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स्वस्थ भारत, सशक्त भारत- स्वास्थ्य देखभाल विकास के 12 वर्ष

दिल्ली / सत्ता संदेश

बेहतर स्वास्थ्य प्रणाली से आर्थिक उत्पादकता बढ़ती है, कार्यबल की संख्या में बढ़ोतरी होती है और विकास दीर्घावधि तक होता है। इसलिए, अच्छी सेहत न केवल समाज के लिए अच्छा संकेत है, बल्कि यह देश की एक संपत्ति भी है। यह वह आधार है, जिस पर मानवीय क्षमता का निर्माण होता है और देश की ताकत मापी जाती है। इसलिए, बेहतर सेहत न केवल समाज के लिए अच्छा है, बल्कि यह देश की एक संपत्ति है और इसमें लगाया गया हर रुपया देश के लोगों में किया गया निवेश है।

इस तरह, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) , यानी यह सुनिश्चित करना कि सभी लोग, चाहे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, बिना किसी आर्थिक परेशानी के, जब और जहाँ ज़रूरत हो, अच्छी गुणवत्ता की सभी ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाएं हासिल कर सकें। यह न केवल 2030 तक हासिल किया जाने वाला सतत् विकास का लक्ष्य है, बल्कि सेहत से जुड़ी एक प्राथमिकता भी है।

भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (एनएचपी 2017), सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) और एसडीजी 3 को हासिल करने के लक्ष्य के अनुरूप है और यह एक सरल लेकिन मज़बूत सोच पर आधारित है – स्वास्थ्य सेवाओं तक हर व्यक्ति की पहुँच होनी चाहिए। इसके चार स्तंभ, किफायती होना, पहुँच, गुणवत्ता और उपलब्धता , उस सोच को वास्तिवकता में बदलते हैं और जीवन के सभी चरणों में देखभाल की एक व्यापक व्यवस्था को मज़बूत करते हैं। लक्ष्यों के अनुरूप, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन राज्यों को स्वास्थ्य प्रणाली का एक एकीकृत तीन-स्तरीय मॉडल प्रदान करने में मदद करता है, जिसमें ग्रामीण और शहरी इलाकों (कमज़ोर वर्गों सहित) के बीच दोतरफा रेफरल लिंक शामिल हैं।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर (एएएम) प्राथमिक स्तर पर बीमारी से बचाव, सेहत को बढ़ावा देने, इलाज, पुर्नवास और प्रशामक देखभाल जैसी व्यापक स्वास्थ्य सेवाएँ देते हैं। ईसंजीवनी टेलीमेडिसिन प्लेटफ़ॉर्म इन एएएम के ज़रिए समुदाय को विशेषज्ञों से जोड़कर विशेषज्ञों की उपलब्धता सुनिश्चित करता है। साथ ही, एक खास टेली-मानस प्लेटफ़ॉर्म भी है, जिसने अब तक कुल 38.93 लाख लोगों तक पहुँच बनाई है।

एएएम से जुड़े द्वितीय स्तर के केंद्र जैसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी)/प्रथम रेफरल इकाई (एफआरयू) और ज़िला अस्पताल (डीएच) होते हैं, जो विशेषज्ञ के समक्ष इलाज और अस्पताल में भर्ती होने की सुविधा के लिए रेफरल का पहला ज़रिया होते हैं। वहीं, मेडिकल कॉलेज जैसे तृतीयक संस्थान सबसे ऊपर होते हैं और ज़्यादा जटिल व सुपर-स्पेशलिस्ट सेवाओं की ज़रूरतें पूरी करते हैं।

इस तीन-स्तरीय प्रणाली को सरकारी स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी का समर्थन प्राप्त है। पिछले दशक में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर होने वाला खर्च 168% बढ़ गया है, जो स्वास्थ्य को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानने के सरकार के संकल्प को दर्शाता है।

आयुष्मान आरोग्य मंदिर का सफ़र व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के विस्तार और प्रतिक्रियात्मक कार्यवाही से समस्या होने से पहले ही ध्यान रखने वाली देखभाल की ओर ज़रूरी बदलाव को दिखाता है। व्यापक स्वास्थ्य पैकेजों की संख्या 6 से बढ़ाकर 12 करना, भारत की बदलती आबादी और बीमारियों के बदलते पैटर्न के हिसाब से उठाया गया एक ज़रूरी कदम है। बढ़ती उम्र की आबादी और गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते मामलों की दोहरी चुनौतियों का सामना करते हुए, इसके दायरे में गैर-संचारी रोग, मानसिक स्वास्थ्य, बुजुर्गों की देखभाल, आपातकालीन सेवाएँ, आँख, कान-नाक-गला (ईएनटी) और मुँह की सेहत के साथ-साथ योग और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली गतिविधियाँ शामिल हैं। यह सब उस आबादी की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जो भारत अब बन रहा है।

मई 2026 तक, देश भर में 1.8 लाख से ज़्यादा एएएम काम कर रहे हैं, ताकि लोगों को उनके घर के पास स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें। इस विस्तार का असर एएएम में 120 करोड़ से ज़्यादा ओपीडी परामर्श, 70 करोड़ से ज़्यादा ईसंजीवनी टेली-परामर्श और अच्छी सेहत व कल्याण को बढ़ावा देने वाले 46.1 करोड़ से ज़्यादा वेलनेस सत्रों में साफ़ दिखता है।

प्राथमिक देखभाल स्तर पर, डायबिटीज, हाइपरटेंशन और आम कैंसर (जैसे ओरल, ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर) के लिए आबादी-आधारित स्क्रीनिंग 30 साल से ज़्यादा उम्र के सभी वयस्कों के लिए की जाती है, जिससे बीमारी का जल्दी पता लगाना एक सामान्य प्रक्रिया बन जाती है। यह जांच ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर’ के तहत सेवा वितरण का एक अहम हिस्सा है, जो एनसीडी की रोकथाम को व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में शामिल करती है। एनसीडी सेवाओं का विस्तार बीमारी का जल्दी पता लगाने, रोकथाम, प्रबंधन और इलाज के लिए एक बहु स्तरीय प्रयास है। समर्पित एनसीडी क्लीनिक, डे-केयर कैंसर केंद्र , तृतीयक देखभाल कैंसर केंद्र और राज्य कैंसर संस्थान, उन्नत ऑन्कोलॉजी सेवाओं को विकेंद्रीकृत करते हैं और विशेषज्ञ देखभाल को मरीज़ के करीब लाते हैं।

साथ ही, बचाव से जुड़ी गतिविधियों के लिए ‘होल-ऑफ-गवर्नमेंट’ दृष्टिकोण अपनाया जाता है। एफएसएसएआई स्वस्थ खान-पान की आदतों को बढ़ावा देता है, ‘फिट इंडिया मूवमेंट’ शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है और आयुष मंत्रालय योग और कल्याण को आगे बढ़ाता है। लगातार चलने वाले जन-जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य दिवस मनाने जैसे कार्यक्रम इन प्रयासों को और मज़बूत करते हैं। खाने के तेल की खपत को 10% कम करने की प्रधानमंत्री मोदी की निजी अपील एक सरल लेकिन दमदार सोच को ज़ाहिर करती है कि एनसीडी के ख़िलाफ़ लड़ाई अस्पतालों के साथ-साथ घरों में भी जीती जाती है।

प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के विस्तार के लिए, एएएम स्तर पर ‘सामुदायिक स्वास्थ्य ऑफिसर्स’ का एक नया कैडर शुरू किया गया, जिससे क्लिनिकल और जन स्वास्थ्य से जुड़ी विशेषज्ञता समुदायों के और करीब आ गई। यह विस्तार लोगों के घर-द्वार तक भी पहुँचा, जहाँ फ्रंटलाइन नेटवर्क बढ़कर 10 लाख से ज़्यादा आशा (आशा) कार्यकर्ताओं तक पहुँच गया, जिन्होंने समुदाय को स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ा।

विस्तार के साथ-साथ, भारत ने देखभाल के मापदंडों को बदलने की ज़्यादा मुश्किल चुनौती भी स्वीकार की। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक, जो देश में ही विकसित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमाणीकृत हैं, ने गुणवत्ता को सिर्फ़ एक इच्छा से बदलकर एक जवाबदेही बना दिया। 65,000 से ज़्यादा जन स्वास्थ्य केंद्र, जिनमें 54,926 आयुष्मान आरोग्य मंदिर शामिल हैं, अब एनक्यूएएस द्वारा प्रमाणीकृत हैं। इसके अलावा, आईपीएचएल के लिए लैब मानकों ने व्यवस्था में और मज़बूती और सटीकता लाई है।

एनक्यूएएस की सफलता का राज़ सिर्फ़ मानदंड नहीं, बल्कि उसके आस-पास बनी व्यवस्था था, जैसे माँ और नवजात शिशु की देखभाल के लिए ‘लक्ष्य’, साफ़-सफ़ाई और संक्रमण नियंत्रण के लिए ‘कायाकल्प’ और बच्चों की सेहत के लिए ‘मुस्कान’। इन सभी ने मिलकर गुणवत्ता को सिर्फ़ एक मानक के बजाय एक आधारभूत स्तर बना दिया है। नतीजा यह है कि अब ऐसी व्यवस्था तैयार हुई है, जिसमें न सिर्फ़ ज़्यादा लोगों का इलाज होता है, बल्कि बेहतर इलाज भी किया जाता है।

अगर प्राथमिक देखभाल व्यवस्था का पहला वादा है, तो राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन और ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम जैसे खास कार्यक्रम देश भर में ओओपीई को कम करने के सरकार के संकल्प को और दिखाते हैं। इससे उन परिवारों की कुल मिलाकर 10,102 करोड़ रुपये से ज़्यादा की बचत हुई है, जिन्हें वरना यह बोझ अकेले उठाना पड़ता।

लोगों की सेहत की ज़िम्मेदारी लोगों को ही सौंपते हुए, भारत ने अपने सामुदायिक मंचों को मज़बूत किया है। यह एक सोच-समझकर बनाया गया, विकेंद्रीकृत ढांचा है, जो योजनाकृत, निगरानी और जवाबदेही को स्थानीय लोगों के हाथों में सौंपता है। विलेज हेल्थ, सैनिटेशन एंड न्यूट्रिशन कमिटीज़ (वीएचएसएनसी), जन आरोग्य समितियां (जेएएस) और रोगी कल्याण समितियां (आरकेएस) ने पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय भागीदार बनाया है। शहरी इलाकों में, महिला आरोग्य समितियां (एमएएस) पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसेमंद प्रतिक्रिया के लिए समुदाय की आवाज़ को अहमियत देते हुए, महिलाओं को सामुदायिक आउटरीच के केंद्र में रखकर इस फ़ोकस को और गहरा करती हैं।

वास्तविक स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ है आज के खतरों के साथ-साथ कल के खतरों के लिए भी तैयार रहना। 2021 में 64,180 करोड़ रुपये के बजट के साथ शुरू की गई पीएम-एबीएचआईएम योजना सीधे तौर पर कोविड-19 से मिले सबक पर आधारित है, जैसे कि अचानक बढ़ने वाली ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता बनाना, लेबोरेटरी नेटवर्क को मज़बूत करना, बीमारियों की वास्तविक समय में निगरानी का दायरा बढ़ाना और ‘वन हेल्थ’ शोध ढ़ांचा विकसित करना। असल में, यह मुश्किल समय से मिले सबक को एक मज़बूत जन स्वास्थ्य प्रणाली में बदलने का काम है।

जब बीमारी के लिए अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत पड़ती है, तो आयुष्मान भारत पीएम-जेएवाई आर्थिक मदद प्रदान करता है, जिससे इलाज का खर्च परिवार के लिए भारी बोझ नहीं बनता। दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना होने के नाते, यह हर परिवार को हर साल द्वितीय और तृतीयक देखभाल के लिए 5 लाख रुपये तक की सुविधा देती है। यह सुरक्षा 2024 में 70 साल से ज़्यादा उम्र के सभी वरिष्ठ नागरिकों को भी दी गई, चाहे उनकी आय कुछ भी हो।

इन सभी पहलों के पीछे एक डिजिटल आधार है, जिसके बिना इतने बड़े पैमाने पर व्यवस्था काम नहीं कर सकती। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन के तहत आभा आईडी, अंतर सचालित स्वास्थ्य जानकारी और यूनिफाइड हेल्थ इंटरफेस ने रिकॉर्ड को पोर्टेबल, पहुंच को आसान और सेवाओं के वितरण को और बेहतर बना दिया है। भारत की डिजिटल स्वास्थ्य प्रणाली की ओर बढ़ने के साथ ही अब तक लगभग 91 करोड़ आभा आईडी बनाई जा चुकी हैं।

कुल मिलाकर, मुफ्त सेवाएं, सामुदायिक स्तर पर निदान, अग्रिम पंक्ति के विशेषज्ञ, रेफरल परिवहन, डायलिसिस, अस्पताल में भर्ती होने का खर्च और एक डिजिटल आधार, केवल योजनाओं का संग्रह नहीं हैं, बल्कि ये एक प्रणाली का निर्माण करते हैं। लिहाज़ा ये स्वास्थ्य संबंधी लाभ आकस्मिक नहीं हैं। ये सतत्, कई स्तरों पर किए गए सार्वजनिक निवेश का कारगर परिणाम हैं।

ये नतीजे अब अमूर्त नहीं हैं, वे भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। मातृ मृत्यु दर 2004-06 में प्रति लाख जीवित जन्मों पर 254 से घटकर 2022-24 में 87 हो गई है, जो एनएचपी 2017 के लक्ष्यों को पूरा करती है। 1990 से 2024 तक, भारत ने एमएमआर में 84% की कमी की है, जो वैश्विक स्तर पर 48% की गिरावट से लगभग दोगुनी है और इसी वजह से मातृ स्वास्थ्य और परिवार नियोजन में नेतृत्व के लिए यूएनएफपीए की मान्यता प्राप्त की है। व्यापक तस्वीर भी यही कहानी बयां करती है: नवीनतम एनएफएचएस के अनुसार, प्रजनन दर 2.0 तक पहुंच गई है, संस्थागत प्रसव 90.6% तक बढ़ गए हैं और पूर्ण टीकाकरण अब 98.6% है। ये एक ऐसी प्रणाली के संकेत हैं, जो रोकथाम, पहचान और प्रतिक्रिया करना सीख रही है। यही कारण है कि भारत की उन्मूलन उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं: 2015 में मातृ एवं नवजात टेटनस और 2024 तक ट्रेकोमा का सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में उन्मूलन। ऐसा करने वाला भारत दक्षिण-पूर्व एशिया का तीसरा देश बन गया है।

यह व्यापक सबक है। एनएचपी 2017 ने दिशा निर्धारित की, एनएचएम ने उप-स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर तृतीयक अस्पतालों तक वितरण अवसंरचना का निर्माण किया और आयुष्मान भारत ने उस प्रणाली को उसके चार कार्यशील स्तंभ दिए: प्राथमिक देखभाल के लिए एएएम, वित्तीय सुरक्षा के लिए पीएम-जेएवाई, सशक्तिकरण और अवसंरचना के लिए पीएम-एबीएचआईएम, और डिजिटल आधार के लिए एबीडीएम। मुफ्त दवाओं, निदान, परिवहन और डायलिसिस के साथ मिलकर, ये योजनाएँ मात्र योजनाओं का संग्रह नहीं हैं। ये हमारे लोगों के लिए एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य कवच का निर्माण करती हैं और यह याद दिलाती हैं कि जब सार्वजनिक स्वास्थ्य को राष्ट्र निर्माण के रूप में देखा जाता है, तो यह जीवन और देश के भविष्य दोनों को बदल सकता है।

(लेखक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और रसायन एवं उर्वरक राज्य मंत्री हैं)

आंकड़ों से आपूर्ति तक: आईसीएमआर बेहतर भविष्य के लिए भारत के स्वास्थ्य अनुसंधान को नए सिरे से आकार दे रहा है

“प्रभाव अकेले किसी व्यक्ति से नहीं – बल्कि प्रणालियों के तालमेल से संभव होता है। साथ मिलकर, हम आंकड़ों से… निर्णय … और फिर प्रभाव छोड़ने तक की यात्रा पूरी करेंगे।”


अब जबकि देश ‘विकसित भारत 2047’ के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, हमारे सामने सवाल सिर्फ बीमारियों का इलाज करने के तरीकों का नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरतों का अनुमान लगा लेने वाली एक ऐसी स्वास्थ्य प्रणाली के निर्माण का भी है जो सबके लिए न्यायसंगत और नई सोच पर आधारित हो। इस बदलाव के केन्द्र में स्वास्थ्य अनुसंधान का एक ऐसा नया दृष्टिकोण है, जो आंकड़ों (डेटा) को निर्णयों से और फिर निर्णयों को प्रभाव से जोड़ता है।


कोविड-19 महामारी से मिले कठोर अनुभवों से सीख लेते हुए, जैव-चिकित्सा अनुसंधान (बायोमेडिकल रिसर्च) की देश की शीर्ष संस्था, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई सुधार किए हैं। इन सुधारों में संस्थागत ढांचे को नए सिरे से तैयार करने से लेकर अनुसंधान के लिए फंड देने और उसे असरदार नतीजों में बदलने के तरीकों को ठोस बनाना शामिल है। जो प्रणाली कभी बिखरी हुई और जांचकर्ताओं की पूछताछ पर टिकी थी, वह अब तकनीक द्वारा संचालित और लक्ष्यों पर केन्द्रित एक इकोसिस्टम में बदल रही है। यह बदलाव महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि दार्शनिक भी है। यह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप, संस्थान-आधारित समन्वित अनुसंधान की दिशा में एक ऐसी सोची-समझी पहल को दर्शाता है, जहां विज्ञान का उद्देश्य सिर्फ ज्ञान का सृजन करना नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों का समाधान करना भी है।


इस बदलाव का एक मुख्य आधार आईसीएमआर के संस्थागत ढांचे का पुनर्गठन है। हालिया सुधारों ने कई संस्थानों के दायित्वों को बढ़ाया है और उन्हें सीमित दायरे वाली इकाइयों के बजाय अंतर-विषयक केन्द्रों के रूप में नई पहचान दी है। डिजिटल हेल्थ एवं डेटा साइंस, बच्चों की सेहत, महिलाओं की सेहत, और खून व प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी बीमारियों जैसे क्षेत्रों की ओर संस्थानों का झुकाव, भारत में बीमारियों के बदलते स्वरूप और तकनीकी क्षमताओं को दर्शाता है। देश भर में – पूर्वोत्तर के डिब्रूगढ़ से लेकर पश्चिम के जोधपुर तक – क्षेत्रीय ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ रिसर्च’ के नेटवर्क का निर्माण एक और अहम कदम है। ये संस्थान राज्य और जिला स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ मिलकर संक्रियात्मक अनुसंधान (ऑपरेशनल रिसर्च) करेंगे, ताकि जरूरी अनुसंधान और उसके नतीजों का जमीनी स्तर पर सदुपयोग सुनिश्चित किया जा सके। ये कोई मामूली बदलाव नहीं हैं, बल्कि भविष्य की जरूरतों के अनुरूप तैयार विज्ञान की दिशा में एक ऐसे रणनीतिक बदलाव का संकेत हैं जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोमिक्स और रियल-टाइम डेटा सिस्टम सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े निर्णयों में अहम भूमिका निभाते हैं।


अलग-थलग रहकर काम करने के तरीके से हटकर एक आपस में जुड़े हुए राष्ट्रीय अनुसंधान इकोसिस्टम की दिशा में बढ़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब संस्थानों को ऐसे रिसोर्स सेंटरों के तौर पर देखा जा रहा है जो एक साझा राष्ट्रीय मिशन में योगदान दें और किसी एक स्थान पर मिले साक्ष्यों का उपयोग पूरे देश में कार्रवाई के लिए किया जाना सुनिश्चित करें। प्रणालीगत-स्तर की यह सोच एक ऐसे दौर में बेहद जरूरी है जब स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां – चाहे वे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) या महामारी या फिर गैर-संचारी रोगों से जुड़ी हों – जटिल और आपस में जुड़ी हुई हैं। संस्थागत सुधारों के साथ-साथ, अनुसंधान से संबंधित फंडिंग इकोसिस्टम को बुनियादी तौर पर फिर से तैयार करना भी जरूरी है। फंडिंग के तरीके की दृष्टि से, आंतरिक (इंट्रा-म्यूरल) और बाह्य (एक्स्ट्रा-म्यूरल) अनुसंधान के बीच का विभाजन बिल्कुल साफ है। लेकिन साथ ही, उन्हें एक अपेक्षाकृत अधिक एकजुट और नतीजे पर केन्द्रित ढांचे के जरिए जोड़ा जाता है। आंतरिक अनुसंधान (इंट्राम्यूरल रिसर्च) अब मुख्य रूप से संस्थान की पहल पर की जाती है। यह स्पष्ट रूप से तय लक्ष्यों के अनुरूप होती है और अनुसंधान के नतीजों को असल इस्तेमाल में लाने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए इसे एक तय समय-सीमा के भीतर व्यवस्थित किया जाता है। दूसरी ओर, बाह्य अनुसंधान (एक्स्ट्रा- म्यूरल रिसर्च) को चार चरणों वाले नवाचार चक्र – विवरण, खोज, विकास और आपूर्ति – में फिर से व्यवस्थित किया गया है। इससे अच्छे विचारों को व्यवस्थित तरीके से ऐसे समाधानों में बदला जाना सुनिश्चित होता है, जिन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके।


प्रयोगशाला में की गई खोज से लेकर आम लोगों तक सेवा पहुंचाने तक की यह समन्वित प्रक्रिया, परियोजनाओं को फंड देने के बजाय समाधान तैयार करने की दिशा में एक अहम बदलाव है। इसे ‘नेशनल हेल्थ रिसर्च प्रोग्राम’ (एनएचआरपी) से और मजबूती मिलती है। इस कार्यक्रम ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस) एवं क्षय रोग से लेकर मानसिक स्वास्थ्य, पोषण और आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) जैसे तेरह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की है। मिशन-मोड वाले ये कार्यक्रम वैसे विविध संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए हैं, जिन्हें बड़े निवेश और असल नतीजों पर साफ फोकस का समर्थन हासिल है।


तकनीक भी परिवर्तनकारी भूमिका निभा रही है। डायग्नोस्टिक्स, निगरानी और कार्यक्रम को लागू करने की प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को शामिल करने से शहरी और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं के बीच लंबे समय से चली आ रही खाई को पाटने में मदद मिल रही है। जहां क्षय रोग (टीबी) और डायबिटिक रेटिनोपैथी की जांच में एआई-आधारित उपकरण पहले से ही अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मदद कर रहे हैं, वहीं एआई-संचालित पोषण संबंधी निगरानी (न्यूट्रिशनल मॉनिटरिंग) जैसे रचनात्मक कदम बड़े पैमाने पर कार्यक्रम के कार्यान्वयन को बेहतर बना रहे हैं। टीके (वैक्सीन) पहुंचाने से शुरू हुई और अब कॉर्निया जैसी जरूरी चिकित्सीय आपूर्ति सुनिश्चित करने की विस्तारित भूमिका निभाने वाली ‘आई-ड्रोन’ पहल, इस बात को दर्शाती है कि कैसे आधुनिक तकनीक भौगोलिक बाधाओं को पार करके समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा सकती है। विज्ञान के मोर्चे पर, चिकित्सा तकनीक (मेडटेक) के दायरे में हो रही प्रगति – जिसमें चिकित्सीय उपकरणों एवं डायग्नोस्टिक्स से लेकर अगली पीढ़ी के टीके और इलाज के तरीके शामिल हैं – मरीजों पर केन्द्रित और अधिक सटीक इलाज को संभव बना रही है। इसके साथ ही, नए एवं साक्ष्यों पर आधारित मॉडलों के जरिए पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को शामिल करने की प्रक्रिया को दुनिया भर में पहचान मिल रही है। स्थानीय स्तर पर रचनात्मकता को बढ़ावा देने के कदमों से इन प्रयासों को और मजबूती मिल रही है। फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज जैसी योजनाओं के साथ-साथ मेडटेक-मित्र; और;मेडिकल इनोवेशन-पेटेंट मित्र; जैसे प्लेटफॉर्म, अनुसंधान से लेकर व्यावसायीकरण तक की यात्रा को गति दे रहे हैं। इससे सरकारी फंडिंग से होने वाली वैज्ञानिक प्रगति का लोगों के लिए सस्ती एवं आसानी से उपलब्ध होने वाली तकनीक में बदल जाना सुनिश्चित हो रहा है।


हालांकि, इन सुधारों की असली परख जन-स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव से होती है। ‘इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव’ जैसी पहलों ने यह दिखाया है कि साक्ष्यों पर आधारित रणनीतियां कैसे बड़े पैमाने पर पुरानी बीमारियों के प्रबंधन में बदलाव ला सकती हैं। आपातकालीन देखभाल (इमरजेंसी केयर) के क्षेत्र में मिशन-मोड प्रोग्राम, जिनमें मोबाइल स्ट्रोक यूनिट और तेजी से काम करने वाले कार्डियक रिस्पॉन्स सिस्टम शामिल हैं, जानलेवा स्थितियों में इलाज के नतीजों को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। डायग्नोस्टिक नेटवर्क का विस्तार और स्वदेशी तकनीकें, कैंसर से लेकर संक्रामक बीमारियों के प्रकोप तक की विभिन्न बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और उनके इलाज की प्रक्रिया को बेहतर बना रही हैं। ये कोशिशें ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017’ के अनुरूप हैं, जो बीमारी से बचाव और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने और अच्छी गुणवत्ता वाली देखभाल पर जोर देती हैं। ये समानता के प्रति एक व्यापक प्रतिबद्धता को भी दर्शाती हैं ताकि वैज्ञानिक प्रगति का लाभ इलाके या सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बंधनों से परे हर नागरिक तक पहुंचे। भविष्य की ओर देखते हुए, हमारा दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट है। आईसीएमआर एक उत्प्रेरक के तौर पर काम करना जारी रखेगा और एक मजबूत व तेजी से सक्रिय होना वाला स्वास्थ्य इकोसिस्टम बनाने हेतु अनुसंधानकर्ताओं, डॉक्टरों, नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत को एक मंच पर लाएगा। वर्ष 2047 का रोडमैप डिजिटल हेल्थ, बायो-मैन्यूफैक्चरिंग और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) के क्षेत्र में हुई प्रगति से तय होगा, जिसमें क्षमता विकास और वैश्विक सहयोग पर खास जोर दिया जाएगा।


यह समझना जरूरी है कि स्वास्थ्य अनुसंधान कोई अलग-थलग रहकर किया जाने वाला काम नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रयास है। आईसीएमआर में हो रहा बदलाव सभी हितधारकों को इस यात्रा में शामिल होने, मिलकर समाधान तैयार करने और यह सुनिश्चित करने का एक न्योता है कि विज्ञान सबसे सार्थक तरीके से समाज की सेवा करे। स्वास्थ्य अनुसंधान प्रणाली में सुधार अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है। यह वह नींव है जिस पर एक स्वस्थ, अधिक न्यायसंगत और अधिक सुदृढ़ भारत का निर्माण होगा – एक ऐसा भारत जहां हर खोज का लाभ लोगों तक पहुंचेगा और हर नए कदम का प्रभाव वास्तव में दिखाई देगा।


(लेखक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग के सचिव और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक हैं)

भारत का सांस्कृतिक पुनरोद्धार काल : गजेन्द्र सिंह शेखावत

भारत आज विकास के विभिन्न आयामों में तेज गति से प्रगति कर रहा है। अर्थव्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा, ऊर्जा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, राष्ट्रीय सुरक्षा, विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में देश नई ऊंचाइयों को छू रहा है। भौतिक प्रगति के इन आयामों में आगे बढ़ते हुए यह भी आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन संस्कृति, इतिहास, धरोहर और विरासत को विस्मृत ना करें। भारत विश्व की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में से एक है, शताब्दियों तक विदेशी आक्रांताओं के साथ चले संघर्ष में देश में राजनीतिक सत्ता में परिवर्तन आता रहा, लेकिन भारत अपनी संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सफलतापूर्वक स्थानांतरित करता रहा। इन वर्षों में हुई राजनीतिक उथल पुथल में हमारे अनेक उपासना स्थल, ग्रंथ, पुस्तकालय, विश्वविद्यालयों का विध्वंस किया गया, लेकिन हमारी संस्कृति और परंपराएं फिर भी जीवित रहीं। सांस्कृतिक भारत पर दूसरी चोट हमारी शिक्षा पद्धति को बदलने से हुई, जिसके द्वारा हमारे अंतर्मन में अपनी संस्कृति के प्रति हीन भावना उत्पन्न करने के प्रयास हुए।
वर्ष 2014 से भारत ने आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के साथ साथ सांस्कृतिक रूप से भी एक बड़ी करवट ली, जिसे हम संस्कृति के पुनरोद्धार के आरंभ का वर्ष भी कह सकते हैं। सांस्कृतिक भारत आज अपने गौरवशाली अतीत को पुनः स्मरण करते हुए उसके वैभव, उसकी भव्यता को ना सिर्फ पुनर्स्थापित कर रहा है, बल्कि सामाजिक जीवन में भी वह संस्कृति पुनः स्थापित हो रही है। आज हमारे उत्सव, प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक, खान-पान, वस्त्र, कला, नृत्य, संगीत, शास्त्र, शिल्प वैश्विक आकर्षण के केंद्र बन रहे हैं।

भारतीय संस्कृति की बढ़ती स्वीकार्यता

पिछले 12 वर्षों में विश्व में भारतीय संस्कृति की स्वीकार्यता बढ़ी है। आज पूरा विश्व 21 जून को योग दिवस मना रहा है। ये सिर्फ एक शारीरिक व्यायाम नहीं, अपितु यह प्राचीन भारतीय दर्शन हैस जिसे विश्व ने मान्यता दी। मानव जीवन में उसकी उपयोगिता को देखते हुए उसे अपनाया। आज विश्व के अनेक देशों से हमारी धरोहरें वापस देश में लौटीं हैं, जिनकी संख्या भी एक रोचक तथ्य है। वर्ष 2013 से पूर्व मात्र 13 धरोहरों को विदेशों से भारत लाया गया था, जबकि पिछले 12 वर्षों में 640 से अधिक धरोहरें विदेशों से भारत लौटी हैं। ये दर्शाता है कि संस्कृति में सिर्फ परंपराएं ही नहीं, अपितु संस्कृति के प्रतीक चिह्नों को वापस लाने के प्रति भी हमने गंभीरता दिखाई है। ये प्रतीक चिह्न हमारे लिए गौरव का विषय हैं, जो हमारे पूर्वजों की कला, शिल्प और विभिन्न विषयों के ज्ञान की निशानियां हैं, जिनसे हमें प्रेरणा मिलती है। दुर्गा पूजा और दीपावली जैसे हमारे सामाजिक उत्सवों को यूनेस्को ने विश्व की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है। यह मान्यता मात्र उत्सवों को ही नहीं, अपितु इनके पीछे छुपे उन संदेशों को भी मिली है, जो बताती है कि असत्य पर सदैव सत्य की विजय होती है, बुराई हमेशा अच्छाई से पराजित होती है। हमारे प्राचीन इतिहास को भी आज यूनेस्को ने स्वीकारा है। उसका प्रमाण है कि भारत 44 विश्व धरोहर स्थलों के साथ ही विश्व में छटे और एशिया में दूसरे स्थान पर है। यह धरोहरें हमारी विरासत की प्रतीक हैं, जिन्हें देखकर भारतीयों को अपनी संस्कृति और इतिहास का परिचय मिलता है और उस पर गर्व होता है।

भूले और बिखरे ज्ञान का पुनर्संकलन

भारत एक लंबे समय तक विदेशी आक्रांताओं के साथ संघर्षरत रहा है। ज्ञान और संस्कृति का सम्मान ना करने वाले इन विदेशी आक्रमणकारियों ने देश के ज्ञान की अमूल्य विरासत रहे हमारे विश्वविद्यालय, गुरुकुल और पांडुलिपियों में लिखित ज्ञान को नष्ट करने के प्रयास किए। एक लंबे कालखंड में हमारी ज्ञान परंपरा की अमूल्य निधि पांडुलिपियां विभिन्न मठों, मंदिरों, संस्थानों और घरों में संरक्षित की गईं, जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया। ये दुःख का विषय है कि स्वतंत्रता के बाद भी इन्हें संकलित कर प्राचीन ज्ञान को पुनः प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

आज संपूर्ण देश में ज्ञान भारतम् राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के तहत इन पांडुलिपियों को सूचीबद्ध किया जा रहा है। यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि समस्त भारत से अब तक 88 लाख से अधिक पांडुलिपियां प्राप्त हो चुकी हैं। इस ज्ञान को संकलित करने के साथ ही इन्हें आधुनिकतम तकनीक के साथ डिजिटाइज किया जा रहा है। इनमें लिखित ज्ञान को संरक्षित और सुरक्षित करने के लिए ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) सहित विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। आने वाले समय में यह संकलन हमारी भावी पीढ़ियों को अध्यात्म, विज्ञान, कला, शिल्प जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय प्राचीन ज्ञान और उसकी उत्कृष्टता से परिचित कराएगा और उस पर गर्व करने को प्रेरित करेगा।

संस्कृति के प्रतीक चिह्नों का पुनरोत्थान

भारत के मंदिर, किले, मेले, ऐतिहासिक धरोहर स्थल हमारी गौरवशाली संस्कृति और इतिहास के प्रतीक चिह्न हैं। यह दुःख का विषय है कि स्वतंत्रता के बाद से भारत के इन सांस्कृतिक स्थलों की उपेक्षा की गई। कुछ ही स्मारकों का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार किया गया। यह मंदिर भारत की विविधता भरी संस्कृति को एक सूत्र में जोड़ कर रखते हैं। देश के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल वर्षों से उपेक्षा और अव्यवस्था का शिकार रहे। पिछले 12 वर्षों में इन स्थलों का कायाकल्प किया गया है। आज भारत में देश की प्राचीन संस्कृति के वाहक रहे काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक कॉरिडोर, केदारनाथ, सोमनाथ सहित विभिन्न मंदिरों और तीर्थनगरियों का व्यापक विकास किया गया है, श्रद्धालुओं के लिए वहां सुविधाएं विकसित की गई हैं, जिससे आध्यात्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति जागरुकता भी आई। आज इन स्थानों पर आने वाले युवाओं की बढ़ती संख्या भारतीय संस्कृति के पुनरोत्थान का प्रतीक है। इन स्थानों के विकास और यहां की यात्राओं से युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व का एहसास बढ़ा है।


विरासत भी, विकास भी

आज हमारी संस्कृति के प्रतीक चिह्न हमारे धार्मिक स्थल, मंदिर, धार्मिक मेले स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बने हुए हैं। आध्यात्मिक पर्यटन बढ़ने से स्थानीय इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के साथ ही इन नगरों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे लोगों की जीवनशैली में व्यापक सुधार हुआ है। आज ऋषिकेश, अयोध्या, प्रयागराज, काशी सहित भारत के विभिन्न आध्यात्मिक नगरों में विदेशी पर्यटक बड़ी संख्या में भारतीय संस्कृति को जानने और समझने के लिए आ रहे हैं। भारतीय संस्कृति की व्यापकता से अभिभूत हो रहे हैं। इससे ना सिर्फ भारत की संस्कृति को प्रचार प्रसार मिल रहा है बल्कि अर्थव्यवस्था को भी लाभ पहुंच रहा है।


जड़ों से जुड़ता भारत

आज भारत अपनी प्राचीन विरासत पर गर्व करते हुए आधुनिक विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। आज भारत भूली बिसरा दी गई अपनी संस्कृति के पुनर्जागरण का एक नया अध्याय लिख रहा है। अनेक शताब्दियों तक संघर्ष में उलझा रहा भारत एक नई करवट के साथ आज अपनी पुरानी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित कर रहा है। भारत आज विश्व को बता रहा है कि कैसे प्राचीन परंपरा और संस्कृति के साथ आधुनिकता को अपनाया जा सकता है, आने वाला समय नए भारत का है। भविष्य में भारत का विचार, भारत का दर्शन, भारत की संस्कृति विश्व को नई दिशा देने जा रही है।

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार है)

छोटे शहरों से ग्लोबल कैंपस तक: स्कॉलरशिप कैसे सपनों को उड़ान भरने में मदद करती है : सुधांश पंत

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत के गांवों और छोटे शहरों से लेकर ऑक्सफ़ोर्ड और जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के गलियारों और हरे-भरे बगीचों तक, नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप (NOS) स्कीम अलग-अलग महाद्वीपों में उम्मीदों की यात्रा को ताकत दे रही है।


त्रिपुरा के एक दूर-दराज़ और पिछड़े गांव में, दीपायन भौमिक ने कभी आर्किटेक्ट बनने का सपना देखा था, जबकि वे इंटरनेशनल एजुकेशन से जुड़े मौकों से बहुत दूर पले-बढ़े थे। फिर भी, पढ़ाई में लगन और नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप के सपोर्ट से, दीपायन ने जर्मनी की स्टटगार्ट यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर और अर्बन डिज़ाइन में मास्टर ऑफ़ साइंस की डिग्री हासिल की।


जर्मनी में रहने, पढ़ाई करने और काम करने से उन्हें एक अलग-अलग तरह के इंटरनेशनल माहौल का सामना करना पड़ा, जिसने न सिर्फ़ उनकी पढ़ाई की समझ को बदला, बल्कि समाज, सस्टेनेबिलिटी और अर्बन डेवलपमेंट के प्रति उनके नज़रिए को भी बदल दिया। आर्किटेक्चर और अर्बन डिज़ाइन के लिए भारतीय और जर्मन दोनों तरीकों से प्रेरणा लेकर, वे अपनी सीख का इस्तेमाल करने के इरादे से भारत लौट आए। आज, दीपायन अपनी खुद की आर्किटेक्चरल प्रैक्टिस चलाते हैं, अपने प्रोफेशनल काम से समाज में योगदान देते हैं और दूसरों के लिए मौके भी बनाते हैं। वह उन सैकड़ों अनुसूचित जाति के स्टूडेंट्स में से एक हैं जिनकी ज़िंदगी की दिशा नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप (NOS) की वजह से पूरी तरह बदल गई है। यह भारत सरकार की एक पहल है जो टॉप विदेशी यूनिवर्सिटीज़ में पोस्टग्रेजुएट और डॉक्टरेट की पढ़ाई के लिए फंड देती है। इस स्कीम में ट्यूशन, ट्रैवल, रहने का खर्च और दूसरी एकेडमिक ज़रूरतें शामिल हैं, जिससे यह पक्का होता है कि किसी वर्ल्ड-क्लास यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलना स्टूडेंट के परिवार की आर्थिक हालत पर निर्भर नहीं करता।


ऐसी सैकड़ों कहानियाँ हैं जहाँ परिवारों ने पहली बार पासपोर्ट देखा है और ऐसे कई माता-पिता हैं जो अपने बच्चों को दूर देशों में भेज देते हैं, जबकि उन्होंने खुद देश के कॉलेजों में कदम भी नहीं रखा है।


2014 से, NOS स्कीम ने UK से जर्मनी, US से ऑस्ट्रेलिया तक, 21 देशों की यूनिवर्सिटीज़ में सालाना 8 लाख रुपये से कम कमाने वाले परिवारों के स्टूडेंट्स की मदद की है। ऐसे कई परिवारों के लिए, विदेशी यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए अप्लाई करने के लिए भी उन्हें पास के किसी साइबरकैफ़े में जाना पड़ता था। डॉ. वैथिलिंगम राजेंद्रन, एक सीनियर साइंटिस्ट, जिन्होंने यूनाइटेड स्टेट्स में ओक्लाहोमा स्टेट यूनिवर्सिटी से केमिस्ट्री में PhD की, दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले माता-पिता के बेटे के तौर पर बड़े हुए। उन्होंने अपनी स्कूलिंग और अंडरग्रेजुएट एजुकेशन पास के सरकारी इंस्टीट्यूशन से पूरी की और हायर स्टडीज़ के दौरान पैसे की तंगी से जूझते रहे। फिर भी, पक्के इरादे और लगातार कोशिशों से, उन्होंने अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई कामयाबी से पूरी की और एक शानदार साइंटिफिक करियर बनाया।


ये स्टूडेंट्स सिर्फ़ एक डिग्री या ज़्यादा सैलरी वाली नौकरी नहीं लाते, बल्कि अपने समुदाय के लोगों के लिए उम्मीदें, कई मौके और उम्मीदें भी लाते हैं। नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप जैसी स्कॉलरशिप को अक्सर सिर्फ़ फाइनेंशियल मदद प्रोग्राम के तौर पर देखा जाता है। असल में, ये ह्यूमन कैपिटल और नॉलेज क्रिएशन में लंबे समय के इन्वेस्टमेंट हैं। डेवलप्ड देश सिर्फ़ सड़कों, पुलों या एयरपोर्ट से नहीं बनते। वे क्लासरूम में भी बनते हैं। हर स्टूडेंट जो ऐसी स्कॉलरशिप लेकर बॉर्डर पार करता है, वह भारत के विज़न ‘विकसित भारत@2047’ में योगदान देने का कॉन्फिडेंस और काबिलियत लेकर वापस आता है। यह एक स्कॉलरशिप का बढ़ता हुआ रिटर्न है। स्कॉलरशिप का महत्व सिर्फ़ पढ़ाई के लिए पैसे देने में ही नहीं है, बल्कि उन स्टूडेंट्स के लिए एक स्थिरता का इकोसिस्टम बनाने में भी है जो अक्सर पहली बार एकेडमिक और सोशल दुनिया में कदम रख रहे होते हैं। कई पहली पीढ़ी के स्टूडेंट्स के लिए, चुनौती सिर्फ़ एडमिशन पाने तक ही सीमित नहीं होती। यह उसके बाद के सफ़र को बनाए रखना, महंगे शहरों में रहने का खर्च मैनेज करना, किताबें या डिजिटल डिवाइस खरीदना, रहने का खर्च उठाना और ऐसे मौकों के साथ आने वाले दूसरे खर्चों को भी मैनेज करना होता है। स्कॉलरशिप एक ज़रूरी सपोर्ट सिस्टम की तरह काम करती है जो स्टूडेंट्स को रोज़मर्रा की ऐसी चुनौतियों की चिंता करने के बजाय सीखने पर ध्यान देने में मदद करती है।


स्कॉलरशिप बिना किसी दिखावे के चलती है। कोई दिखावटी कैंपेन नहीं होते और कोई सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट नहीं होता। 12 सालों में, 764 स्टूडेंट्स को उनकी एकेडमिक मेरिट के आधार पर सबसे जाने-माने इंटरनेशनल कॉलेजों में एडमिशन लेने के लिए चुना गया है। कई मायनों में, नेशनल ओवरसीज़ स्कॉलरशिप स्कीम हर स्टूडेंट को दी जाने वाली मदद के कारण अलग है। किसी बड़ी ग्लोबल यूनिवर्सिटी में हायर एजुकेशन कर रहे एक अकेले स्कॉलर के लिए, कोर्स के दौरान ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, हवाई जहाज का किराया, इंश्योरेंस और दूसरे एकेडमिक खर्चों को कवर करने वाली कुल फाइनेंशियल मदद अक्सर 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा होती है और 1.5 करोड़ रुपये तक भी जा सकती है। 2 करोड़।
दुनिया में कुछ ही पब्लिक स्कॉलरशिप प्रोग्राम हैं जो समाज में आगे बढ़ने की चाह रखने वाले बैकग्राउंड के किसी एक स्टूडेंट पर इतना बड़ा इन्वेस्टमेंट करते हैं। इस सपोर्ट की अहमियत सिर्फ़ दी जाने वाली फाइनेंशियल मदद में ही नहीं है, बल्कि इससे क्या हासिल होने वाला है, इसमें भी है। यह फाइनेंशियल मदद पक्का करने के लिए एक नेशनल कमिटमेंट की सोच रखता है।

भारत-नेपाल के बीच सीमा पार धन प्रेषण सेवा शुरू, UPI और नेपाल के भुगतान नेटवर्क का सीधा एकीकरण

दिल्ली / सत्ता संदेश

भारत और नेपाल ने डिजिटल वित्तीय सहयोग को नई ऊंचाई देते हुए सीमा पार व्यक्ति-से-व्यक्ति धन प्रेषण तंत्र की शुरुआत कर दी है। 6 जून को लॉन्च की गई इस नई व्यवस्था के तहत भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस और नेपाल के नेशनल पेमेंट इंटरफेस को सीधे जोड़ा गया है।

इस एकीकरण के माध्यम से दोनों देशों के नागरिक अब मोबाइल बैंकिंग ऐप और डिजिटल वॉलेट की मदद से वास्तविक समय में सुरक्षित, तेज और निर्बाध तरीके से धन हस्तांतरित कर सकेंगे। यह कदम भारत और नेपाल के बीच वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने के साथ-साथ डिजिटल और आर्थिक एकीकरण को भी मजबूत करेगा।

यह तकनीकी साझेदारी नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड और नेपाल क्लियरिंग हाउस लिमिटेड के सहयोग से लागू की गई है। इसका उद्देश्य सीमा पार भुगतान को अधिक सुलभ, सुरक्षित और किफायती बनाना है।

नई व्यवस्था से दोनों देशों के यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी। अब उन्हें मुद्रा विनिमय की जटिलताओं, अधिक नकदी साथ रखने और अतिरिक्त विदेशी मुद्रा शुल्क जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। वहीं नेपाल के स्थानीय व्यापारियों और व्यवसायों को भारतीय पर्यटकों और ग्राहकों तक सीधी पहुंच मिलने से व्यापारिक गतिविधियों में वृद्धि होने की संभावना है।

इसके अलावा डिजिटल भुगतान प्रणाली से नकदी प्रबंधन की लागत कम होगी, भुगतान का निपटान वास्तविक समय में होगा और सीमा पार नकदी ले जाने की आवश्यकता भी घटेगी। इससे व्यापारिक लेनदेन अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनेंगे।

गौरतलब है कि वर्तमान में यूपीआई दुनिया के नौ देशों—सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, मॉरीशस, नेपाल, भूटान, कतर, श्रीलंका और कंबोडिया—में स्वीकार किया जाता है। इन देशों में भारतीय यात्री अपने परिचित यूपीआई प्लेटफॉर्म के माध्यम से आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-नेपाल के बीच शुरू हुई यह नई भुगतान व्यवस्था दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने के साथ-साथ क्षेत्रीय डिजिटल भुगतान सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगी।

ब्रिक्स 2026: भारत की अध्यक्षता में कृषि व्यापार को अधिक भरोसेमंद और किसान-केंद्रित बनाने का अवसर

भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय कर रहा है जब कृषि व्यापार की चर्चा केवल शुल्क और बाजार पहुंच तक सीमित नहीं रह गई है। जलवायु संकट, खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव, उर्वरकों की आपूर्ति में रुकावट, सतत उत्पादन से जुड़े मानक, उत्पाद के स्रोत और गुणवत्ता की डिजिटल जानकारी तथा संकट के समय बाजारों को खुला रखने की जरूरत अब कृषि व्यापार के अहम मुद्दे बन चुके हैं।

कृषि क्यों महत्वपूर्ण है

ब्रिक्स के विस्तार के बाद यह समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी, वैश्विक जीडीपी के करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। संयुक्त राष्ट्र की व्यापार एवं विकास संस्था, अंकटाड, के हालिया आकलन के अनुसार, ब्रिक्स देशों के बीच वस्तुओं का व्यापार 2003 के बाद तेरह गुना से अधिक बढ़ा है और 2024 में 1.17 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। कृषि इस बड़े व्यापारिक परिदृश्य का केवल एक हिस्सा हो सकती है, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से यह सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में है। जब खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, उर्वरकों की आपूर्ति रुकती है या समुद्री मार्गों में अनिश्चितता आती है, तो इसका सीधा असर किसानों, उपभोक्ताओं और सरकारों पर पड़ता है। इसलिए कृषि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।

ब्रिक्स देशों के बीच कृषि के क्षेत्र में कई तरह की पूरकताएं हैं। ब्राजील सोयाबीन, मांस और चीनी का बड़ा निर्यातक है। रूस अनाज और उर्वरकों में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। भारत चावल, समुद्री उत्पाद, मसाले, भैंस के मांस और छोटे किसानों से जुड़ी कई कृषि वस्तुओं में मजबूत स्थिति रखता है। चीन खाद्य पदार्थों का बड़ा आयातक और प्रसंस्करण करने वाला देश है। दक्षिण अफ्रीका इस समूह को अफ्रीका के महत्वपूर्ण कृषि-खाद्य बाजारों से जोड़ता है। नए सदस्य भी इसमें नए आयाम जोड़ते हैं। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब लॉजिस्टिक्स, वित्त और खाद्य सुरक्षा निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। मिस्र और इथियोपिया अफ्रीका की खाद्य प्रणाली से जुड़ी चिंताओं को सामने लाते हैं, जबकि इंडोनेशिया पाम ऑयल, मत्स्य क्षेत्र और उष्णकटिबंधीय कृषि की ताकत जोड़ता है।

आपसी ताकतों को ठोस व्यवस्था में बदलना

लेकिन केवल बड़े पैमाने और आपसी ताकतों के मेल से अपने-आप मजबूत व्यापार व्यवस्था नहीं बनती। आगामी ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक भारत को यह अवसर देती है कि वह सहयोग को कुछ ठोस दिशाओं में आगे बढ़ाए। इनमें भरोसेमंद व्यापार व्यवस्था, बीज, उर्वरक और अन्य उत्पादन सामग्री की मजबूत आपूर्ति श्रृंखला, बेहतर बाजार जानकारी और ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं शामिल हैं जिनमें छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी हो।

भरोसेमंद व्यापार व्यवस्था को शुरुआती प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कृषि व्यापार में केवल माल भेजना पर्याप्त नहीं है; यह भी उतना ही जरूरी है कि उत्पाद की गुणवत्ता, सुरक्षा और स्रोत पर भरोसा हो। कृषि व्यापार सुविधा पर 2024 के ब्रिक्स सिद्धांत पहले ही खाद्य सुरक्षा, पशु-पौध स्वास्थ्य और तकनीकी मानकों से जुड़े सहयोग, एक-दूसरे के मानकों को स्वीकार करने की व्यवस्था, कम व्यापार लागत और डिजिटल व्यापार सुविधा जैसे बुनियादी मुद्दों को मान्यता देते हैं। भारत इस एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए डिजिटल प्रमाणपत्रों, उत्पाद के स्रोत और गुणवत्ता की भरोसेमंद डिजिटल जानकारी, नियामकों के बीच तेज संवाद और उत्पादकों व निर्यातकों की क्षमता निर्माण पर जोर दे सकता है।

दूसरी प्राथमिकता मजबूत आपूर्ति श्रृंखला होनी चाहिए। खाद्य व्यापार को उर्वरक, ऊर्जा, पशु आहार, बीज, ढुलाई-भंडारण और वित्त से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत के लिए यह कोई दूर की चिंता नहीं है। उसके उर्वरक और ऊर्जा आयात का आधे से अधिक हिस्सा ब्रिक्स देशों से आता है। इसलिए उत्पादन सामग्री की सुरक्षा सीधे कृषि की मजबूती से जुड़ी हुई है। पश्चिम एशिया के हालिया संकटों ने दिखाया है कि खाद्य पदार्थों के बाजार तक पहुंचने से बहुत पहले ही उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए ब्रिक्स सहयोग में उर्वरकों और अन्य उत्पादन सामग्री के बाजारों के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली, भंडार और कीमतों पर पारदर्शी जानकारी, और जरूरी कृषि सामग्री की आपूर्ति में अचानक आने वाली रुकावटों को कम करने की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए।

तीसरी प्राथमिकता बेहतर बाजार जानकारी है। ब्रिक्स अनाज विनिमय का विचार इस बात की जरूरत को दिखाता है कि खाद्य बाजारों में अधिक पारदर्शिता, बेहतर मूल्य संकेत और खाद्य सुरक्षा की तैयारी होनी चाहिए। भारत इस दिशा में ब्रिक्स कृषि अनुसंधान मंच के भीतर कृषि बाजार जानकारी से जुड़ी एक व्यवस्था का प्रस्ताव रख सकता है। यह मंच पहले से ही “ज्ञान से कार्य” की दिशा में विकसित किया जा रहा है। ऐसी व्यवस्था खाद्य भंडार, फसल की स्थिति, उर्वरक कीमतों, जहाजरानी जोखिमों, खाद्य सुरक्षा और पशु-पौध स्वास्थ्य से जुड़े अलर्ट तथा प्रमुख कृषि जिंसों के रुझानों पर नियमित जानकारी दे सकती है। इससे देश संकट गहराने से पहले ही तैयारी कर सकेंगे।

व्यापार को किसान-केन्द्रित बनाना

चौथी प्राथमिकता ऐसी मूल्य श्रृंखलाएं होनी चाहिए जिनमें छोटे किसानों, महिलाओं और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो। यदि कृषि व्यापार केवल बड़ी मात्रा में अनाज, तेल, चीनी या अन्य जिंसों की खरीद-बिक्री तक सीमित रह गया, तो उससे छोटे किसानों और ग्रामीण परिवारों को सीमित लाभ ही मिलेगा। कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका पर वैश्विक सम्मेलन 2026 से निकली दिल्ली घोषणा ने कृषि-खाद्य व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका, नेतृत्व और भागीदारी को केंद्र में रखा है। भारत इस भावना को ब्रिक्स के कृषि व्यापार एजेंडे में आगे बढ़ा सकता है, ताकि छोटे किसानों, विशेषकर महिला किसानों और ग्रामीण युवाओं को केवल बाजार के लिए उत्पादन करने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावी भागीदारी का अवसर मिले।

इन प्राथमिकताओं का उद्देश्य खाद्य पदार्थों से जुड़े किसी बंद गुट का निर्माण करना नहीं है। इनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि व्यापार एक अनिश्चित दुनिया में खाद्य सुरक्षा, किसानों और उपभोक्ताओं के लिए बेहतर ढंग से काम करे। भारत इस एजेंडा को आकार देने की दृष्टि से सही स्थिति में है क्योंकि उसे खाद्य सुरक्षा के प्रबंधन, छोटे किसानों पर आधारित कृषि, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और कृषि अनुसंधान का खासा अनुभव है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता इस एजेंडे को व्यावहारिक रूप देने का समय पर मिला अवसर है। छोटे लेकिन सुविचारित कदम भी संकट के समय कृषि व्यापार को अधिक भरोसेमंद, नियमों की दृष्टि से अधिक पारदर्शी और किसानों के लिए अधिक सुलभ बना सकते हैं। यह अधिक मजबूत, भरोसेमंद और किसान-केंद्रित कृषि व्यापार व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

(आईसीएआर के महानिदेशक तथा डीएआरई के सचिव हैं)

(आईसीएआर के एम.एस. स्वामीनाथन चेयर की राष्ट्रीय प्रोफेसर और डीएएफ एंड डब्ल्यू की पूर्व संयुक्त सचिव (जी20/ब्रिक्स) हैं)

फाइबर अर्थव्यवस्था: भारत का अगला बड़ा वैश्विक अवसर ‘स्थानीय प्रचुरता से सतत सामग्रियों और भविष्य के लिए तैयार वस्त्रों में वैश्विक नेतृत्व तक’

दिल्ली / सत्ता संदेश

फाइबर के साथ भारत का 5,000 बरस पुराना सभ्यतागत संबंध है, जो हमारे गाँवों, परंपराओं तथा सामूहिक पहचान में गहराई से गुँथा है। “बुनी हुई हवा” कहलाने वाली मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध मलमल से लेकर समस्‍त महाद्वीपों तक फैली भारतीय कारीगरी तक — फाइबर हमेशा से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा रहा है। आज, जब दुनिया वैश्विक स्थिरता की क्रांति की कगार पर खड़ी है, तब यही प्राचीन ज्ञान हमारी सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति है।

दशकों तक केले के पेड़ के तने को बेकार अपशिष्ट मानकर फेंक दिया जाता था। आज वही बायोमास प्रीमियम फाइबर बनकर निर्यात बाज़ारों की मांग पूरी कर रहा है, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बना रहा है और इस कृषि अवशेष को राष्ट्रीय आय में बदल रहा है। अपशिष्ट से समृद्धि तक, स्थानीय प्रचुरता से वैश्विक अवसर तक — यही भारत की न्यू एज फाइबर मुहिम का सार है, जो हरित सामग्रियों और भविष्य के लिए तैयार वस्त्रों में भारत को वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर कर रहा है।

न्यू एज फाइबर ऐसे टिकाऊ एवं पौधों-आधारित पदार्थ हैं, जो भारत के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक नवाचार के साथ जोड़ते हैं। बांस, भाँग, केला, पीएएलएफ, फ्लैक्स, रेमी, सिसल, मिल्कवीड और कपोक जैसे फाइबर सदियों से मौजूद रहे हैं, लेकिन अब इन्हें वस्त्र उद्योग, रक्षा, बायोडिग्रेडेबल कंपोज़िट्स और प्रीमियम उत्पादों में उच्च-मूल्य उपयोगों के लिए नए सिरे से खोजा जा रहा है। ये हरित भविष्य के लिए भारत के प्राकृतिक फाइबर भंडार का विस्तार कर रहे हैं।

बढ़ती आय, वैश्विक स्थिरता संबंधी अनिवार्यताएँ और ट्रेसेबल सोर्सिंग की आवश्यकताएँ वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को पूरी तरह बदल रही हैं और एक नई फाइबर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही हैं। उपभोक्ता अब अपने पहनने के कपड़ों में आराम, पसीना सोखने की क्षमता या ब्रीदेबिलिटी और टिकाऊपन चाहते हैं। यही महत्‍वपूर्ण बदलाव भारत में फाइबर की खपत को आज के 15 एमएमटी से बढ़ाकर 2030 तक 23 एमएमटी तक ले जाने वाला है। दुनिया अब तेजी से वही तलाश रही है, जिसे भारत प्रदान कर सकता है :  नैतिक, टिकाऊ और उच्च-प्रदर्शन वाले प्राकृतिक फाइबर, जो सदियों के अनुभव पर आधारित हैं।

इस विजन को एक स्पष्ट संस्थागत एवं नीतिगत ढाँचे का समर्थन प्राप्त है। वर्ष 2026–2031 के लिए 5,664 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय वाले “मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी” के अंतर्गत न्यू एज फाइबर्स के लिए 300 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान रखा गया है। इस प्रयास को और सशक्त बनाते हुए, केंद्रीय बजट 2026–27 में घोषित राष्ट्रीय फाइबर मिशन एक व्यापक रणनीतिक ढाँचा प्रदान करता है, जो चार प्रमुख स्तंभों : कृषि-सूत्र- खेती और कच्चे माल के विकास के लिए, इन्फिनिटी-अनुसंधान एवं नवाचार के लिए, ग्राम-सेतु – अवसंरचना और उद्यम सृजन के लिए, तथा जीएमपीएस: ब्रांडिंग और बाज़ार विकास के लिए – पर आधारित है ।

इस नीतिगत ढाँचे की शक्ति दशकों से जारी वैज्ञानिक अनुसंधान में निहित है, जिसे ठोस परिणाम पहले से ही सामने आ चुके हैं। मिल्कवीड (आक/मदार) जिसे पारंपरिक रूप से भगवान शिव को अर्पित किया जाता है, नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (एनआईटीआरए) में 18 वर्षों के अनुसंधान के बाद एक बड़ी कामयाबी के तौर पर सामने आया है। अब इसका उपयोग रक्षा क्षेत्र में, विशेषकर –20°C तापमान में कार्यरत सैनिकों के लिए स्लीपिंग बैग बनाने में किया जा रहा है। ये स्लीपिंग बैग अपने पॉलिएस्टर विकल्पों की तुलना में 10% हल्के, ऊन से अधिक गर्म तथा सीएलओ/सेल प्रमाणित हैं। 55 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि पर बिना उर्वरक के उगाए जाने पर यह पौधा किसानों को प्रति एकड़ प्रतिवर्ष 1.5–2 लाख रुपये तक की आय प्रदान करने की क्षमता रखता है। 

केले का फाइबर प्रतिवर्ष लगभग 1.8 मिलियन टन उत्पादन की क्षमता रखता है और कृषि अवशेषों से किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान कर सकता है, जबकि बांस प्रति हेक्टेयर 60 टन तक बायोमास उत्पादन करने की क्षमता रखता है, जिससे पूर्वोत्तर भारत के लिए बड़े अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। भाँग भी एक उभरता हुआ वैश्विक बाज़ार बन रहा है, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जिसकी खेती की पहले से ही अनुमति है। फ्लैक्स, सिसल, रेमी, पीएएलएफ, बिछुआ या नेटल और कपोक जैसे फाइबरों के साथ मिलकर ये सभी भारत के टिकाऊ एवं प्राकृतिक फाइबर आधार का निरंतर विस्तार कर रहे हैं। 

इस वैज्ञानिक गति को आगे बढ़ाते हुए,न्यू एज फाइबर्स पर राष्ट्रीय सेमिनार एक ऐसे मंच के रूप में उभरा, जहाँ विज्ञान, नीति और उद्यम एक साथ आ सके। इसने शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, उद्यमियों, किसान संगठनों, उद्योग जगत के दिग्‍गजों और नीति-निर्माताओं को एक ही मंच पर एकत्रित किया। सभी दस प्राथमिकता प्राप्त फाइबर्स को कवर करने वाले तीन कार्य बलों की रिपोर्टें जारी की गईं, जिन्होंने क्षेत्रीय विज्ञान को सीधे योजनाओं के डिज़ाइन और निवेश की प्राथमिकताओं में बदल दिया। 

इस सेमिनार ने मानकों, प्रसंस्करण अवसंरचना और संस्थागत वित्तपोषण में मौजूद खामियों की भी स्पष्ट रूप से पहचान की , जो एक ऐसे मिशन को दर्शाता है जो केवल नीति नहीं, बल्कि वास्तविक क्रियान्वयन पर केंद्रित है। इसमें प्रमुख प्राथमिकताएँ: उत्पादन को पाँच वर्षों में  10,000 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 10 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचाना, गुणवत्ता मानकों का विकास करना, मशीनरी के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना, आयातित प्रसंस्करण तकनीक पर निर्भरता कम करना और खेती से लेकर मूल्य संवर्धन तक क्लस्टर आधारित फाइबर इकोसिस्टम का निर्माण करना सामने आईं। ये सभी कदम मिलकर न्यू एज फाइबर्स को ग्रामीण समृद्धि और टिकाऊ विकास के लिए एक संपूर्ण सरकारी मिशन बनाते हैं। 

शायद सबसे परिवर्तनकारी कार्य फाइबर ब्लेंडिंग है। भारत की वास्तविक शक्ति किसी एक फाइबर में नहीं, बल्कि उन्हें समझदारी से संयोजित करने में निहित है—जैसे थर्मल हल्केपन के लिए मिल्कवीड, गर्माहट के लिए ऊन, ब्रीदेबिलिटी के लिए बांस, और कोमलता के लिए कपास। मिश्रित कपड़ा या ब्लेंडेड फैब्रिक कोई समझौता नहीं है; यह प्रदर्शन को उन्नत बनाना है – ऐसे कपड़े तैयार करना जो अधिक मजबूत, अधिक स्मार्ट और अधिक टिकाऊ हों, साथ ही बेहतर आराम, नमी सोखने की क्षमता, टिकाऊपन तथा फैशन, जीवनशैली और तकनीकी वस्त्रों में बहुपयोगिता प्रदान करें। 

इसके लाभ पूरी मूल्य शृंखला में फैलते हैं। उपभोक्ताओं को बेहतर आराम और कार्यक्षमता मिलती है, निर्माताओं को प्रीमियम और विशिष्ट उत्पाद विकसित करने का अवसर मिलता है, और किसानों को विविध प्रकार की मांग तथा अधिक मजबूत आय प्राप्त होती है। भारत के लिए, ब्लेंडिंग या मिश्रण केवल एक तकनीकी नवाचार भर नहीं है; यह कच्चे फाइबर आपूर्ति से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, मूल्य-संवर्धित और भारतीय पहचान से जुड़े ब्रांड्स तक पहुँचने का एक सेतु है।

असल में, न्यू एज फाइबर मुहिम  जीवन को रूपांतरित करने, किसानों के लिए अवसर सृजित करने, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बनाने, महिलाओं को सशक्त करने और उद्यमियों को स्थानीय संसाधनों से वैश्विक व्यवसाय खड़ा करने में सक्षम बनाने के बारे में है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के 5एफ विज़न— खेत से फाइबर, कपड़े से फैशन और विदेश तक—से प्रेरित, भारत की ग्रीन फाइबर क्रांति कोई दूर का सपना नहीं है। रणनीति तय है, संस्थान सक्रिय हैं, विज्ञान प्रमाणित हो चुका है, और उद्यमी तैयार हैं। आज भारत जो कर रहा है—फाइबर दर फाइबर, मिश्रण दर मिश्रण, क्षेत्र दर क्षेत्र, और खेत दर खेत—अपनी वस्त्र गाथा का अगला महान अध्याय लिख रहा है।

12 वर्षों में विज्ञान की उड़ान: लैवेंडर खेतों से चंद्रमा तक भारत की नई पहचान

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

जब जम्मू के डोडा जिले की एक लैवेंडर किसान मौसम के पहले फूल तोड़ती है, तब वह विज्ञान नीति के
बारे में नहीं सोचती। लेकिन सच यह है कि केंद्र शासित प्रदेश की बंजर पहाड़ियों को बैंगनी फूलों की
सुगंधित खेती में बदलने के पीछे पिछले एक दशक में किया गया उद्देश्यपूर्ण और दूरदर्शी वैज्ञानिक
निवेश ही है। यह ग्रामीण आजीविका में आई ऐसी क्रांति है, जिसकी शुरुआत एक प्रयोगशाला से हुई थी।
असल में, भारत में पिछले बारह वर्षों की विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता का यही
अर्थ है। विज्ञान केवल ज्ञान बढ़ाने का माध्यम नहीं रहा, बल्कि वह हमारे नागरिकों के दैनिक जीवन को
बेहतर बनाने वाली एक जीवंत और प्रभावशाली शक्ति बन गया है।

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में पदभार संभाला, तब उन्होंने एक ऐसी सोच प्रस्तुत की जिसमें
विज्ञान को केवल किसी विभाग का काम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का मिशन माना गया। इसके बाद के
वर्षों में इस दृष्टि ने ऐसे परिणाम दिए, जो एक पीढ़ी पहले असाधारण माने जाते। आज भारत चंद्रमा के
दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यान उतार चुका है, पहली बार अपनी स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित कर चुका
है, पुणे से पटना तक सुपरकंप्यूटर स्थापित कर चुका है और एक ऐसे अंतरिक्ष अर्थतंत्र का निर्माण कर
चुका है जिसमें देशी स्टार्टअप्स तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

लेकिन इन उपलब्धियों की असली कहानी यह नहीं है कि हमने क्या हासिल किया, बल्कि यह है कि इन
उपलब्धियों ने आम नागरिकों के जीवन को किस तरह प्रभावित किया। विज्ञान अब केवल प्रयोगशालाओं

तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विकास और नागरिक सशक्तिकरण का सबसे शक्तिशाली माध्यम
बन चुका है।

किसानों का उदाहरण लें। भारतीय कृषि में मौसम हमेशा से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
पिछले एक दशक में पृथ्वी अवलोकन (अर्थ ऑब्जर्वेशन) और मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में व्यापक सुधार
किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप आज किसानों को सटीक और स्थानीय स्तर पर मौसम की जानकारी
मिल रही है। यह केवल संभावनाओं पर आधारित अनुमान नहीं, बल्कि इतनी सटीक जानकारी है कि कोई
किसान परिवार यह तय कर सकता है कि फसल आज काटनी है या कल तक इंतजार करना है।

आज यदि बंगाल की खाड़ी में कोई चक्रवात बनता है, तो हमारी आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियां तटीय
समुदायों को कई घंटे, और कई बार कई दिन पहले ही सचेत कर देती हैं। इसका महत्व केवल आंकड़ों में
नहीं मापा जा सकता; इसका वास्तविक मूल्य उन अनगिनत जानों और आजीविकाओं में दिखाई देता है
जो समय रहते बचाई जा रही हैं।

जम्मू-कश्मीर की पहाड़ियों और नदी घाटियों में विज्ञान ने “अरोमा मिशन” के रूप में दस्तक दी। इस
कार्यक्रम के तहत किसानों को लैवेंडर की खेती से जोड़ा गया तथा उन्हें तकनीक, बेहतर बीज और बाज़ार
तक पहुँच उपलब्ध कराई गई। जो पहल एक छोटे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई थी, वह आज
भारत की “पर्पल रिवोल्यूशन” (बैंगनी क्रांति) के रूप में जानी जाती है। इसके माध्यम से हजारों किसान
परिवार सुगंधित और औषधीय पौधों की खेती से सम्मानजनक आय अर्जित कर रहे हैं। इस समृद्धि के
पीछे विज्ञान ने एक शांत लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई है।

इसी प्रकार के प्रयासों के तहत केसर की खेती का विस्तार, औषधीय जड़ी-बूटियों का उत्पादन और भारत
में पहली बार हींग की खेती की शुरुआत की गई। इन पहलों ने साबित किया है कि यदि नवाचार जमीन
से जुड़ा हो, तो वह किसी भी औद्योगिक तकनीक जितना परिवर्तनकारी हो सकता है।

विज्ञान के माध्यम से ग्रामीण सशक्तिकरण केवल कृषि तक सीमित नहीं रहा है। किफायती ग्रामीण
आवास के लिए विकसित 3डी-प्रिंटेड घरों के मॉडल से लेकर खाद्य पदार्थों में मिलावट की पहचान करने
वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियों तक, तकनीक को उन समस्याओं के समाधान के लिए
इस्तेमाल किया जा रहा है जिनका सामना समाज के सबसे कमजोर वर्ग करते हैं।

कंप्यूटिंग, सेंसर तकनीक और इंजीनियरिंग को एक साथ जोड़ने वाले “राष्ट्रीय अंतःविषय साइबर-
फिजिकल सिस्टम मिशन” के तहत देशभर में 25 टेक्नोलॉजी इनोवेशन हब स्थापित किए गए हैं। इन
केंद्रों ने एक हजार से अधिक स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया है, जो सटीक कृषि, स्वच्छ पेयजल उपलब्धता
और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान पर काम कर रहे हैं।

भारत को स्वस्थ बनाना: जैव प्रौद्योगिकी की नई क्रांति

यदि कोई क्षेत्र भारतीय विज्ञान की परिवर्तनकारी शक्ति को सबसे प्रभावशाली ढंग से दिखाता है, तो वह
जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र है। दशकों तक भारत की फार्मास्युटिकल ताकत मुख्य रूप
से विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) तक सीमित रही। हम उन दवाओं के जेनेरिक संस्करण बनाते थे, जिनकी
खोज दूसरे देशों में होती थी। अब यह कहानी बदल रही है।

दशकों में पहली बार भारत में खोजी गई स्वदेशी एंटीबायोटिक “नैफिथ्रोमाइसिन” का विकास केवल एक
वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारत की दवा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की घोषणा भी है। सरकार के
सहयोग से शोधकर्ताओं और उद्योग जगत की साझेदारी से विकसित यह दवा इस बात का प्रमाण है कि
भारत की प्रयोगशालाएँ अब केवल दवाएँ बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नई दवाओं की खोज और
विकास के वैश्विक अग्रिम मोर्चे पर भी काम कर सकती हैं। यह वह क्षमता है जो दुनिया के केवल कुछ
देशों के पास ही है।

इसी तरह एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि देश में हीमोफीलिया के लिए पहली सफल स्वदेशी जीन थेरेपी
क्लीनिकल ट्रायल रही, जिसे वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में सम्पन्न किया गया।

हीमोफीलिया एक ऐसी बीमारी है जिसके उपचार के लिए मरीजों को जीवनभर महंगे इलाज की
आवश्यकता होती है।

जीन थेरेपी की विशेषता यह है कि यह बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित करने के बजाय उसके मूल
आनुवंशिक दोष को ठीक करने का प्रयास करती है। आनुवंशिक रोगों के बड़े बोझ वाले भारत जैसे देश के
लिए यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण है और भविष्य की चिकित्सा प्रणाली को बदलने की क्षमता रखती है।

इसके साथ-साथ “जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट” के तहत भारत की विविध आबादी से जुड़े 10,000 से अधिक
मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। इससे देश में ऐसी वैज्ञानिक नींव तैयार हो रही है,
जिसके आधार पर भविष्य में प्रत्येक व्यक्ति की जैविक संरचना के अनुसार व्यक्तिगत और अधिक
प्रभावी उपचार उपलब्ध कराए जा सकेंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत केवल बीमारियों का इलाज करने
की दिशा में ही नहीं, बल्कि “व्यक्तिगत चिकित्सा” के उस युग की ओर बढ़ रहा है, जहां उपचार हर
मरीज की आनुवंशिक विशेषताओं के अनुरूप होगा।

कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घरेलू जैव-
चिकित्सा (बायोमेडिकल) क्षमता कितनी महत्वपूर्ण होती है। भारत की प्रतिक्रिया, अपने स्वयं के टीकों का
विकास करना, उनका बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और 1.4 अरब लोगों तक उन्हें पहुंचाना, हमारे जैव
प्रौद्योगिकी तंत्र में वर्षों से किए गए निवेश का परिणाम थी।

इस सफलता के पीछे बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल(बीआईआरएसी) की महत्वपूर्ण
भूमिका रही है। इस संस्था ने बायोटेक स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, शैक्षणिक शोध और व्यावसायिक
उत्पादन के बीच की दूरी कम करने तथा वैज्ञानिक नवाचारों को आम लोगों तक पहुँचाने में अहम
योगदान दिया है।

आज भारत में जैव-उद्यमियों की एक नई पीढ़ी उभर रही है, जो प्रिसिजन मेडिसिन, टिकाऊ जैव-
आधारित सामग्री और अगली पीढ़ी की डायग्नोस्टिक तकनीकों पर काम कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण

बात यह है कि यह नवाचार केवल अमेरिका की सिलिकॉन वैली तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के
शहरों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों से भी उभर रहा है।

इसी दिशा में जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। इस परियोजना के तहत
10,000 से अधिक भारतीयों के मानव जीनोम का अनुक्रमण किया जा चुका है। भारत जैसी अत्यंत
विविध आबादी वाले देश के लिए यह उपलब्धि भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था की मजबूत वैज्ञानिक नींव
तैयार कर रही है।

इससे आने वाले समय में ऐसी स्वास्थ्य सेवाओं का मार्ग प्रशस्त होगा, जहाँ उपचार केवल बीमारी के
आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय की विशिष्ट आनुवंशिक संरचना के अनुसार तय किया जाएगा।
अर्थात भारत व्यक्तिगत चिकित्सा के नए युग की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जहाँ हर मरीज को उसकी
जैविक आवश्यकताओं के अनुरूप अधिक सटीक और प्रभावी इलाज मिल सकेगा।

सितारों तक पहुंच, नागरिकों से जुड़ाव

23 अगस्त 2023 को जब चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की ओर अपने अंतिम
चरण में उतर रहा था, एक ऐसा क्षेत्र जहां इससे पहले कोई देश नहीं पहुँच पाया था, तब करोड़ों भारतीयों
की निगाहें उस ऐतिहासिक क्षण पर टिकी थीं। लैंडिंग का वह पल केवल तकनीकी सफलता नहीं था,
बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास और सामर्थ्य का प्रतीक भी था। भारत ने वह कर दिखाया था जो दुनिया का
कोई अन्य देश नहीं कर सका था।

इसके बाद चंद्रमा की सतह से प्राप्त जानकारियाँ और लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर से पृथ्वी पर
भेजा गया वैज्ञानिक डेटा निस्संदेह अंतरिक्ष विज्ञान के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। लेकिन उतना ही
महत्वपूर्ण वह प्रभाव भी था, जो इस उपलब्धि ने देश की नई पीढ़ी की कल्पनाओं, आकांक्षाओं और
आत्मविश्वास पर डाला।

पिछले बारह वर्षों में भारत की अंतरिक्ष यात्रा महत्वाकांक्षा और जनहित के अनूठे संगम की कहानी रही
है। जहाँ चंद्रयान-3 ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया, वहीं आदित्य-एल1 ने चुपचाप सूर्य का
अध्ययन करने का अपना मिशन शुरू किया। यह मिशन अंतरिक्ष मौसम को समझने में मदद कर रहा
है, जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी पर मौजूद उपग्रहों, बिजली ग्रिडों और संचार प्रणालियों पर पड़ता है।

इसी क्रम में स्पेडेक्स मिशन ने भारत को उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल कर दिया, जिन्होंने
अंतरिक्ष में दो यानों को सफलतापूर्वक जोड़ने की क्षमता प्रदर्शित की है। यह तकनीक भविष्य के अंतरिक्ष
स्टेशनों और मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियानों के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

वहीं शुभांशु शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर 18 दिनों का ऐतिहासिक प्रवास भारत के मानव
अंतरिक्ष मिशन के सपनों को वास्तविकता के और करीब ले आया। यह केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि
नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी थी कि भारत अब मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों
की ओर बढ़ रहा है।

इन उपलब्धियों का महत्व केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। इन्होंने देश के युवाओं में विज्ञान,
प्रौद्योगिकी और नवाचार के प्रति नई रुचि पैदा की है तथा यह विश्वास मजबूत किया है कि भारत न
केवल वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति का हिस्सा है, बल्कि उसका नेतृत्व करने की क्षमता भी रखता है।

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आया परिवर्तन केवल अंतरिक्ष मिशनों तक सीमित नहीं है, चाहे वे कितने भी
महत्वपूर्ण क्यों न हों। वर्ष 2023 की भारतीय अंतरिक्ष नीति ने लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण और
ग्राउंड सिस्टम सहित पूरे अंतरिक्ष मूल्य श्रृंखला को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया।

इसके परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। वर्ष 2014 में जहाँ भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे,
वहीं आज उनकी संख्या 400 से अधिक हो चुकी है। ये स्टार्टअप्स रॉकेट बना रहे हैं, उपग्रह डिजाइन
कर रहे हैं और कृषि निगरानी से लेकर आपदा प्रबंधन तक अनेक क्षेत्रों के लिए तकनीकी समाधान
विकसित कर रहे हैं।

भारत की बढ़ती अंतरिक्ष क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2014 के बाद से
भारतीय प्रक्षेपण यानों ने 399 विदेशी उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित किया है। इसके चलते भारत
दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियों और देशों के लिए एक विश्वसनीय एवं पसंदीदा साझेदार बनकर उभरा
है।

आज भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रही। यह हजारों युवा
इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के प्रयासों से निर्मित एक राष्ट्रीय संपत्ति बन चुकी है। निजी क्षेत्र
की बढ़ती भागीदारी ने नवाचार, निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं।

आने वाले वर्षों के लिए भारत की योजनाएँ और भी महत्वाकांक्षी हैं। वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष
स्टेशन स्थापित करने की परिकल्पना की गई है, जबकि वर्ष 2040 तक मानवयुक्त चंद्र मिशन भेजने
का लक्ष्य रखा गया है। यह दर्शाता है कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा केवल वर्तमान उपलब्धियों तक सीमित
नहीं है। इसकी महत्वाकांक्षा दीर्घकालिक है, दृष्टि स्पष्ट है और दिशा लगातार नई ऊँचाइयों की ओर बढ़
रही है। अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत का भविष्य केवल आशाजनक नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की संभावनाओं
से भी परिपूर्ण दिखाई देता है।

नवाचार के माध्यम से आत्मनिर्भरता

“आत्मनिर्भर भारत” केवल एक राजनीतिक नारा नहीं है, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यह
एक मार्गदर्शक दर्शन बन चुका है। 6,000 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ शुरू किया गया

राष्ट्रीय क्वांटम मिशन केवल एक नई तकनीक में निवेश नहीं है, बल्कि 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण
तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने का प्रयास है।

क्वांटम कंप्यूटिंग ऐसी जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखती है जिन्हें पारंपरिक कंप्यूटर हल
नहीं कर सकते। क्वांटम संचार लगभग अभेद्य साइबर सुरक्षा प्रदान कर सकता है, जबकि क्वांटम
सेंसिंग नेविगेशन, चिकित्सा इमेजिंग और भू-वैज्ञानिक खोजों में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। भारत
अब इन सभी क्षमताओं का विकास अपने देश में ही कर रहा है। इसके लिए विश्वविद्यालयों, शोध
संस्थानों और उद्योगों को जोड़ने वाले विशेष थीमैटिक हब स्थापित किए गए हैं।

इसी तरह राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के तहत पुणे, चेन्नई, खड़गपुर और अन्य शहरों में उच्च-प्रदर्शन
कंप्यूटिंगकी सुविधाएं विकसित की गई हैं। इससे भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, शोधकर्ताओं और
स्टार्टअप्स को वह कंप्यूटिंग शक्ति उपलब्ध हो रही है, जो पहले केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित
थी।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। “भारतजेन”, देश का पहला सरकारी
वित्तपोषित बहुभाषी जनरेटिव एआई कार्यक्रम, ऐसे बड़े भाषा मॉडल विकसित कर रहा है जो भारतीय
भाषाओं में सोच और संवाद कर सकें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के
लाभ केवल अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों तक सीमित न रहें, बल्कि देश के हर नागरिक तक पहुँचें।

इस आत्मनिर्भरता की दृष्टि को साकार करने में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल
रिसर्च(सीएसआईआर) का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारतीय इंजीनियरों द्वारा पूरी तरह
स्वदेशी रूप से विकसित हंसा-एन.जी. प्रशिक्षण विमान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए तैयार
किया गया है। यह भारत की विमानन तकनीक में आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।

इसी प्रकार भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल-सेल संचालित पोत स्वच्छ समुद्री परिवहन की दिशा में एक
महत्वपूर्ण कदम है। वहीं टिकाऊ विमानन ईंधन पर चल रहा शोध विदेशी तकनीकों पर निर्भरता कम
करते हुए पर्यावरण-अनुकूल हवाई यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर रहा है।

सीएसआईआर इनोवेशन कॉम्प्लेक्स, देश की अपनी तरह की पहली सुविधा, ऐसी प्रयोगशाला के रूप में
विकसित की गई है जहाँ वैज्ञानिक अनुसंधान और उद्यमशीलता का संगम होता है। इसका उद्देश्य
वैज्ञानिक खोजों को तेजी से बाजार में उपयोगी उत्पादों में बदलना है। इन प्रयासों के परिणाम स्पष्ट
दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2014 में भारत में केवल 11 स्पेस स्टार्टअप्स थे, जबकि आज उनकी संख्या
400 से अधिक हो चुकी है। यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि जब दूरदर्शी नीतियाँ, सार्वजनिक
निवेश और उद्यमशीलता की ऊर्जा एक साथ काम करती हैं, तो असाधारण परिवर्तन संभव हो जाते हैं।
आत्मनिर्भर भारत की यह यात्रा केवल तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की
कहानी है जो अपने ज्ञान, नवाचार और प्रतिभा के बल पर वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ आगे
बढ़ रहा है।

ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की तकनीकें

भारत के वैज्ञानिक परिवर्तन की कहानी परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में हुए रणनीतिक विकास का उल्लेख किए
बिना अधूरी है। अप्रैल 2026 में कलपक्कम स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर
रिएक्टर की पहली क्रिटिकलिटी एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह रिएक्टर पूरी तरह भारतीय वैज्ञानिकों
और इंजीनियरों द्वारा विकसित किया गया है। इसका विकास इंदिरा गांधी सेंटर फॉर अटॉमिक रिसर्च ने
किया है, जबकि इसका निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने है।

यह रिएक्टर भारत के तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की ओर बढ़ने में एक महत्वपूर्ण कड़ी
है। इस कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम भंडार का ऊर्जा उत्पादन के
लिए उपयोग करना है। ऐसे समय में जब दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, घरेलू ईंधन संसाधनों
से स्वच्छ और निरंतर ऊर्जा उत्पन्न करने की क्षमता केवल आर्थिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि
राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक आत्मनिर्भरता का भी प्रश्न है।

परमाणु विज्ञान का प्रभाव अब केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं में भी
इसका बड़ा योगदान दिखाई दे रहा है।

टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल को इंटरनेशनल अटॉमिक एनर्जी एजेंसी से “रेज ऑफ होप एंकर सेंटर ” के रूप
में मान्यता मिलना भारत की कैंसर चिकित्सा क्षमता का वैश्विक सम्मान है। इसके साथ ही होमी भाभा
कैंसर अस्पताल नेटवर्क के विस्तार और उन्नत रेडियोफार्मास्यूटिकल दवाओं के उपयोग से देशभर में
कैंसर रोगियों को बेहतर और आधुनिक उपचार उपलब्ध हो रहा है। रेडियोफार्मास्यूटिकल्स ऐसी विशेष
दवाएँ होती हैं जिनमें रेडियोधर्मी कणों का उपयोग कैंसर की पहचान और उपचार के लिए किया जाता है।
इससे मरीजों को अधिक सटीक और प्रभावी चिकित्सा मिल पाती है।

वर्ष 2025 का शांति अधिनियम भी परमाणु क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। इस कानून
ने भारत के परमाणु क्षेत्र के नियामक और कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया है तथा इस क्षेत्र में अधिक
निवेश और भागीदारी का मार्ग प्रशस्त किया है। आने वाले वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में परमाणु
ऊर्जा की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

दूसरी ओर, भारत का “डीप ओशन मिशन”पृथ्वी के अंतिम बड़े अनछुए क्षेत्र-गहरे समुद्र तक देश की
वैज्ञानिक पहुँच का विस्तार कर रहा है। समुद्र की गहराइयों में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स और कोबाल्ट-
समृद्ध परतों जैसे महत्वपूर्ण खनिज संसाधन मौजूद हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों, बैटरियों और उन्नत
औद्योगिक उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। इन संसाधनों का दोहन भारत की आयातित महत्वपूर्ण खनिजों
पर निर्भरता को कम कर सकता है।

इसके साथ ही यह मिशन उन्नत पनडुब्बी वाहनों, सेंसर प्रणालियों और समुद्री अनुसंधान तकनीकों का भी
विकास कर रहा है। इससे भारत को अपने समुद्री क्षेत्र में वैज्ञानिक, आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति
को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।

ऊर्जा सुरक्षा, परमाणु तकनीक और समुद्री विज्ञान में हो रहे ये निवेश केवल वर्तमान की आवश्यकताओं
को पूरा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि आने वाले दशकों में भारत को तकनीकी रूप से सक्षम, ऊर्जा के
क्षेत्र में आत्मनिर्भर और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

विकसित भारत की ओर: विज्ञान ही भविष्य की दिशा

जब भारत 2047 में अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ रहा है और एक पूर्ण विकसित राष्ट्र
बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब विज्ञान और प्रौद्योगिकी केवल इस यात्रा का सहायक साधन
नहीं होंगे, बल्कि वे इसकी गति और स्वरूप दोनों निर्धारित करेंगे। पिछले बारह वर्षों में किए गए निवेशों
ने केवल संस्थान और आधारभूत संरचनाएँ ही नहीं बनाई हैं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण एक ऐसी
संस्कृति विकसित की है जो वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा, उद्यमशीलता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास से परिपूर्ण
है।

अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन का गठन भारत के शोध एवं नवाचार तंत्र को नई दिशा देने के लिए
किया गया है। इसका उद्देश्य मिशन-आधारित अनुसंधान को बढ़ावा देना, शिक्षा जगत और उद्योग के
बीच सहयोग को मजबूत करना तथा युवा शोधकर्ताओं को सशक्त बनाना है। इसके साथ ही एक लाख
करोड़ रुपये की पूंजी वाले नए “रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन फंड” की स्थापना भारत द्वारा अपनी
बौद्धिक क्षमता पर लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा दांव है। यह इस विश्वास का प्रतीक है कि देश
की सबसे बड़ी चुनौतियों का समाधान भारत की अपनी प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों और समुदायों के
भीतर मौजूद है।

जम्मू-कश्मीर के डोडा का लैवेंडर किसान, वेल्लोर का जीनोमिक्स शोधकर्ता, बेंगलुरु का स्पेस स्टार्टअप
उद्यमी और कलपक्कम का परमाणु इंजीनियर- ये सभी एक ही कहानी के पात्र हैं। यह उस भारत की
कहानी है जिसने सोच-समझकर और दृढ़ निश्चय के साथ विज्ञान को अपने विकास के केंद्र में रखा। यह
कहानी केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि उस मजबूत नींव की कहानी है जो पिछले बारह वर्षों में
तैयार हुई है। यह नींव व्यापक, गहरी और स्थायी है- ऐसी नींव जिस पर एक विकसित, आत्मनिर्भर और

वैज्ञानिक दृष्टि से आत्मविश्वासी भारत का निर्माण होगा। विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक
प्रगति का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जो ज्ञान, नवाचार, अनुसंधान और
वैज्ञानिक सोच के आधार पर विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाए। पिछले वर्षों की उपलब्धियाँ इसी
भविष्य की आधारशिला हैं, और आने वाले दशकों में यही विज्ञान भारत की नियति को आकार देगा।

(लेखक भारत सरकार में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री तथा
प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष विभाग में राज्य मंत्री हैं)

नीतिगत गतिरोध से विकसित भारत तक: मोदी युग ने भारत को नए सिरे से परिभाषित किया

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

वर्ष 2014 के बाद से, भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। इसकी अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत हुई है। बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से बेहतर हुआ है। महिलाएं बेहद सशक्त हुईं हैं। किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं और गरीब अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित हुए हैं। इन तमाम बदलावों में एक ही बात साझा है: प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि और उनका नेतृत्व।

भारत के लोगों ने उनके दूरदर्शी एवं संवेदनशील नेतृत्व का भरपूर समर्थन किया है और उन्हें देश का सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाला निर्वाचित प्रधानमंत्री बनाया है। बीते 10 जून को उन्होंने राष्ट्र की सेवा में 4,399 दिन पूरे किए और अपनी पहली चुनावी जीत के बाद जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल गए।

यह ऐतिहासिक उपलब्धि भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। देश के लोगों ने ऐसे समय में 2014 में मोदी सरकार को भारी बहुमत से सत्ता सौंपी, जब अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी और यूपीए सरकार के बदनाम कार्यकाल के दौरान नीतिगत गतिरोध, भ्रष्टाचार, घोटालों एवं विवादों को लेकर जनता में निराशा लगातार बढ़ रही थी।

संवेदनशील नेतृत्व – 2014 से देश निरंतर बदलाव की यात्रा पर है। मोदी सरकार ने 81 करोड़ से अधिक लोगों के लिए मुफ्त अनाज की व्यवस्था की, 58 करोड़ जन धन बैंक खातों के जरिए वित्तीय समावेशन को संभव बनाया और 16 करोड़ घरों तक नल के पानी का कनेक्शन पहुंचाया। दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना, ‘आयुष्मान भारत’ के जरिए 12 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपए तक के मुफ्त इलाज की गारंटी मिल रही है। 

कई युवा भारतीयों के लिए यह कल्पना करना मुश्किल हो सकता है कि मोदीजी द्वारा – पहले गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री के रूप में – लाए गए बड़े बदलावों से पहले जीवन कितना चुनौतीपूर्ण था। उनके निर्णायक नेतृत्व और नेक एवं संवेदनशील दृष्टिकोण ने देश को ‘विकसित भारत 2047’ मिशन की दिशा में आगे बढ़ाया है। इस मिशन में भारत की विरासत पर गर्व और विकास का एक महत्वाकांक्षी एजेंडा शामिल है।

नारी शक्ति

प्रधानमंत्री के लिए महिलाएं केवल सहायता की लाभार्थी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता हैं। सबसे पहले उनकी बुनियादी जरूरतों पर ध्यान दिया गया: स्वच्छ भारत मिशन के तहत 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए। इससे उनकी सुरक्षा और सम्मान में वृद्धि हुई। वहीं, उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए। इससे महिलाओं को धुएं से भरी रसोई के खतरों से मुक्ति मिली।

‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की पहल ने बेटियों की शिक्षा एवं उनके कल्याण के महत्व को और ठोस बनाया है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए, प्रधानमंत्री ने महिलाओं के नेतृत्व में विकास को आगे बढ़ाने के लिए देश की विधायिकाओं में महिलाओं की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित की है।

किसानों का कल्याण

किसानों का कल्याण प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों का एक मुख्य आधार रहा है। किसानों के योगदान को मान्यता देते हुए, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के जरिए उन्हें सीधे आय संबंधी सहायता प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत बांटे गए कुल 4.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि से लगभग 10 करोड़ किसान परिवारों को लाभ हुआ है।

सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में भी काफी बढ़ोतरी की है, जो अब उत्पादन लागत का कम से कम 1.5 गुना है। साथ ही, किफायती दरों पर फसलों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराकर किसानों को वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी से बचाया गया है।

युवाओं के लिए अवसर

युवा भारतीयों के लिए अवसर सृजित करने के उद्देश्य से, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी प्रमुख पहलें शुरू की गई हैं। ‘कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय’ के रूप में एक समर्पित मंत्रालय के गठन से जहां युवाओं को आधुनिक अर्थव्यवस्था के अनुकूल कौशल से लैस करने में मदद मिली है, वहीं भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के क्षेत्र में उभरती हुई क्रांति का लाभ उठाने के लिए तैयार भी किया गया है।

‘स्टार्टअप इंडिया’ और नवाचार को दिए गए व्यापक समर्थन ने कई युवाओं को नौकरी खोजने वाला से हटकर नौकरी देने वाला बनने में मदद की है। इन पहलों ने उद्यमिता (एंटरप्रेन्योरशिप) की एक ऐसी नई लहर की नींव रखी है, जिसमें आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के मामले  में अहम योगदान देने की क्षमता है।

अर्थव्यवस्था और जीवनयापन में सुगमता

वर्ष 2014 से पहले, भारत की गिनती दुनिया की “फ्रैजाइल फाइव” (कमजोर पांच) अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में होती थी। निवेशकों का भरोसा भी लगातार कम हो रहा था। साहसिक सुधारों, निवेशकों के लिए अनुकूल नीतियों, वित्तीय अनुशासन और अपेक्षाकृत कम महंगाई के सहारे, भारत अब दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था है और यह कारोबार व निवेश का एक आकर्षक स्थल बनता जा रहा है।

भारत ने विभिन्न विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। इससे हमारे युवाओं, किसानों, छोटे व्यवसायों, कारीगरों और श्रमिकों के लिए वैश्विक स्तर पर नए अवसर खुले हैं। और ऐसा भारत के हितों से समझौता किए बिना किया गया है। यह यूपीए सरकार द्वारा किए गए कुछ लापरवाही भरे समझौतों से बिल्कुल अलग है।

सरकार ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और करों की कम दरों जैसे बड़े सुधारों के जरिए  कारोबार जगत और मध्यम वर्ग का भरोसा भी बढ़ाया है। इंटरनेट की पैठ और डिजिटल भुगतान प्रणाली के तेज विस्तार के साथ मिलकर, ‘डिजिटल इंडिया’ पहल ने अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डालने के साथ-साथ नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को भी आसान बनाया है।

कई पुराने एवं मामूली अपराधों को अपराध की श्रेणी से हटाने तथा अनुपालन के अनावश्यक बोझ को कम करने से कारोबार जगत को और भी अधिक लाभ हुआ है। मध्यम वर्ग को भी काफ़ी राहत मिली है और 12.75 लाख रुपये तक की सालाना आय को आयकर से छूट दे दी गई है।

आधुनिक बुनियादी ढांचा

मोदी सरकार देश के बुनियादी ढांचे में तेजी से बदलाव ला रही है। सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। वर्ष 2014 में सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या 74 थी और अब यह 160 से अधिक हो गई है।

बड़े पैमाने पर रेलवे के विद्युतीकरण, महत्वाकांक्षी बुलेट ट्रेन परियोजना और राष्ट्रीय राजमार्गों  व एक्सप्रेसवे के तेज विस्तार ने देश के कई हिस्सों के बुनियादी ढांचे को दुनिया के बेहतरीन बुनियादी ढांचों की बराबरी में ला खड़ा किया है।

प्रधानमंत्री की इस ऐतिहासिक उपलब्धि का वास्तविक महत्व कार्यकाल के दिनों की गिनती में नहीं, बल्कि किए गए व्यापक बदलावों में निहित है। उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने गरीबों एवं  किसानों के कल्याण, मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं और उभरते भारत की महत्वाकांक्षाओं को शासन के केन्द्र में रखा है।

अब जबकि देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है, 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण के नए संकल्प के साथ बदलाव की यह यात्रा निरंतर जारी रहेगी।

नए भारत के दिल की धड़कनों में बसते हैं बिरसा : रंजना चोपड़ा

भारत जब अपने स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानियों को याद करता है तब छोटानागपुर के जंगलों से एक नाम अपनी दृढ़ नैतिक ताकत के साथ उभरता है। यह नाम भगवान बिरसा मुंडा का है जिन्हें ‘धरती आबा’ यानी भूमि के रक्षक के रूप में पूजा जाता है। वह एक ऐतिहासिक हस्ती से आगे बढ़ कर गरिमा, प्रतिरोध और जनजातीय आत्मसम्मान के जीवंत प्रतीक भी हैं। उनकी सोच थी कि जनजातीय पहचान की रक्षा की जाए, समानता सार्थक हो और विकास आम जन तक न्याय के साथ पहुंचे। उनका यह सिद्धांत अब भी विकसित भारत की ओर देश की यात्रा को निर्देशित करता है। राष्ट्र ने पिछले 12 वर्षों में समावेशी विकास पर नए सिरे से बल दिया है। बिरसा मुंडा के सिद्धांत आज भी नए भारत की नीतियों, शासन और आकांक्षाओं को आकार दे रहे हैं। 

विरासत को मिला उसका सही स्थान

भगवान बिरसा मुंडा की विरासत देश भर में जनजातीय समुदायों के गीतों, आख्यानों, सामूहिक यादों में लंबे समय से जिंदा है। माननीय प्रधानमंत्री ने 2021 में बिरसा मुंडा के जन्म दिवस 15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस घोषित कर उनकी विरासत को राष्ट्रीय मान्यता दी। इस मान्यता को और गहराई देते हुए बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर 15 नवंबर 2024 से 15 नवंबर 2025 तक जनजातीय गौरव वर्ष मनाया गया। इस दौरान जनजातीय गौरव और विरासत के जश्न में समूचे राष्ट्र में 2 लाख से ज्यादा कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनकी पहुंच 3 करोड़ से अधिक नागरिकों तक रही।

देश भर में, इन आयोजनों ने जनजातीय जीवन की समृद्धि और विविधता को प्रदर्शित किया। नागालैंड के हॉर्नबिल महोत्सव और केरल के जनजातीय साहित्यिक महोत्सव से लेकर, झारखंड के राष्ट्रीय जनजातीय फिल्म महोत्सव और तेलंगाना की ‘कैनो स्प्रिंट चैम्पियनशिप’ (डोंगी चालन प्रतियोगिता) तक, इन कार्यक्रमों ने जनजातीय संस्कृति, रचनात्मकता, खेल और लोककथाओं को राष्ट्रीय पटल पर खड़ा किया। कुल मिलाकर, इनमें अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 लाख से अधिक जनजातीय नागरिकों की भागीदारी देखी गई। ये आयोजन इस बात की घोषणा थे कि आधुनिक भारत को आकार देने में जनजातीय विरासत एक जीवंत और सक्रिय शक्ति है।

जनजातीय सशक्तिकरण और समावेशन की दिशा में पिछले बारह वर्षों के निरंतर और केंद्रित राष्ट्रीय प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए, ‘जनजातीय गरिमा उत्सव 2026’ इस गति को चार विषयगत सप्ताहों के माध्यम से आगे ले जा रहा है, जो मिलकर जनजातीय विकास के संपूर्ण आयाम को दर्शाते हैं। विशेष रूप से इसका तीसरा सप्ताह भारत के भविष्य से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न पर केंद्रित है: हम उन व्यक्तियों और समुदायों को कैसे पहचानें जिन्होंने इस राष्ट्र को आकार दिया और हम आने वाली पीढ़ी को उस विरासत को आगे बढ़ाने के लिए कैसे सशक्त बनाएं?

इतिहास में विस्मृत नामों की पुनर्स्थापना

इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की शुरुआत उन अनेक जनजातीय नायकों को पहचान देने से होती है, जिनका योगदान बहुत लंबे समय तक मुख्यधारा के ऐतिहासिक आख्यानों से गायब रहा। देश के जनजातीय क्षेत्रों में, शिक्षकों, कलाकारों, पारंपरिक चिकित्सकों और समाज सुधारकों की पीढ़ियों ने इन समुदायों को संजो कर रखा है और उनकी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा है। उनकी कहानियाँ भारत की राष्ट्रीय स्मृति में एक सही और न्यायसंगत स्थान की हकदार हैं और उनके  इन योगदानों को दस्तावेजों में दर्ज करने तथा उन्हें याद रखने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।

देश भर के जनजातीय अनुसंधान संस्थान (टीआरआई) मौखिक इतिहास का  दस्तावेजीकरण करने, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को रिकॉर्ड करने और जनजातीय भाषाओं व सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने के प्रयास में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं। वर्तमान में, 26 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के 29 जनजातीय अनुसंधान संस्थान इस कार्य में जुटे हुए हैं, जिसके तहत 222 जनजातीय भाषाओं में 355 का प्रारंभिक दस्तावेजीकरण किया जा चुका है। ये प्रयास भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य सांस्कृतिक ज्ञान को संजोकर रखने में मदद कर रहे हैं।

राष्ट्रीय विमर्श में जनजातीय आवाज़ों को फिर से स्थापित करने का प्रयास ‘जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों’ के माध्यम से भी आकार ले रहा है, जिनकी परिकल्पना स्मृति और पहचान के स्थलों के रूप में की गई है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जनजातीय समुदायों की भूमिका को सम्मानित करने के लिए 10 राज्यों में ऐसे 11 संग्रहालयों को मंज़ूरी दी है। इनमें से चार संग्रहालयों का उद्घाटन पहले ही किया जा चुका है, जिनमें रांची में भगवान बिरसा मुंडा और नवा रायपुर में शहीद वीर नारायण सिंह को समर्पित संग्रहालय शामिल हैं। इन संस्थानों के जरिए जनजातीय वीरों की गाथाओं के दस्तावेजीकरण और उन पर आधारित कार्यक्रमों के आयोजन से इन्हें भारत की सामूहिक ऐतिहासिक याद में स्थाई रूप से पिरोया जा रहा है।

मशाल थामने वालों को सशक्तिकरण 

अतीत को सम्मानित करने के साथ ही, यह यात्रा स्वाभाविक रूप से वर्तमान पीढ़ी को सशक्त बनाने की ओर बढ़ती है। यह बदलाव उन जनजातीय छात्रों की बढ़ती संख्या में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जिन्हें मंत्रालय के छात्रवृत्ति कार्यक्रमों का लाभ मिल रहा है। अकेले चालू वर्ष में ही, पांच छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत 26,01,979 जनजातीय छात्रों को सहायता प्रदान की गई है, जिसके लिए कुल 3825.54 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। इनमें से कई छात्र अपने परिवारों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले व्यक्ति हैं, जो न केवल अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को, बल्कि पूरे समुदाय की आशाओं को आगे बढ़ा रहे हैं। विशेष बात यह है कि वर्तमान छात्रवृत्ति लाभार्थियों में से 56% से अधिक महिलाएं हैं।

एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) का विस्तार भी शिक्षा तक पहुँच और अवसरों के प्रति इसी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। स्वीकृत ईएमआरएस संस्थानों की संख्या वर्ष 2013-14 के 167 से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 723 हो गई है, जो 330% से अधिक की वृद्धि है – जबकि इसी अवधि के दौरान पहले से चल रहे स्कूलों की संख्या 123 से बढ़कर 499 हो गई है। छात्रों के नामांकन में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जो 0.34 लाख से बढ़कर 1.56 लाख छात्र हो गई है। जनजातीय क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण आवासीय शिक्षा प्रदान करके, ईएमआरएस संस्थान मजबूत शैक्षिक नींव तैयार करने और देश भर के जनजातीय बच्चों के लिए अवसरों का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं।

ये आंकड़े केवल योजनाओं के विस्तार को ही नहीं दर्शाते; बल्कि ये एक बड़े संरचनात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं। छात्रवृत्तियाँ और फेलोशिप वास्तव में आत्मविश्वास, प्रतिनिधित्व और नेतृत्व में किया जाने वाला निवेश हैं। हमारी प्रतिबद्धता अडिग है: किसी भी आदिवासी छात्र को भौगोलिक स्थिति, पृष्ठभूमि या शिक्षण संस्थानों तक सीमित पहुँच के कारण अवसरों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

महिला सशक्तिकरण की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति

शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे इस बदलाव के साथ-साथ, जनजातीय महिलाओं के नेतृत्व में भी जमीनी स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव आ रहा है। पीढ़ियों से, जनजातीय महिलाएं अपनी संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों और सामुदायिक जीवन की मूक संरक्षक रही हैं – वे परिवारों और परंपराओं को सहेजती आई हैं। भारत में लगभग 5.20 करोड़ जनजातीय महिलाएं हैं, जो कुल जनजातीय आबादी का लगभग आधा हिस्सा हैं। समावेशी विकास में उनका नेतृत्व अब मुख्य भूमिका निभा रहा है।

वर्तमान में, 4,712 वन धन विकास केंद्र स्वीकृत किए जा चुके हैं, जिनमें से 3,365 कार्यरत हैं। इनसे 12.9 लाख से अधिक लोग लाभान्वित हो रहे हैं और इन लाभार्थियों में आधे से अधिक संख्या महिलाओं की है। ये प्रयास एक ओर जहाँ जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनजातीय महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं।

आगे बढ़ती हुई विरासत 

समारोह, स्मरण, शिक्षा और महिला नेतृत्व मिलकर एक बड़ी और निरंतर आगे बढ़ने वाली कहानी का हिस्सा बनते हैं—एक ऐसी कहानी, जिसमें जनजातीय समुदाय आत्मविश्वास और सम्मान के साथ भारत के भविष्य को नया आकार दे रहे हैं। ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ और ‘प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महा अभियान’  जैसी पहलों के माध्यम से, समन्वय और सहयोग के नए प्रतिमान के ज़रिए जमीनी स्तर पर क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है। जनजातीय विद्वानों का उभरना, गुमनाम नायकों की पहचान और जनजातीय महिलाओं का बढ़ता नेतृत्व, यह सब मिलकर इस बात को दर्शाता है कि भगवान बिरसा मुंडा की विरासत आज के आधुनिक भारत में भी जीवंत है।

आज, भारत के 10.5 करोड़ से भी ज़्यादा आदिवासी नागरिक, देश की कहानी का एक सबसे प्रभावशाली और प्रगतिशील अध्याय हैं। वे राष्ट्रीय प्रगति के हाशिए पर नहीं हैं, बल्कि ‘विकसित भारत’ के संकल्प में सबसे मजबूत योगदान देने वालों में से हैं — जहाँ विद्वान नए कीर्तिमान रच रहे हैं, महिलाएँ नेतृत्व की नई परिभाषा गढ़ रही हैं और गुमनाम नायकों को आखिरकार राष्ट्रीय पहचान मिल रही है। इस यात्रा में, ‘धरती आबा’ की विरासत आगे बढ़ रही है।