि “किसान की वास्तविक आय कितनी, खेती कितनी टिकाऊ, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कितनी मज़बूत” पर आ गया है। इसी सोच से दलहन–तिलहन मिशन, कॉटन मिशन, प्राकृतिक खेती मिशन, प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना, खेत बचाओ अभियान, डिजिटल कृषि और शोध–नवाचार; सबको एक ही व्यापक दृष्टि से जोड़ा जा रहा है।

उत्पादन से आगे : आय, सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में 3765.63 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर है, जो देश के इतिहास में सबसे ज्यादा है। धान, गेहूँ, मक्का, दालें और तिलहन- सभी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है। यह केवल ज्यादा पैदावार नहीं, बल्कि कुल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आए विस्तार और मजबूती का प्रमाण है। साथ‑साथ, मोदी सरकार ने किसान की जोखिम‑सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM‑KISAN) के तहत अब तक 22 किस्तों के माध्यम से किसानों के खातों में सीधे 4.27 लाख करोड़ रुपए से अधिक की सहायता पहुँच चुकी है, जिससे 9 करोड़ से ज़्यादा किसान परिवारों को हर साल नियमित आय‑समर्थन मिलता है। वहीं, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) ने देशभर में करोड़ों किसान‑आवेदनों को कवर करते हुए फसल के नुकसान की स्थिति में एक मज़बूत बीमा कवच दिया है। सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि‑अवसंरचना, वेयरहाउस और कोल्ड‑चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाज़ार तक पहुँच- तीनों को मजबूत किया है। कृषि अब सिर्फ खेत की मेड़ तक सीमित नहीं है। डेयरी, मत्स्य, कुक्कुट, बागवानी, मधुमक्खी‑पालन, खाद्य‑प्रसंस्करण, भंडारण, ग्रामीण उद्योग, सौर ऊर्जा और सेवा‑क्षेत्र; सब मिलकर नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं।

दलहन, तिलहन और कॉटन मिशन : आत्मनिर्भरता और मूल्य–सुरक्षा

लंबे समय तक दालें, खाद्य तेल और कपास– तीनों क्षेत्र हमारी पूरी क्षमता से पीछे रहे। हम दालों और तेलों के लिए आयात पर निर्भर रहे और कपास में भी किसानों को वैश्विक उतार‑चढ़ाव का सामना करना पड़ा। मोदी सरकार ने इन तीनों को रणनीतिक प्राथमिकता देते हुए अलग‑अलग मिशन के रूप में आगे बढ़ाया है। राष्ट्रीय दलहन मिशन के माध्यम से तुअर, उड़द, मसूर, चना और अन्य दालों का क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाने के लिए बीज से लेकर बाज़ार तक पूरी वैल्यू चेन पर काम हो रहा है– उच्च‑उपज किस्में, क्लस्टर आधारित खेती, प्रसंस्करण इकाइयाँ, MSP का सुदृढ़ ढाँचा, सरकारी खरीद, भंडारण और निर्यात तक। लक्ष्य यह है कि भारत दालों में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने, आयात बिल घटे और किसानों को उच्च मूल्य वाली इन फसलों से स्थायी आय मिले। इसी तरह तिलहन मिशन के ज़रिए सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल और पाम ऑयल जैसी फसलों पर विशेष जोर दिया जा रहा है। यह केवल पैदावार बढ़ाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता, किसानों को बेहतर दाम और देश की तेल सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में व्यापक रणनीति है। इसके साथ‑साथ कॉटन मिशन के तहत कपास की उच्च‑उपज और कीट‑रोधी किस्में, उन्नत कृषि‑प्रणालियाँ, कीट‑प्रबंधन, फसल विविधीकरण, टेक्सटाइल वैल्यू–चेन से बेहतर जुड़ाव और गुणवत्ता सुधार पर काम हो रहा है। कपास भारत के लाखों किसानों के लिए नकदी फसल है; मिशन का उद्देश्य है कि किसान को उत्पादन के साथ‑साथ वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता, बेहतर मूल्य और स्थिर आय भी मिल सके।

प्राकृतिक खेती मिशन : 1 करोड़ किसान, 75 लाख हेक्टेयर की नई राह

तेज़ी से बढ़ती रासायनिक निर्भरता, मिट्टी की थकान और भूजल पर दबाव– ये सब हमें आगाह कर रहे हैं कि खेती के तरीके बदलने होंगे। इसी समझ के साथ हमारे विजनरी प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में प्राकृतिक खेती को एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारा संकल्प है कि 1 करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए सेंसिटाइज़ किया जाए, उनमें से लगभग 18 लाख किसानों को सक्रिय रूप से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए तैयार किया जाए और चरणबद्ध रूप से करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जाए।

यह परिवर्तन धीरे‑धीरे, वैज्ञानिक प्रमाणों और किसानों के अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ रहा है। छोटे किसानों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपनी कुछ भूमि पर प्राकृतिक खेती का मॉडल बनाकर देखें; उन्हें प्रशिक्षण, स्थानीय संसाधनों पर आधारित पैकेज, प्रमाणन, ब्रांडिंग और बाज़ार‑जुड़ाव में मदद दी जा रही है। उद्देश्य यह है कि मिट्टी की उर्वरता बढ़े, रासायनिक लागत घटे, जलवायु झटकों के सामने फसलें अधिक टिकाऊ हों और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यप्रद, पोषक भोजन मिल सके।

प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना और फोकस में 100 कम उत्पादन वाले ज़िले

भारत जैसे विशाल देश में कुछ क्षेत्र बहुत तेज़ी से आगे बढ़ते हैं, जबकि कुछ ज़िले अलग‑अलग वजहों से पीछे रह जाते हैं। इस असमानता को कम करने के लिए प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना की संकल्पना की गई है। इस योजना के तहत लगभग 100 कम उत्पादन वाले ज़िलों की पहचान की गई है, जहाँ प्रति हेक्टेयर पैदावार राष्ट्रीय औसत से काफी कम है और किसान अपेक्षित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इन ज़िलों में 11 विभागों की 36 योजनाओं का कन्वर्जेन्स कर एक समग्र पैकेज दिया जा रहा है– सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि–उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाज़ार‑जुड़ाव; सबको एक साथ जोड़कर। सोच यह है कि योजनाएँ अलग‑अलग “साइलो” में न चलें, बल्कि किसान के खेत और गाँव को केंद्र में रखकर सब मिलकर काम करें। इससे नीति का फोकस केवल “कितना उत्पादन” से आगे बढ़कर इस पर आया है कि कहाँ उत्पादन कम है, वहाँ लक्षित निवेश और प्रयास से कैसे बढ़ाया जाए, और उससे किसान की आय कैसे ऊपर उठे।

“खेत बचाओ अभियान” : मिट्टी, पानी और किसान का संतुलन

उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में कई जगहों पर मिट्टी और पानी पर दबाव बढ़ा है। असंतुलित उर्वरक उपयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और सीमित फसल चक्र ने खेत की सेहत को प्रभावित किया है। यदि समय रहते दिशा न बदली जाए तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कमजोर खेत और थकी हुई मिट्टी छोड़ेंगे। इस चुनौती को देखते हुए “खेत बचाओ अभियान” शुरू किया गया है। यह अभियान केवल मिट्टी बचाने का नहीं, बल्कि किसान की आय, भोजन की गुणवत्ता और भविष्य की खाद्य सुरक्षा की रक्षा का अभियान है। इसके पाँच मुख्य संदेश हैं- हर किसान मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करे, डीएपी और यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करे और संतुलित NPK, सूक्ष्म पोषक तत्व, जैव एवं नैनो उर्वरकों को अपनाए, हरी खाद, जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दे, नकली बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के विरुद्ध सतर्क रहे और प्रशासन को तुरंत सूचना दे तथा प्राकृतिक खेती और जलवायु–अनुकूल पद्धतियों की ओर संगठित रूप से बढ़े। लक्ष्य यह नहीं कि उर्वरक अचानक कम कर दिए जाएँ, बल्कि यह है कि हर किसान सही मात्रा, सही समय और सही मिश्रण का उपयोग करे, ताकि मिट्टी की सेहत लंबे समय तक बनी रहे, लागत घटे और उत्पादन भी सुरक्षित रहे।

विज्ञान, डिजिटल कृषि और ICAR की भूमिका

इन सभी प्रयासों की रीढ़ विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली ने 2014–25 के बीच लगभग 3,000 जलवायु‑सहनशील फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें सूखा, बाढ़, लू, लवणीयता और अन्य तनावों को झेलने की क्षमता है। कुल मिलाकर 3,800 से ज़्यादा उच्च‑उपज किस्में और 200 से अधिक बायोफोर्टिफाइड किस्में जारी की गई हैं, जो उत्पादकता के साथ‑साथ पोषण सुरक्षा भी मजबूत करती हैं। डिजिटल कृषि मिशन और “एग्रीस्टैक” के तहत किसान पहचान (Farmer IDs), फसल प्लॉटों का डिजिटलीकरण, ड्रोन‑आधारित सेवाएँ, कीट‑रोग निगरानी, मौसम–आधारित और लोकेशन–स्पेसिफिक सलाह जैसी व्यवस्थाएँ बन रही हैं। इससे लैब से लैंड और डेटा से निर्णय तक की दूरी तेजी से कम हो रही है। ई‑नाम, किसान सारथी, KVK नेटवर्क, मोबाइल संदेश, व्हाट्सऐप समूह, सामुदायिक रेडियो और सोशल मीडिया– इन सबके माध्यम से वैज्ञानिक, विस्तारकर्मी और किसान–नेता सीधे किसान से संवाद कर पा रहे हैं। कृषि और ग्रामीण विकास को भी एक साथ, समग्र दृष्टि से देखा जा रहा है। सड़क, बिजली, इंटरनेट, स्व‑सहायता समूह, FPO, ग्रामीण उद्योग और कौशल विकास– ये सभी कार्यक्रम जब कृषि के साथ कदम–ताल करके चलते हैं, तभी गाँवों में रोज़गार, उद्यमिता और सामाजिक परिवर्तन की गति बढ़ती है।

फसल की मात्रा से आगे, किसान के विश्वास की ओर बढ़ते ठोस कदम

आने वाले वर्षों में भारत को दुनिया की खाद्य, पोषण और जलवायु चुनौतियों के बीच अपने कृषि‑तंत्र को और मजबूत बनाना है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का विज़न स्पष्ट है-किसान की आय बढ़े, उसकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्य मिले, दालों, तिलहनों और कपास में आत्मनिर्भरता से पोषण, तेल और वस्त्र सुरक्षा मजबूत हो। PM‑KISAN, PMFBY, प्राकृतिक खेती, खेत बचाओ अभियान और जलवायु‑अनुकूल तकनीकों से खेत की मिट्टी, पानी और किसान की सुरक्षा सुनिश्चित हो।प्रधानमंत्री धन–धान्य कृषि योजना के माध्यम से कम उत्पादन वाले ज़िलों में लक्षित निवेश से क्षेत्रीय असमानता घटे और हर किसान आगे बढ़े। विज्ञान, अनुसंधान और डिजिटल तकनीक से खेती कुशल, लचीली, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बने।

जब खेत बचेगा, तब किसान बचेगा। जब किसान बचेगा, तब कृषि बचेगी और जब कृषि बचेगी, तब भारत का भविष्य सुरक्षित, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनेगा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में यही हमारी नई कृषि यात्रा का सार है– फसल से आगे, किसान के विश्वास और ग्रामीण भारत की समृद्धि की ओर।

(लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री हैं।)

RRU ने 261 पंजाब पुलिस अधिकारियों को क्लाउड AI और प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण दिया

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

गांधीनगर, गुजरात – राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय (RRU) ने अपने सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर सुरक्षा संकाय (SITAICS) के माध्यम से 15 से 17 जून 2026 तक पंजाब पुलिस के 261 अधिकारियों के लिए तीन दिवसीय फाउंडेशन कोर्स “क्लाउड AI 101 और प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग” का सफलतापूर्वक ऑनलाइन लाइव वर्चुअल मोड में आयोजन किया। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय की डीन (प्रभारी) डॉ. जसबीरकौर थधानी के उद्घाटन भाषण से हुआ, जिन्होंने बताया कि AI उपकरण अधिकारियों को बढ़ती सूचनाओं के प्रबंधन और नियमित कागजी कार्रवाई को स्वचालित करने में मदद करते हैं, जिससे उनका निर्णय उन मामलों पर केंद्रित हो पाता है जहां इसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। कार्यक्रम का संचालन SITAICS के निदेशक डॉ. चंद्रेश पारेख ने किया और इसका समन्वय SITAICS के सहायक प्रोफेसर श्री पूजन शाह ने किया।

नौ सत्रों और छह घंटे के व्यावहारिक प्रशिक्षण में फैला यह पाठ्यक्रम विशेष रूप से कानून प्रवर्तन अधिकारियों के लिए तैयार किया गया था। पहले दिन एआई के मूल सिद्धांतों, लार्ज लैंग्वेज मॉडल आर्किटेक्चर और प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग को शामिल किया गया, जिसमें प्रभावी प्रॉम्प्टिंग के चार स्तंभों – भूमिका, कार्य, संदर्भ और आउटपुट प्रारूप – का परिचय दिया गया। प्रतिभागियों ने ओलामा और एलएम स्टूडियो जैसे ऑफ़लाइन एआई उपकरणों का भी अध्ययन किया, जिससे गूगल एआई एज गैलरी जैसे ऐप्स के साथ इंटरनेट कनेक्टिविटी के बिना सुरक्षित एआई उपयोग संभव हो सका।

दूसरे दिन दस्तावेज़ इंटेलिजेंस पर ध्यान केंद्रित किया गया, जहां प्रतिभागियों ने क्लाउड प्रोजेक्ट्स और नोटबुकएलएम का उपयोग करके क्रॉस-डॉक्यूमेंट नॉलेज बेस बनाए और उद्धरण-आधारित बहु-दस्तावेज़ विश्लेषण किया। इस सत्र में भासिनी का भी परिचय दिया गया, जो भारतीय क्षेत्रीय भाषाओं में पाठ और वाक् प्रसंस्करण के लिए एक मेक-इन-इंडिया एआई टूल है। तीसरे दिन जैपियर के माध्यम से जिम्मेदार एआई गवर्नेंस, रेड-टीमिंग और नो-कोड ऑटोमेशन को एक साथ लाया गया। समापन भाषण रजिस्ट्रार (प्रभारी) डॉ. धर्मेशकुमार प्रजापति ने दिया, जिन्होंने प्रशिक्षण के सफल समापन पर सभी प्रतिभागियों को बधाई दी और इस बात पर जोर दिया कि एआई-सहायता प्राप्त सभी कार्यप्रवाहों में मानवीय भागीदारी अपरिहार्य है।

प्रतिभागियों की प्रतिक्रिया अत्यंत सकारात्मक रही। अधिकारियों ने प्रशिक्षण को अत्यधिक ज्ञानवर्धक बताया और कहा कि सुव्यवस्थित सामग्री, व्यावहारिक उदाहरण और प्रत्यक्ष अभ्यास सत्रों ने एआई उपकरणों और त्वरित इंजीनियरिंग तकनीकों के बारे में उनकी समझ को काफी बढ़ाया है। कई प्रतिभागियों ने प्रौद्योगिकी के विकास के साथ-साथ अद्यतन रहने की उत्सुकता भी व्यक्त की और अनुरोध किया कि भविष्य के कार्यक्रमों में एआई में नवीनतम प्रगति को शामिल किया जाए – एक ऐसी आवश्यकता जिसे राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय निरंतर और अद्यतन पाठ्यक्रमों के माध्यम से पूरा करने का इरादा रखता है।

राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय का उद्देश्य विश्व स्तर पर राज्य पुलिस बलों और राष्ट्रीय सुरक्षा संगठनों को विभिन्न एआई उपकरणों को अपनाने और प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करना है ताकि उनकी क्षमताओं को मजबूत किया जा सके और परिचालन प्रभावशीलता में सुधार किया जा सके।

PM-VBRY के PM तहत ने 2,400 करोड़ की प्रोत्साहन राशि वितरित की
  • PM-VBRY के तहत प्रधानमंत्री ने ₹2,400 करोड़ की प्रोत्साहन राशि वितरित की; चंडीगढ़ में 320 युवाओं को मिले नियुक्ति पत्र
  • PM-VBRY के राष्ट्रीय कार्यक्रम से जुड़ा चंडीगढ़; लगभग 500 हितधारकों ने की सहभागिता

चंडीगढ़ / सत्ता संदेश

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (पीएम-वीबीआरवाई) के अंतर्गत आज एस.डी. कॉलेज, सेक्टर-32, चंडीगढ़ में एक क्षेत्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में चंडीगढ़ के मेयर सौरभ जोशी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।

यह कार्यक्रम नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम के साथ देशभर के 200 स्थानों पर एक साथ आयोजित किया गया। राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पीएम-वीबीआरवाई के तहत देशभर के 15 लाख से अधिक लाभार्थियों को ₹2,400 करोड़ की प्रोत्साहन राशि वितरित की। इस अवसर पर केंद्रीय श्रम एवं रोजगार तथा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया, श्रम एवं रोजगार राज्य मंत्री सुश्री शोभा करंदलाजे, वरिष्ठ अधिकारी तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित रहे।

चंडीगढ़ में आयोजित कार्यक्रम में लगभग 500 हितधारकों ने भाग लिया, जिनमें 320 लाभार्थी, 38 नियोक्ता, उद्योग संगठनों के प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि, वरिष्ठ सरकारी अधिकारी तथा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल थे।

इस अवसर पर नियोक्ताओं द्वारा 320 नव-नियोजित युवाओं को नियुक्ति पत्र वितरित किए गए। उपस्थित प्रतिभागियों ने प्रधानमंत्री के संबोधन का सीधा प्रसारण भी देखा।

अपने संबोधन में श्री सौरभ जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना युवाओं के लिए औपचारिक रोजगार के नए अवसर सृजित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि यह योजना रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करने, संगठित कार्यबल को मजबूत बनाने तथा विकसित भारत के संकल्प को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।