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भारत ने अंतरिक्ष तकनीक में बढ़ाया कदम, रेड बैलून एयरोस्पेस ने लॉन्च किया पहला स्वदेशी ‘सुपर-प्रेशर बैलून’

नयी दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत ने उच्च वायुमंडलीय और अंतरिक्ष अनुसंधान तकनीक के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए बुधवार को अपना पहला स्वदेशी ‘सुपर-प्रेशर बैलून’ (एसपीबी) सफलतापूर्वक लॉन्च किया। निजी क्षेत्र की कंपनी ‘रेड बैलून एयरोस्पेस’ द्वारा विकसित इस अत्याधुनिक बैलून में भारत और विदेशों के सात साझेदारों के वाणिज्यिक उपकरण लगाए गए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह उपलब्धि भारत के उभरते अंतरिक्ष और उच्च-ऊंचाई अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए एक बड़ा कदम मानी जा रही है। सुपर-प्रेशर बैलून को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वह बाहरी वायुमंडलीय दबाव से अधिक आंतरिक दबाव बनाए रख सके। इसी विशेष तकनीक के कारण यह बैलून अत्यधिक ऊंचाई पर लंबे समय तक स्थिर रहकर भारी उपकरणों को लेकर उड़ान भर सकता है।

कंपनी के अधिकारियों ने बताया कि इस स्वदेशी एसपीबी का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान, पृथ्वी अवलोकन, मौसम अध्ययन, संचार तकनीक परीक्षण और रक्षा संबंधी प्रयोगों सहित कई क्षेत्रों में किया जा सकता है। इसमें लगाए गए उपकरण उच्च वायुमंडल में डेटा संग्रह, पर्यावरणीय अध्ययन और तकनीकी परीक्षणों के लिए उपयोगी होंगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि सुपर-प्रेशर बैलून पारंपरिक मौसम गुब्बारों की तुलना में अधिक समय तक उड़ान भर सकते हैं और उपग्रह मिशनों की तुलना में कम लागत पर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देने में सक्षम होते हैं। यही वजह है कि दुनिया के कई देश इन्हें अंतरिक्ष अनुसंधान और उच्च-ऊंचाई निगरानी के लिए उपयोग कर रहे हैं।

‘रेड बैलून एयरोस्पेस’ का यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के बढ़ते विस्तार को भी दर्शाता है। हाल के वर्षों में सरकार द्वारा अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी को बढ़ावा दिए जाने के बाद कई भारतीय स्टार्टअप और तकनीकी कंपनियां नई परियोजनाओं पर काम कर रही हैं।

कंपनी ने बताया कि इस मिशन में देश-विदेश के सात साझेदारों के वाणिज्यिक उपकरण शामिल किए गए हैं, जिससे यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय सहयोग का भी उदाहरण बन गई है। इन उपकरणों के माध्यम से विभिन्न प्रकार के तकनीकी और वैज्ञानिक परीक्षण किए जाएंगे।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस तरह की तकनीकों का सफल विकास जारी रहता है, तो भारत उच्च-ऊंचाई अनुसंधान और कम लागत वाले वैज्ञानिक मिशनों के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है। इससे संचार, रक्षा, मौसम पूर्वानुमान और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी नई संभावनाएं खुल सकती हैं।

यह लॉन्च भारत की स्वदेशी तकनीकी क्षमता और नवाचार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, जो आने वाले समय में देश के अंतरिक्ष एवं वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यक्रमों को नई गति दे सकता है।

भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन ट्रेन तैयार, जिंद-सोनीपत रूट पर जल्द दौड़ेगी

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

हरित और टिकाऊ परिवहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारतीय रेलवे ने उत्तरी रेलवे के जिंद-सोनीपत खंड पर हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित 10 डिब्बों वाली एक रेलगाड़ी चलाने की मंजूरी दे दी है। यह रेलगाड़ी जल्द ही शुरू होने वाली है और 1200 किलोवाट हाइड्रोजन फ्यूल सेल प्रणोदन प्रणाली द्वारा संचालित होकर अधिकतम 75 किमी प्रति घंटे की गति से चलेगी।


हाइड्रोजन ईंधन सेल तकनीक, हाइड्रोजन का उपयोग करके रासायनिक प्रतिक्रिया के माध्यम से बिजली उत्पन्न करती है, जिसमें केवल जल वाष्प ही उत्सर्जित होता है। इस प्रकार, यह पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित रेल प्रणालियों का एक स्वच्छ विकल्प है। हाइड्रोजन आधारित रेल प्रणालियों को सतत परिवहन के लिए एक आशाजनक समाधान के रूप में वैश्विक स्तर पर मान्यता मिल रही है। इस पहल के साथ, भारत जर्मनी, जापान, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है जो स्वच्छ रेल परिवहन के लिए हाइड्रोजन के उपयोग की संभावनाओं का पता लगा रहे हैं। चूंकि यह तकनीक अभी प्रारंभिक चरण में है, इसलिए वर्तमान में केवल कुछ ही देश ऐसी प्रणालियों का संचालन या परीक्षण कर रहे हैं।


हरियाणा के जिंद-सोनीपत खंड को इन परिचालनों के लिए पायलट मार्ग के रूप में चुना गया है। इसके लिए जिंद में एक स्वदेशी हाइड्रोजन भंडारण और ईंधन भरने की सुविधा स्थापित की गई है। पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (पीईएसओ) ने इस स्थल पर संपीड़ित हाइड्रोजन गैस के भंडारण और वितरण के लिए आवश्यक लाइसेंस प्रदान कर दिया है।


ईंधन भरने के लिए हाइड्रोजन संपीड़न प्रणाली, आवश्यक तकनीकी सहायता और महत्वपूर्ण पुर्जे उपलब्ध कराए गए हैं ताकि विश्वसनीय और त्रुटिरहित संचालन सुनिश्चित हो सके। किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए अलग से एक कंप्रेसर यूनिट की व्यवस्था भी की जा रही है। हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और वितरण केंद्र में स्थापित हाइड्रोजन रिसाव और आग का पता लगाने वाले विभिन्न सुरक्षा सेंसरों की नियमित रूप से जांच और सफाई की जाएगी ताकि धूल जमा न हो और सुरक्षित संचालन सुनिश्चित हो सके।


आरडीएसओ द्वारा विधिवत अनुमोदित हाइड्रोजन ट्रेन-सेट और हाइड्रोजन संयंत्र के संचालन एवं रख-रखाव नियमावली भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। शकुरबस्ती में प्रस्तावित रख-रखाव सुविधा के लिए आवश्यक सुरक्षा प्रावधान, नियमित ऑडिट और मानक संचालन प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जा रहा है।


इस मंजूरी में व्यापक सुरक्षा और परिचालन प्रोटोकॉल का पालन करना भी अनिवार्य किया गया है, जिनमें हाइड्रोजन ईंधन भरने की प्रणाली की चौबीसों घंटे और सातों दिन निगरानी, ​​महत्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रशिक्षित और प्रमाणित कर्मियों की तैनाती तथा नियमित निरीक्षण एवं रखरखाव कार्यक्रम शामिल हैं। परिचालन के प्रारंभिक चरण में, सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षित तकनीकी कर्मचारी ट्रेन के साथ रहेंगे।
यह परियोजना नवाचार, ऊर्जा दक्षता और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ परिवहन के प्रति भारतीय रेलवे की व्यापक प्रतिबद्धता को दर्शाती है और भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ ऊर्जा और शून्य कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों के अनुरूप है।

एक्सप्लेनर: चांद पर इंसानी बस्ती बसाने की तैयारी में NASA, कैसे बनेगा ‘लूनर बेस’?

NASA अब सिर्फ चांद पर इंसानों को भेजने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वहां स्थायी बेस बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी की यह महत्वाकांक्षी योजना भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान, वैज्ञानिक प्रयोगों और मंगल मिशन की तैयारी के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। सवाल यह है कि आखिर चांद पर बेस क्यों बनाया जा रहा है, यह कैसे काम करेगा और इंसानों के लिए वहां रहना कितना चुनौतीपूर्ण होगा?

क्यों जरूरी है चांद पर बेस?

NASA का मानना है कि चांद भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक “स्टॉपओवर स्टेशन” बन सकता है। पृथ्वी की तुलना में चांद का गुरुत्वाकर्षण काफी कम है, इसलिए वहां से अंतरिक्ष यान लॉन्च करना आसान और कम खर्चीला होगा। वैज्ञानिकों का उद्देश्य चांद पर लंबे समय तक इंसानों को सुरक्षित रखने की तकनीक विकसित करना है, ताकि भविष्य में मंगल ग्रह तक मानव मिशन भेजा जा सके।

आर्टेमिस मिशन की क्या भूमिका?

चांद पर बेस बनाने की योजना Artemis Program के तहत आगे बढ़ रही है। इस मिशन का उद्देश्य इंसानों को दोबारा चांद पर उतारना और वहां टिकाऊ उपस्थिति स्थापित करना है। NASA आने वाले वर्षों में चांद के दक्षिणी ध्रुव (South Pole) क्षेत्र में बेस स्थापित करने की योजना बना रहा है, क्योंकि वहां पानी के बर्फीले भंडार मिलने की संभावना है।

चांद पर इंसान कैसे रहेंगे?

लूनर बेस में विशेष मॉड्यूल बनाए जाएंगे, जहां अंतरिक्ष यात्री रह सकेंगे। इनमें ऑक्सीजन, बिजली, पानी और तापमान नियंत्रण जैसी सुविधाएं होंगी। वैज्ञानिक सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन के लिए करने की योजना बना रहे हैं। चांद की मिट्टी यानी ‘रेगोलिथ’ का उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में भी किया जा सकता है।

सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?

चांद पर वातावरण नहीं है, जिससे वहां अत्यधिक गर्मी और ठंड का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा अंतरिक्ष विकिरण (Radiation), उल्कापिंडों का खतरा और सीमित संसाधन बड़ी चुनौती हैं। वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं जो अंतरिक्ष यात्रियों को इन खतरों से सुरक्षित रख सके।

दुनिया की नजर चांद पर क्यों?

सिर्फ NASA ही नहीं, बल्कि China, Russia और कई अन्य देश भी चांद मिशनों पर तेजी से काम कर रहे हैं। चांद को भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधान, खनिज संसाधनों और अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का बड़ा केंद्र माना जा रहा है।

भविष्य की अंतरिक्ष दुनिया की शुरुआत

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चांद पर स्थायी बेस बन जाता है, तो यह मानव इतिहास में अंतरिक्ष युग का सबसे बड़ा कदम साबित हो सकता है। इससे अंतरिक्ष पर्यटन, वैज्ञानिक खोजों और दूसरे ग्रहों पर मानव मिशनों का रास्ता खुल सकता है।

भारत एआई क्रांति के अगले चरण का नेतृत्व करने को तैयार: माइक्रोसॉफ्ट अधिकारी

नयी दिल्ली/ सत्ता संदेश

वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनी Microsoft के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि भारत अपने मजबूत डिजिटल इकोसिस्टम और विशाल डेवलपर समुदाय के दम पर कृत्रिम मेधा (एआई) के अगले चरण की तैनाती में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।

अधिकारी ने मंगलवार को कहा कि भारत का तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा, इंटरनेट की व्यापक पहुंच और तकनीकी प्रतिभा का बड़ा आधार इसे वैश्विक एआई विकास के केंद्र के रूप में उभरने में मदद कर रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में भारत एआई आधारित नवाचारों और अनुप्रयोगों के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से विकसित हो रहा है, जिससे एआई तकनीक के व्यावहारिक उपयोग के नए अवसर बन रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, वित्त और शासन जैसे क्षेत्रों में एआई के बढ़ते उपयोग से देश में डिजिटल परिवर्तन को और गति मिलेगी।

माइक्रोसॉफ्ट अधिकारी के अनुसार, भारत न केवल एआई तकनीक का उपयोग करने वाला बड़ा बाजार है, बल्कि यह एक ऐसा देश भी है जहां बड़ी संख्या में डेवलपर्स और इंजीनियर वैश्विक स्तर पर नवाचार में योगदान दे रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे कि आधार, यूपीआई और अन्य ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म एआई के प्रभावी उपयोग के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। इससे न केवल सेवाओं की दक्षता बढ़ेगी बल्कि पारदर्शिता और पहुंच में भी सुधार होगा।

अधिकारी ने कहा कि एआई के अगले चरण में जिम्मेदार और सुरक्षित तकनीक के विकास पर जोर होगा, और भारत इस दिशा में वैश्विक मानकों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने विश्वास जताया कि भारत आने वाले समय में एआई नवाचारों का वैश्विक हब बन सकता है, जहां तकनीक और प्रतिभा दोनों का अनोखा संगम देखने को मिलेगा।

भारत-जापान संगोष्ठी से कार्यबल सहयोग को नई रफ्तार मिली

दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और जापान के बीच कार्यबल गतिशीलता सहयोग पर चर्चा करने के लिए 25 मई को टोक्यो में एक संयुक्त संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी जापान स्थित भारतीय दूतावास और जापान की आसियान वन कंपनी लिमिटेड द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई थी।

भारत और जापान के बीच कुशल कार्यबल गतिशीलता और मानव संसाधन विकास में दीर्घकालिक सहयोग पर चर्चा के लिए इस संगोष्ठी में जापानी नीति निर्माताओं, उद्योग जगत प्रमुखों, शैक्षणिक संस्थानों और कार्यबल गतिशीलता से जुड़े हितधारकों को एक मंच पर लाया गया।

इस संगोष्ठी में जापान की प्रमुख कंपनियों के लगभग 250 प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी और मानव संसाधन प्रबंधक शामिल थे। प्रतिनिधियों ने भारत के कुशल कार्यबल पारिस्थितिकी तंत्र के साथ संरचित जुड़ाव की संभावनाओं पर चर्चा की।

प्रतिभागियों ने विनिर्माण, देखभाल, निर्माण, वाहन रखरखाव, आतिथ्य सत्कार, कृषि, आईटी और डिजिटल सेवाओं तथा उभरते हरित अर्थव्यवस्था क्षेत्रों जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारत-जापान सहयोग की प्रबल संभावनाओं को स्वीकार किया। चर्चाओं में पारदर्शी और व्यापक कार्यबल गतिशीलता मार्ग बनाने के लिए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और रोजगार सुविधा प्रणालियों के महत्व पर भी बल दिया गया।

आगे बढ़ने के तरीके के रूप में, दोनों पक्षों ने भारत में जापानी भाषा और परीक्षण केंद्रों का विस्तार करने, जापानी नियोक्ताओं और भारतीय कौशल संस्थानों के बीच सहयोग को मजबूत करने, जापान से मांग की दृश्यता में सुधार करने, कौशल-मान्यता और व्यावसायिक संरेखण को बढ़ावा देने और घनिष्ठ संस्थागत सहयोग के माध्यम से विश्वसनीय कार्यबल गतिशीलता मार्ग बनाने पर चर्चा की।

असम सरकार की फॉरेन लैंग्वेज इनिशिएटिव फॉर ग्लोबल टैलेंट (फ्लाइट) को राज्य के नेतृत्व वाली एक पहल के रूप में उजागर किया गया, जिसका उद्देश्य उम्मीदवारों को वैश्विक कार्यबल के अवसरों, विशेष रूप से जापान-उन्मुख मार्गों के लिए तैयार करना है।

कार्यक्रम का समापन आसियान ग्रुप कंपनी लिमिटेड के अध्यक्ष एवं मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी श्री तोशियाकी निशिकावा के संबोधन से हुआ, जिन्होंने भारत-जापान के बीच दीर्घकालिक जन-सहयोग के महत्व पर बल दिया। उन्होंने भविष्य में कार्यबल सहयोग के प्रति आशा व्यक्त करते हुए अगले 10 वर्षों में 50,000 लोगों को शामिल करने के साथ जापान-भारत मानव विनिमय कार्यक्रम को साकार करने के प्रति वचनबद्धता जताई।

उच्च शिक्षा संस्थानों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों, शिक्षुता प्रणालियों, डिजिटल कौशल विकास प्लेटफार्मों और कैरियर सेवाओं द्वारा समर्थित भारत के व्यापक कार्यबल तैयारी तंत्र पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने विदेश मंत्रालय के ई-माइग्रेट प्लेटफार्म, राष्ट्रीय कैरियर सेवा प्लेटफार्म, मॉडल कैरियर केंद्रों और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय, राज्यों और शैक्षणिक संस्थानों को शामिल करने वाले व्यापक कौशल विकास तंत्र सहित भारत के अंतर्राष्ट्रीय श्रम गतिशीलता ढांचे पर प्रकाश डाला।

सचिव महोदया ने भारत और जापान के बीच जापानी भाषा की तैयारी, क्षेत्र-विशिष्ट कौशल विकास, परीक्षण अवसंरचना, कौशल मानचित्रण, व्यावसायिक संरेखण, संरचित मांग एकत्रीकरण, नैतिक भर्ती प्रथाओं और संस्थागत सहयोग को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की समीक्षा की

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की गुणवत्ता और रखरखाव की स्थिति की व्यापक समीक्षा बैठकें आयोजित की। इन बैठकों का आयोजन नई दिल्ली में केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्‍टा और हर्ष मल्होत्रा, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और परियोजना ठेकेदारों की उपस्थिति में किया गया।

गडकरी ने समीक्षा बैठक में राजस्थान के 10,064 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्गों की गुणवत्ता और रखरखाव की स्थिति का आकलन किया। इसके साथ ही उन्‍होंने हिमाचल प्रदेश में 1,947 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की गुणवत्ता और रखरखाव की प्रगति की समीक्षा भी की।

गडकरी ने टिकाऊ, मजबूत और कुशल राजमार्ग अवसंरचना के विकास को सुनिश्चित करने के लिए परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन, गुणवत्ता मानकों के कड़ाई से पालन और उन्नत प्रौद्योगिकियों तथा आधुनिक निर्माण पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया। उन्होंने यह भी बताया कि मजबूत राजमार्ग नेटवर्क कनेक्टिविटी में सुधार, आर्थिक विकास को गति देने, यात्रियों की सुविधा बढ़ाने और प्रमुख गलियारों में निर्बाध आवागमन सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

केंद्रीय मंत्री ने अधिकारियों को बडे पैमाने पर मॉनसून से पहले तैयारी के लिए उपाय करने का निर्देश दिया। इनमें प्रभावी जल निकासी प्रबंधन, ढलान संरक्षण कार्य, सक्रिय निवारक रखरखाव और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र शामिल हैं। इसका उद्देश्‍य व्यवधानों को कम करना, सड़क सुरक्षा बनाए रखना और दीर्घकालिक परिसंपत्ति स्थायित्व को बढ़ावा देना है।

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने सुरंग इंजीनियरिंग, ढलान स्थिरता और क्षमता निर्माण में उन्नत परामर्श सहायता के लिए नॉर्वेजियन जियोटेक्निकल इंस्टीट्यूट के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

दिल्ली / सत्ता संदेश

राष्ट्रीय राजमार्ग अवसंरचना के विकास के लिए तकनीकी विशेषज्ञता को मजबूत करने के लिए भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने हाल ही में ओस्लो में नॉर्वे के जियोटेक्निकल इंस्टीट्यूट (एनजीआई) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। यह सहयोग भारत के राष्ट्रीय राजमार्गों को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित और रखरखाव करने के प्रति एनएचएआई की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। एनएचएआई भू-तकनीकी अभियांत्रिकी और प्राकृतिक आपदाओं के निवारण में एनजीआई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विशेषज्ञता का लाभ उठाएगा।  भूगर्भीय रूप से संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण भूभागों में अभियांत्रिकी क्षमताओं को बढ़ावा देने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

इस समझौता ज्ञापन का उद्देश्य सुरंग निर्माण, ढलान स्थिरता विश्लेषण, ढलानों की निगरानी और संस्थागत क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं की योजना, डिजाइन, मूल्यांकन और निगरानी में सहयोग हेतु उन्नत अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता का लाभ उठाना है। इस समझौता ज्ञापन के तहत, एनजीआई विभिन्न परामर्श सेवाएं प्रदान करेगा इनमें सुरंग परियोजनाओं के लिए स्थल का विशिष्टीकरण, आगामी सुरंग परियोजनाओं के लिए व्यवहार्यता अध्ययन और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करना, परिचालन सुरंगों का संरचनात्मक मूल्यांकन और सुरक्षा लेखापरीक्षा, साथ ही संभावित खतरों की पहचान करने और उपयुक्त शमन उपायों की सिफारिश करने के लिए उन्नत ढलान स्थिरता मूल्यांकन शामिल हैं। इस सहयोग में ढलानों के लिए इनसार डेटा का विश्लेषण और व्याख्या तथा अवसंरचना सुरक्षा में सुधार लाने के उद्देश्य से प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का विकास भी शामिल है।

समझौता ज्ञापन में इसके अतिरिक्त, संस्थागत क्षमता निर्माण और ज्ञान आदान-प्रदान पर बल दिया गया है। दोनों संगठन प्राकृतिक आपदाओं को कम करने से संबंधित अनुसंधान और विकास पहलों पर सहयोग करेंगे। संयुक्त कार्यशालाओं, सेमिनारों, तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रमों और विशेष तकनीकी साहित्य के प्रकाशन के माध्यम से राजमार्ग क्षेत्र की तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाया जाएगा।

दोनों संगठन पहचान किये गये क्षेत्रों में मिलकर काम करने का प्रयास करेंगे। यह समझौता परियोजना-दर-परियोजना आधार पर लागू होगा, इससे प्रत्येक पक्ष को आवश्यकतानुसार अन्य संगठनों के साथ स्वतंत्र रूप से सहयोग करने की सुविधा मिलेगी। यह समझौता ज्ञापन पांच वर्षों की अवधि के लिए वैध रहेगा।

एनएचएआई और एनजीआई के बीच सहयोग से सुरक्षित, टिकाऊ और विश्व स्तरीय राष्ट्रीय राजमार्ग अवसंरचना के विकास में तकनीकी क्षमताओं को मजबूती मिलेगी। यह साझेदारी अवसंरचना विकास, प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान और टिकाऊ इंजीनियरिंग पद्धतियों के क्षेत्र में भारत और नॉर्वे के बीच बढ़ते सहयोग को भी दर्शाती है। इससे द्विपक्षीय संबंध और गहरे होंगे और दीर्घकालिक संस्थागत सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

नए अध्ययन से सूर्य के बाहरी वायुमंडल (सौर कोरोना) के रहस्यमय रूप से अधिक गर्म होने के निदान का मार्ग प्रशस्त हुआ

दिल्ली / सत्ता संदेश

सूर्य के बाहरी वायुमंडल या कोरोना में छिपी अशांति का पता लगाने का एक नया तरीका वैज्ञानिकों को इस लंबे समय से चले आ रहे रहस्य के बारे में नई जानकारी हासिल करने में मदद कर सकता है कि कोरोना सूर्य की दृश्य सतह की तुलना में बहुत अधिक गर्म क्यों है।

सूर्य का बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना चुंबकीय संरचनाओं से भरा हुआ है जो तरंगों के प्रवाह के साथ लगातार हिलतस रहतस है। इनमें सबसे आम हैं अनुप्रस्थ चुंबकीय जलगतिकीय (एमएचडी) तरंगें, जिन्हें अक्सर अल्फ़वेनिक या किंक तरंगें कहा जाता है। ये तरंगें इन चुंबकीय संरचनाओं के साथ बाहर की ओर बढ़ते हुए कोरोना की संरचनाओं को अगल-बगल दोलन कराती हैं।

स्पेक्ट्रोस्कोपी के अनुसार ऐसी तरंगें प्रत्यावर्ती लाल और नीले डॉप्लर शिफ्ट उत्पन्न करती हैं, जो चुंबकीय क्षेत्र के लंबवत अनुप्रस्थ गतियों के कारण प्रेक्षक की ओर और उससे दूर जाने वाले प्लाज्मा के संकेत हैं। हालांकि, क्या ये प्रसारित अनुप्रस्थ तरंगें कोरोनल स्पेक्ट्रल रेखाओं के आकार को भी संशोधित कर सकती हैं, जिससे अन्यथा गाऊसी प्रोफाइल में मापने योग्य विषमताएं उत्पन्न हो सकती हैं, यह अभी तक अवलोकन के आधार पर स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हुआ है।

कोरोना और परिवर्तन क्षेत्र के पिछले प्रेक्षणों से स्पेक्ट्रल रेखाओं में सर्वव्यापी नीले रंग की विषमताएं प्रकट हुई हैं। इन्हें मुख्यतः चुंबकीय क्षेत्र रेखाओं के अनुदिश ऊपर की ओर प्रवाह, जेट या द्रव्यमान गति के संकेत के रूप में व्याख्यायित किया गया है। इसके विपरीत, अनुप्रस्थ तरंगों को अक्सर लगभग असंपीड्य माना जाता है और इसलिए उनसे मजबूत रेखा प्रोफ़ाइल विषमताएं उत्पन्न होने की अपेक्षा नहीं की जाती है। परिणामस्वरूप, स्पेक्ट्रल विषमताओं में उनके संभावित योगदान पर बहुत कम ध्यान दिया गया है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान- आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एआरआईएस) नैनीताल और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) दिल्ली द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में इस प्रश्न की जांच के लिए उन्नत त्रि-आयामी एमएचडी सिमुलेशन को फॉरवर्ड मॉडलिंग के साथ मिलाकर उपयोग किया गया। एआरआईएस की पीएचडी छात्रा सुश्री अंबिका सक्सेना और आईआईटी दिल्ली के भौतिकी विभाग के प्रोफेसर वैभव पंत ने अनुप्रस्थ काट में घनत्व असमानताओं वाले एक खुले क्षेत्र के कोरोनल क्षेत्र का सिमुलेशन किया। निचली सीमा पर अनुप्रस्थ तरंगें उत्पन्न की गईं और उन्हें संरचित चुंबकीय क्षेत्र के अनुदिश ऊपर की ओर प्रसारित होने दिया गया। उन्होंने फॉरवर्ड मॉडलिंग का उपयोग करते हुए गणना की कि प्लाज्मा उत्सर्जन आमतौर पर देखी जाने वाली कोरोनल स्पेक्ट्रल लाइन, Fe XIII 10749 Å में कैसे दिखाई देगा।

एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में किए गए सिमुलेशन से एक सुसंगत पैटर्न सामने आया। जब अनुप्रस्थ तरंगें एक संरचित चुंबकीय प्लूम (किसी खगोलीय पिंड की सतह से अंतरिक्ष में निकलने वाले पदार्थ—जैसे जल वाष्प, बर्फ के कण या प्लाज्मा) के अनुदिश फैलती हैं, तो संरचना के भीतर प्लाज्मा एकसमान रूप से गति नहीं करता है। प्लूम के अनुप्रस्थ काट में घनत्व में भिन्नताएं होती हैं, और जैसे-जैसे तरंग विकसित होती है, यह चरण मिश्रण के माध्यम से तेजी से सूक्ष्म संरचना उत्पन्न करती है। यह प्रक्रिया अशांति के विकास की ओर ले जाती है, जिससे चुंबकीय संरचना के भीतर छोटे पैमाने पर वेग और घनत्व संरचना का निर्माण होता है।

सौर कोरोना की प्रकाशीय विरलता के कारण संरचना के कई भागों से निकलने वाला उत्सर्जन दृष्टि रेखा के अनुदिश एक दूसरे पर आ जाता है। विभिन्न क्षेत्र एक ही समय में अलग-अलग वेग से गति करते हैं। जब यह उत्सर्जन संयुक्त होता है, तो परिणामी स्पेक्ट्रल रेखा पूर्णतः सममित नहीं रह जाती। इसके बजाय, इसमें नीले और लाल रंग की वैकल्पिक विषमताएं विकसित होती हैं जो तरंग के यात्रा करने के साथ समय और ऊंचाई में बदलती रहती हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि ये विषमताएं अनुप्रस्थ तरंग गतिकी, अनुप्रस्थ काट की असमानताओं और तरंग-प्रेरित अशांति के विकास के संयुक्त प्रभावों से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती हैं। अनुकरणित विषमताएं रेखा शिखर तीव्रता के लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच सकती हैं, जिनकी स्पष्ट द्वितीयक गति 30 से 40 किमी प्रति सेकंड होती है। इसके अलावा, वैकल्पिक लाल-नीला पैटर्न स्वयं तरंग के अनुरूप गति से बाहर की ओर फैलता है।

ये परिणाम दर्शाते हैं कि केवल अनुप्रस्थ एमएचडी तरंगों के संचरण से ही व्यवस्थित प्रत्यावर्ती वर्णक्रमीय विषमताएं उत्पन्न हो सकती हैं। डीकेआईएसटी जैसी सुविधाओं से प्राप्त उच्च स्थानिक और वर्णक्रमीय रिज़ॉल्यूशन के साथ, इस घटना का अवलोकन शीघ्र ही संभव हो सकता है, जिससे सौर कोरोना में तरंग-चालित गतिकी का एक नया निदान प्राप्त होगा।

अमृतसर में ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों के लिए अब सख्ती होने जा रही है। प्रशासन द्वारा शहर के सात मुख्य चौक में ई-चालान प्रणाली की शुरुआत की जा रही है।

अमृतसर/ सत्ता संदेश

ट्रैफिक को सुव्यवस्थित बनाने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अमृतसर में 1300 से अधिक सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे, जो हर समय आवागमन पर नजर रखेंगे।

ई-चालान सिस्टम लागू होने से पहले अमृतसर की ट्रैफिक ASP अमनदीप कौर ने मीडिया के माध्यम से लोगों को जागरूक किया।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि अब किसी भी प्रकार की सिफारिश स्वीकार नहीं की जाएगी। यदि कोई व्यक्ति व्हाइट लाइन या ट्रैफिक नियम तोड़ता है, तो उसके मोबाइल फोन पर तुरंत ई-चालान का संदेश पहुंच जाएगा।

प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि घर से निकलने से पहले अपने वाहन के सभी दस्तावेज पूरे रखें, ट्रैफिक नियमों का पालन करें, हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग अनिवार्य करें और ट्रैफिक सिग्नल की उल्लंघना करने से बचें।

प्रशासन का कहना है कि इस अभियान का उद्देश्य लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और शहर में ट्रैफिक प्रबंधन को और मजबूत करना है।

अमृतसर से पत्रकार विक्रमजीत सिंह और कैमरामैन तरजिंदर सिंह की रिपोर्ट।

Google का बड़ा झटका! अब फ्री में नहीं मिलेगा 15GB स्टोरेज, यूजर्स को पूरी करनी होगी यह शर्त

टेक डेस्क : अगर आप Gmail, Google Drive और Google Photos का इस्तेमाल करते हैं, तो आपके लिए एक बड़ी खबर है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, गूगल अपने नए अकाउंट्स के लिए मुफ्त क्लाउड स्टोरेज की नीति में बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर रहा है। अब नए यूजर्स को पहले की तरह सीधे 15GB स्टोरेज नहीं मिलेगा।

क्या है नया नियम? सामने आई जानकारी के अनुसार, गूगल एक नया सिस्टम टेस्ट कर रहा है जिसमें नए यूजर्स को डिफॉल्ट रूप से केवल 5GB फ्री स्टोरेज दिया जाएगा। अगर यूजर को पूरा 15GB स्टोरेज चाहिए, तो उसे अपना मोबाइल नंबर लिंक करना होगा। फोन नंबर लिंक करने के बाद ही बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के पूरा 15GB स्टोरेज अनलॉक हो पाएगा।

क्यों लिया जा रहा है यह फैसला? गूगल का मुख्य उद्देश्य फर्जी अकाउंट्स और बॉट गतिविधियों पर लगाम लगाना है। फोन नंबर अनिवार्य करने से कंपनी यह सुनिश्चित कर पाएगी कि एक व्यक्ति कई अकाउंट बनाकर बार-बार मुफ्त स्टोरेज का गलत फायदा न उठा सके। मार्च 2026 के आसपास गूगल ने अपने सपोर्ट पेज पर भी बदलाव करते हुए ’15GB’ की जगह ’15GB तक’ (up to 15GB) लिखना शुरू कर दिया है।

पुराने यूजर्स पर असर राहत की बात यह है कि जो लोग पहले से गूगल अकाउंट इस्तेमाल कर रहे हैं, उन पर फिलहाल इस बदलाव का कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्हें मिलने वाला 15GB स्टोरेज अभी बरकरार रहेगा। हालांकि, भविष्य में कंपनी इसे सभी के लिए लागू करती है या नहीं, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।