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खाद्य हानि से खाद्य नेतृत्व की ओर:  दक्षिण एशिया के लिए अगला बड़ा अवसर है खाद्य प्रसंस्करण 

केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान

दक्षिण एशिया खाद्य प्रणालियों की अपनी यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। समृद्ध कृषि-जैव विविधता वाला एक प्रमुख क्षेत्र होने के बावजूद, खेत से उपभोक्ता तक पहुँचने की प्रक्रिया में अभी तक बहुत अधिक मूल्य नष्ट हो जाता है—जो किसानों, रोजगार और पोषण के लिए एक चूका हुआ अवसर है।

भारत इस विरोधाभास का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, भारत दूध और दालों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक तथा फल और सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। इसके बावजूद, कटाई के बाद की प्रक्रियाओं,  भंडारण, लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण में मौजूद कमियों के कारण खाद्य पदार्थों की बड़ी मात्रा में हानि होती रहती है। इससे सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) सहित वैश्विक विकास प्राथमिकताओं की दिशा में होने वाली प्रगति प्रभावित होती है। यह केवल अक्षमता भर नहीं है, बल्कि चूका हुआ अवसर भी है। बर्बाद होने वाले खाद्य पदार्थों का प्रत्‍येक टन, किसानों की खोई हुई आमदनी, युवाओं के लिए खोए हुए रोजगार के अवसर और परिवारों के लिए खोए हुए पोषण का प्रतीक है। इसलिए, इस हानि को मूल्य में बदलना अब एक क्षेत्रीय प्राथमिकता बन जाना चाहिए।

 खाद्य प्रसंस्करण मूल्यवर्धित कृषि की संभावनाओं का पता लगाने की कुंजी है। यह खेतों को बाजारों से, किसानों को उद्योगों से तथा स्थानीय उत्पादन को क्षेत्रीय और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ता है। इस प्रकार, यह कृषि और व्यापक आर्थिक परिवर्तन के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है।

मात्रा से मूल्य की ओर 

दशकों से कृषि नीतियों का मुख्य उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना रहा है। इस प्रयास ने खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में लाभ दिलाएं हैं। लेकिन अब अगले चरण में मूल्य सृजन, रोजगार के अवसरों के सृजन, किसानों की आय में वृद्धि और पोषण संबंधी परिणाम बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत में, वर्तमान में कृषि उपज का केवल लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्कृत किया जाता है। क्षेत्र की पूर्ण आर्थिक क्षमता का लाभ उठाने के लिए इस हिस्सेदारी को बढ़ाकर 2030 तक लगभग 25 प्रतिशत करना आवश्यक है। साथ ही, कटाई के बाद होने वाली खाद्य हानियों को कम करना और प्रसंस्करण से जुड़े तंत्रों को मजबूत बनाना भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा, ताकि अर्थव्यवस्था में अधिक से अधिक मूल्य बना रहे।  खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों की भंडारण अवधि बढ़ाता है, खाद्य सुरक्षा में सुधार करता है तथा नए और घरेलू निर्यात बाजारों तक पहुँच के अवसर प्रदान करता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह आर्थिक मूल्य के बड़े हिस्से को उत्पादक देशों के भीतर ही बनाए रखने में मदद करता है, जिससे किसानों, उद्यमों और ग्रामीण समुदायों को प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। 

बाज़ार आधारित मूल्य श्रृंखलाओं को आकार देना 

इस परिवर्तन को सफलतापूर्वक साकार करने के लिए मूल्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण —उत्पादन और संग्रहण से लेकर प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स और बाज़ार तक पहुँच सुनिश्चित करने में समन्वित निवेश की आवश्यकता होगी। गुणवत्ता, सुरक्षा, ट्रेसबिलिटी तथा लागत-प्रभावशीलता के प्रति उपभोक्ताओं की बदलती अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए अधिक एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य होगा।  

दक्षिण एशिया की समृद्ध कृषि-जैव विविधता उच्च मूल्य वाले उत्पादों के विकास की अपार संभावनाएँ प्रदान करती है, विशेषकर ऐसे समय में जब वैश्विक मांग अधिक विविधतापूर्ण, पौष्टिक और विशिष्ट खाद्य उत्पादों की ओर बढ़ रही है। साथ ही, डिजिटल समाधान ट्रेसबिलिटी को मजबूत करने, गुणवत्ता मानकों में सुधार लाने और लगातार जटिल होते वैश्विक बाज़ारों में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 

इसमें सार्वजनिक निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन इसे निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। निवेश को बड़े पैमाने पर आकर्षित करने के लिए व्यावसायिक वातावरण को मजबूत बनाना, जोखिमों को कम करना तथा प्रभावी सार्वजनिक-निजी साझेदारी को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक होगा। 

भारत ने इस दिशा में पहले ही प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना तथा उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना जैसी प्रमुख योजनाओं के माध्यम से खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के लिए ज़रूरी कदम उठाए हैं। ये कदम बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने, कोल्ड चेन नेटवर्क का विस्तार करने और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। जिससे अधिक गतिशील, प्रतिस्पर्धी क्षेत्र के लिए नींव रखी जा रही है।

रोजगार के अवसर वहीं, जहाँ उनकी सर्वाधिक आवश्यकता है  

खाद्य प्रसंस्करण केवल आर्थिक दक्षता के बारे में ही नहीं है—यह आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। 

पूरे दक्षिण एशिया में लाखों युवा हर वर्ष श्रम बाज़ार में प्रवेश करते हैं, जबकि कृषि क्षेत्र अकेले अब इस बढ़ती हुई श्रम शक्ति को समाहित करने में सक्षम नहीं है। ऐसे में खाद्य प्रसंस्करण एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है।

उत्पादन केंद्रों के निकट उद्योगों की स्थापना करके यह लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, खाद्य प्रौद्योगिकी और संबंधित सेवाओं के क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत रोजगार सृजित करता है। साथ ही, यह उद्यमिता के नए अवसर भी प्रदान करता है, जिससे सूक्ष्म और लघु उद्यमों को बढ़ने, औपचारिक बनने और आधुनिक मूल्य श्रृंखलाओं से जुड़ने का अवसर मिलता है।

यही इस क्षेत्र की वास्तविक संभावनाएँ निहित हैं— केवल खाद्य में मूल्य जोड़ने में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर सार्थक रोजगार सृजित करने में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में तथा महिलाओं और युवाओं के लिए । 

बदलते वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्धा 

भारत के प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात में लगातार वृद्धि हुई है, जो वैश्विक बाजारों में इसकी बढ़ती भूमिका को दर्शाता है। जिस प्रकार नए व्यापार समझौते बाज़ार के अवसर उत्‍पन्‍न कर रहे हैं, ऐसे में अब ध्यान कच्चे कृषि उत्पादों के निर्यात से हटकर उच्च मूल्य वाले प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात की ओर केंद्रित होना चाहिए।

वैश्विक उपभोक्ता अब ऐसे खाद्य पदार्थों की अधिक मांग कर रहे हैं जो सुरक्षित, पौष्टिक, ट्रेस करने योग्य और सतत रूप से उत्पादित हों। इससे गुणवत्ता, मानकों और नवाचार का महत्व और बढ़ जाता है—ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें भारत अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है।

इन अवसरों का पूरा लाभ उठाने के लिए तकनीक, गुणवत्ता अवसंरचना, ट्रेसबिलिटी प्रणालियों और ब्रांडिंग में और अधिक निवेश करना आवश्यक होगा। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण उत्पादकों और उद्यमों को मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी उपस्थिति मजबूत करने में सक्षम बनाएगा।

स्थिरता को केंद्र में रखते हुए 

खाद्य प्रणालियों का रूपांतरण भी स्थिर और लचीला होना चाहिए।

खाद्य हानि को कम करना भूमि, जल और ऊर्जा संसाधनों पर दबाव घटाने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है। साथ ही, अपशिष्ट मूल्यवर्धन- अर्थात कृषि उप-उत्पादों को नए उत्पादों में बदलने की दिशा में रहे नवाचार भी नए आर्थिक अवसरों को जन्‍म दे रहे हैं और पर्यावरणीय प्रभाव को भी कम कर रहे हैं।

सतत खाद्य प्रसंस्करण इकोसिस्‍टम सभी आयामों में मूल्य प्रदान करता है: बेहतर पोषण परिणामों में सहायता करता है, पर्यावरणीय पदचिह्नों को घटाता है और मूल्य श्रृंखला में आय तथा रोजगार के अवसर बढ़ाता है।

दक्षिण एशिया के नेतृत्व के लिए एक अवसर

इस क्षण की विशेषता यह है कि यह केवल किसी एक देश के बारे में नहीं है—बल्कि पूरे क्षेत्र के साथ मिलकर आगे बढ़ने का अवसर है।

दक्षिण एशियाई देश साझा चुनौतियों: खंडित आपूर्ति श्रृंखलाओं, सीमित प्रसंस्करण क्षमता और कटाई के बाद होने वाली उच्च स्तर की खाद्य हानि- का सामना कर रहे हैं, लेकिन ये साझा बाधाएँ साझा समाधानों के अवसर भी उत्‍पन्‍न करती हैं।

साउथ एशियन पॉलिसी लीडरशिप फॉर इम्प्रूव्ड न्यूट्रिशन एंड ग्रोथ (एसएपीएलआईएनजी) जैसे क्षेत्रीय मंच इस परिवर्तन को गति देने में मदद कर रहे हैं—सहयोग, ज्ञान के आदान-प्रदान और निवेश का ऐसा स्थान तैयार कर रहे हैं, जिसे कोई भी देश अकेले हासिल नहीं कर सकता। अनलॉकिंग वैल्यू डायलॉग इसी प्रतिबद्धता का प्रत्यक्ष उदाहरण है: यह पूरे क्षेत्र के नीति-निर्माताओं, नवाचारकर्ताओं, उद्योग जगत के दिग्‍गजों और विकास साझेदारों को एक साथ लाकर ऐसे संबंध स्थापित करता है, ज्ञान साझा करता है और साझेदारियाँ बनाता है, जो बेहतर रोजगार और अधिक मजबूत खाद्य प्रणालियों में परिवर्तित हो सकें।

उत्पादन और नीतिगत नवाचार दोनों में अग्रणी होने के नाते भारत को इस क्षेत्रीय परिवर्तन को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।

नीतियों से क्रियान्वयन की ओर 

हमारे सामने विकल्प स्पष्ट है।

हम या तो आपूर्ति श्रृंखला के हर चरण में मूल्य की हानि जारी रख सकते हैं, या फिर ऐसी आधुनिक और एकीकृत मूल्य श्रृंखलाओं का निर्माण कर सकते हैं, जो हर स्तर पर मूल्य का सृजन करें और उसे बनाए रखें।

हम कच्चे कृषि उत्पादों के निर्यातक बने रह सकते हैं, या फिर उच्च मूल्य वाले, टिकाऊ खाद्य उत्पादों में अग्रणी बन सकते हैं।

इस परिवर्तन का मार्ग खाद्य प्रसंस्करण से होकर गुजरता है।

खेतों से लेकर उद्यमों तक, और स्थानीय बाज़ारों से वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं तक—खाद्य प्रणालियों का यह रूपांतरण इस क्षेत्र के आर्थिक भविष्य को परिभाषित करेगा। नीति, निवेश और साझेदारी के सही संयोजन के साथ, दक्षिण एशिया खाद्य हानि से खाद्य नेतृत्व की ओर बढ़ सकता है।इसी भावना के साथ, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय अगले एसएपीएलआईएनजी उच्च-स्तरीय नीतिगत संवाद की मेज़बानी करने के लिए उत्सुक है, जो विश्व बैंक समूह सहित सरकारों, व्यवसायों और विकास साझेदारों को एक साथ लाया जाएगा,  ताकि ऐसे समाधानों को आगे बढ़ाया जा सके, जो रोजगार सृजित करें, निवेश को बढ़ावा दें और पूरे दक्षिण एशिया में अधिक मजबूत खाद्य प्रणालियाँ विकसित करें।

ग्रेट निकोबार: भारत की समुद्री रणनीति का प्रमुख केंद्र : एडमिरल डी. के. जोशी

“जो राज्य अपनी सीमाओं, साझेदारियों और व्यापार मार्गों की सुरक्षा नहीं करता, वह अपने भविष्य को भी सुरक्षित नहीं रख सकता।”

– कौटिल्य

कौटिल्य की यह सीख सदियों पहले ही शासन और रणनीति की मूल सोच का हिस्सा बन चुकी थी, और आज के समय में यह पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक होकर सामने आई है। आज देशों की परीक्षा केवल उनकी अर्थव्यवस्था के आकार या सैन्य ताकत से नहीं हो रही, बल्कि इस बात से हो रही है कि वे भूगोल को कितनी अच्छी तरह समझते हैं, भविष्य का कितना सही अनुमान लगाते हैं और अवसर के खतरे में बदलने से पहले कितनी तेजी से निर्णय लेते हैं। ग्रेट निकोबार भारत के लिए ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा है।

यह भारतीय मानचित्र के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर स्थित एक दूरस्थ द्वीप जैसा प्रतीत होता है। ऐसी जगह जिसे दशकों से लगभग अछूता छोड़ दिया गया है और जिसे वैसे ही रहने देना चाहिए। परंतु ग्रेट निकोबार भारत की अग्रिम समुद्री चौकी है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के समीप स्थित यह द्वीप दुनिया की ओर भारत की सबसे अहम सामरिक अवसर में से एक है। 

अत: ग्रेट निकोबार के प्रस्तावित विकास को केवल एक अवसंरचना परियोजना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह केवल एक बंदरगाह, हवाई अड्डा, टाउनशिप या बिजली संयंत्र बनाने का प्रश्‍न नहीं है। यह वास्तव में इस बात की सामरिक परीक्षा है कि क्या भारत अपनी इस दुर्लभ भौगोलिक बढ़त को राष्ट्रीय शक्ति में बदलने के लिए तैयार है।

सदियों से हिंद महासागर ने भारत की नियति को आकार दिया है। इसी समुद्री क्षेत्र ने हमारे व्यापार, हमारे विचारों और हमारे  सभ्यतागत प्रभाव को विश्‍व भर में पहुंचाया, परन्‍तु कई बार यही हमारी कमजोरियों का कारण भी बना। तथापि, स्वतंत्रता के पश्‍चात् लंबे समय तक भारत की सामरिक सोच मुख्य रूप से स्‍थल-आधारित रही।

यह निर्विवाद है कि ग्रेट निकोबार अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थान है। यह अंडमान तथा निकोबार द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीपों में से एक है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 910 वर्ग किलोमीटर है। प्रस्तावित परियोजना का कुल क्षेत्रफल 166.10 वर्ग किलोमीटर है, जो सम्‍पूर्ण द्वीपसमूह के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग 2 प्रतिशत है। इसमें से 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि को परियोजना के लिए उपयोग में लाने का प्रस्ताव है, जो द्वीप समूह के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 प्रतिशत है।

यह दक्षिण-पूर्व एशिया के निकट स्थित है तथा मलक्का स्‍ट्रेट, 60 चैनल, सुंडा स्‍ट्रेट और लोम्बोक स्‍ट्रेट जैसे प्रमुख वैश्विक समुद्री मार्गों के समीप आता है। वास्तविक सामरिक दृष्टि से देखें तो यह भारत की पूर्वी समुद्री चौकी है।

इसका महत्व तब और स्पष्ट हो जाता है जब इसे केवल भूभाग के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि महासागरीय रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए। कल्पना कीजिए उन जहाजों की, जो अदन की खाड़ी से मलक्का स्‍ट्रेट की ओर बढ़ रहे हैं, ऊर्जा से भरे मालवाहक जहाज, जो पश्चिम एशिया और अफ्रीका से पूर्वी एशिया की ओर जा रहे हैं, एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला कंटेनर यातायात तथा नौसैनिक संसाधन, निगरानी मंच और लॉजिस्टिक श्रृंखलाएँ, जो इन जलमार्गों से होकर गुजर रही हैं।

हिंद महासागर अब शांत समुद्र नहीं रहा। यह तेजी से एक भीड़भाड़ वाले सामरिक क्षेत्र में बदल रहा है। ऊर्जा आपूर्ति, कंटेनर यातायात, नौसैनिक तैनाती, द्वीपीय सुविधाएं, समुद्र के नीचे बिछी केबलें और समुद्री निगरानी अब एक बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुकी हैं। यह शायद मुख्य भूमि पर बैठे कई लोगों को दिखाई न दे, परन्‍तु देशों के भविष्य के लिए यह बेहद निर्णायक है।

हाल की एक महत्वपूर्ण प्रगति यह है कि अंडमान सागर को थाईलैंड की खाड़ी से जोड़ने वाली दशकों पुरानी कैनल परियोजना को स्थगित कर दिया गया है। इसके स्थान पर अब लगभग 90 किलोमीटर लंबे मल्टी-मोडल लैंड ब्रिज की योजना अंतिम स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। यह परियोजना टेंथ पैरेलल के साथ दो नव-डिज़ाइन किए गए गहरे समुद्री बंदरगाहों को जोड़ेगी — एक अंडमान सागर के किनारे रणोंग में और दूसरा थाईलैंड की खाड़ी के किनारे चुम्फोन में। इसके साथ दोहरी ट्रैक्‍स वाली उच्च गति रेल, बहु-लेन सड़क, तेल एवं गैस के लिए ऊर्जा पाइपलाइनें तथा वायु एवं डिजिटल ग्रिड भी प्रस्तावित हैं। ये सभी कारक मिलकर इंडो-पैसिफिक व्यापार मार्गों को पूरी तरह पुनर्परिभाषित कर रहे हैं और आर्थिक शक्ति का केंद्र सीधे अंडमान बेसिन की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं।

मलक्का स्‍ट्रेट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण सामुद्रिक चोकपॉइंट्स में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और अत्यंत मूल्यवान ऊर्जा संसाधनों (तेल और एलएनजी) तथा वैश्विक व्यापार का प्रमुख मार्ग है। ग्रेट निकोबार की गलाथिया खाड़ी 60 चैनल से लगभग 45 किलोमीटर दूर है, जो मलक्का स्‍ट्रेट को अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप की ओर जाने वाले समुद्री मार्गों से जोड़ती है। अनुमान है कि हर साल लगभग एक लाख जहाज मलक्का स्‍ट्रेट 60 चैनल मार्ग से गुजरते हैं।

मलक्का, सुंडा और लोम्बोक जैसे सामरिक चोकपॉइंट्स के निकट स्थित होने के कारण यह द्वीप भारत को अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक बढ़त प्रदान करता है। कोई भी गंभीर सामुद्रिक शक्ति ऐसे भौगोलिक तथ्यों की उपेक्षा करने का जोखिम नहीं उठा सकती। 

हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में अनेक शक्तिशाली देश बंदरगाहों, लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं, समुद्री पहुँच सुविधाओं, नौसैनिक संसाधनों, निगरानी प्रणालियों और आर्थिक गलियारों के माध्यम से निरंतर अपनी उपस्थिति का विस्तार कर रहे हैं।

भारत का उत्तर संकोचपूर्ण नहीं हो सकता। उसका उत्तर सामरिक सुदृढ़ीकरण होना चाहिए। संप्रभुता केवल मानचित्र पर सीमाएँ खींच देने से सुदृढ़ नहीं होती। वह तब सशक्त होती है जब कोई भूभाग जुड़ा हुआ, आबाद, सुविधायुक्त, उत्पादक और सामरिक रूप से उपयोगी बनता है। अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, टाउनशिप और विद्युत संयंत्र अलग-अलग परियोजनाएँ नहीं हैं। ये सभी मिलकर उस पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का निर्माण करते हैं, जिसकी सहायता से भारत एक निर्णायक सामुद्रिक स्थान पर विश्वसनीय, सतत और बहुआयामी उपस्थिति बनाए रख सकता है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने समुचित जांच-पड़ताल और आपत्तियों के निस्तारण के बाद यह स्वीकार किया कि यह परियोजना केवल द्वीप और उसके आसपास के सामरिक क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सिंगापुर केवल इसलिए एक महान सामुद्रिक केंद्र नहीं बना क्योंकि उसका भौगोलिक स्थान अनुकूल था। उसने उस स्थान के आस-पास आवश्यक क्षमताओं का निर्माण किया। भौगोलिक स्थिति ने उसे अवसर दिया, और उसके अवसंरचनात्मक विकास ने उस अवसर को प्रभाव में परिवर्तित किया। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया एक और महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह दर्शाता है कि कोई दूरस्थ द्वीप भी, यदि उसे लॉजिस्टिक और परिचालन अवसंरचना से सुसज्जित किया जाए, तो असाधारण सामरिक महत्व प्राप्त कर सकता है। सामुद्रिक शक्ति केवल भूगोल से नहीं बनती; वह भूगोल का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता विकसित करने से निर्मित होती है।

ग्रेट निकोबार भारत को यह सब एक संतुलित और विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण के साथ करने का अवसर प्रदान करता है। यह व्यापार को बढ़ावा दे सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ कर सकता है, विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम कर सकता है, साथ ही भारत की सामुद्रिक पहुँच को विस्तारित कर सकता है तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए एक प्रवेश द्वार और व्यापक इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के लिए एक सामरिक मंच के रूप में कार्य कर सकता है। ग्रेट निकोबार में एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के उस सामग्री पर निर्भरता को कम कर सकता है जिसे वर्तमान में विदेशी बंदरगाहों के माध्यम से ट्रांसशिप किया जाता है। इससे सप्लाई चेन सुदृढ होगी, निवेश आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे और भारत को अपने सामग्री की आवाजाही पर अधिक नियंत्रण और निश्चितता प्राप्त होगी।

निस्संदेह, ग्रेट निकोबार पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है। इस स्तर की किसी भी परियोजना को पारिस्थितिक सावधानी, कानूनी अनुपालन, वैज्ञानिक निगरानी और वास्तविक शमन उपायों के साथ लागू किया जाना चाहिए। विकास लापरवाह नहीं हो सकता। लेकिन पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सामरिक चिंतन पर स्थायी वीटो का आधार भी नहीं बनाया जा सकता। वास्तविक चुनौती पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच चयन करने की नहीं है। वास्तविक चुनौती यह है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ाया जाए।

वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस सामरिक द्वीप का उत्तरदायित्‍व पूर्वक विकास करना चाहता है, अथवा फिर ऐसे समय में जब पूरा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पुनर्गठित हो रहा है, वह इस द्वीप को अविकसित और अपर्याप्त रूप से जुड़ा हुआ छोड़ देगा।

भारत एक कॉन्टिनेंटल और सामुद्रिक — दोनों प्रकार की शक्ति है। लंबे समय तक स्थलीय सोच ने सामुद्रिक दृष्टिकोण पर हावी रहा है। अत: ग्रेट निकोबार परियोजना कोई विलासिता नहीं, बल्कि सामरिक दूरदृष्टि का प्रतीक है। किसी राष्ट्र की नियति केवल उन खतरों से निर्धारित नहीं होती जिनका वह सामना करता है, बल्कि उन अवसरों से भी तय होती है जिन्हें वह समय रहते पहचान लेता है। ग्रेट निकोबार ऐसा ही एक अवसर है। इसकी उपेक्षा करना भूगोल की उस सामरिक शक्ति को अनुपयोगी छोड़ देना होगा, जिसे बाद में अन्य शक्तियाँ अपने अनुसार आकार दे सकती हैं। वहीं, इसका विवेकपूर्ण विकास भूगोल को राष्ट्रीय शक्ति में परिवर्तित कर सकता है।

भारत को सामरिक दृष्टि से सोचने के लिए किसी से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल  उत्तरदायित्‍व पूर्वक, निर्णायक रूप से और स्पष्ट राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करने की आवश्यकता है। इंडो-पैसिफिक की इस शताब्दी में, ग्रेट निकोबार भारत का अंतिम छोर नहीं है, यह भविष्य के प्रवेश द्वार पर स्थित भारत का वॉचटावर है।

(लेखक वर्तमान में अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्यपाल तथा द्वीप विकास एजेंसी के उपाध्यक्ष हैं। वे भारतीय नौसेना के पूर्व नौसेना प्रमुख (Chief of the Naval Staff) रह चुके हैं और वर्ष 2009-10 के दौरान अंडमान तथा निकोबार कमान (A&N Command) के कमांडर-इन-चीफ भी रहे हैं।)

पीएम स्वनिधि योजना: स्ट्रीट वेंडर्स के एम्पावरमेंट और फाइनेंशियल इनक्लूजन के लिए एक ट्रांसफॉर्मेटिव टूलम

मनोहर लाल / विद्युत मंत्री

भारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है। अनुमान है कि 2050 तक देश की लगभग 50% आबादी शहरी इलाकों में रहेगी। अभी, लगभग 66% शहरी वर्कफ़ोर्स इनफ़ॉर्मल सेक्टर में शामिल है, जो शहरी अर्थव्यवस्था का एक अहम पिलर है। इस इनफ़ॉर्मल सेक्टर में स्ट्रीट वेंडर्स की भूमिका खास तौर पर खास है। ये लाखों वेंडर्स जो फल, सब्ज़ी, चाय, नाश्ता, कपड़े और रोज़ाना की दूसरी ज़रूरतें देते हैं, न सिर्फ़ करोड़ों नागरिकों की ज़िंदगी आसान बनाते हैं, बल्कि शहरी अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत करते हैं। इसके बावजूद, फ़ॉर्मल बैंकिंग और क्रेडिट तक उनकी पहुँच लंबे समय तक सीमित रही। क्रेडिट हिस्ट्री न होने की वजह से, उन्हें अक्सर ज़्यादा ब्याज़ दरों पर इनफ़ॉर्मल लोन लेना पड़ता था, जिससे उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लोन चुकाने में खर्च हो जाता था।

भारतीय स्ट्रीट वेंडर्स बदलते ग्लोबल हालात और अलग-अलग आर्थिक रुकावटों के बीच भी अपनी हिम्मत और मज़बूती के लिए जाने जाते हैं। PM SWANIDHI ने इस एंटरप्रेन्योरशिप की भावना को नई एनर्जी दी है। यह सिर्फ़ क्रेडिट देने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सम्मान, पहचान और नए मौकों का एक मज़बूत ज़रिया बन गया है।

इस स्कीम की सफलता का मुख्य आधार “होल ऑफ़ गवर्नमेंट अप्रोच” रहा है, जिसमें केंद्र, राज्यों, शहरी स्थानीय निकायों और बैंकिंग संस्थानों के मिलकर किए गए प्रयासों ने इसे पूरे देश में अभूतपूर्व तरीके से आगे बढ़ाया है और शानदार नतीजे हासिल किए हैं।

इस स्कीम के तहत, लाखों वेंडर्स के बैंक अकाउंट एक्टिवेट किए गए, उनके फाइनेंशियल व्यवहार को रिकॉर्ड किया जाने लगा और पहली बार, उनके लिए एक फॉर्मल क्रेडिट हिस्ट्री बनाई गई। इससे उन्हें भविष्य में ज़्यादा लोन और फाइनेंशियल सर्विस मिलना आसान हो गया है और वे आज बैंक के सम्मानित ग्राहक और उद्यमी बनकर उभरे हैं।

इस स्कीम का एक और ज़रूरी पहलू डिजिटल एम्पावरमेंट है। UPI और QR-कोड आधारित पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कैशबैक इंसेंटिव दिए गए हैं। इस पहल ने अब तक 55 लाख वेंडर्स को डिजिटल इकॉनमी से जोड़ा है, उनके लेन-देन को ट्रांसपेरेंट बनाया है और उनकी फाइनेंशियल क्रेडिबिलिटी को मज़बूत किया है। स्कीम का विज़न सिर्फ़ बिज़नेस तक ही सीमित नहीं रहा है। ‘स्वनिधि से समृद्धि’ पहल के ज़रिए, बेनिफिशियरीज़ और उनके परिवारों को भारत सरकार की आठ बड़ी वेलफेयर स्कीम्स से जोड़ा गया है। अब तक इन स्कीम के तहत 50 लाख से ज़्यादा स्ट्रीट वेंडर्स की प्रोफाइलिंग की जा चुकी है और 1.52 करोड़ से ज़्यादा लोगों को फ़ायदे दिए जा चुके हैं। पेंशन, इंश्योरेंस, हेल्थ सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी जैसी सुविधाओं तक पहुँच देकर, यह पहल स्ट्रीट वेंडर्स और उनके परिवारों के लिए एक बड़े सोशल सिक्योरिटी सिस्टम का ज़रिया बन गई है। इसके अलावा, FSSAI के साथ मिलकर फ़ूड सेफ्टी और हाइजीन पर ट्रेनिंग भी दी गई है, जिससे खास तौर पर स्ट्रीट फ़ूड वेंडर्स की क्वालिटी, हाइजीन और कस्टमर का भरोसा बढ़ा है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी इस स्कीम का योगदान काफ़ी सराहनीय रहा है। कुल बेनिफिशियरीज़ में से लगभग 46% महिलाएँ हैं। इससे उनकी इनकम, सामाजिक इज़्ज़त और परिवार के फ़ैसलों में हिस्सेदारी बढ़ी है। साल 2023 और 2025 में किए गए इंडिपेंडेंट इम्पैक्ट असेसमेंट ने भी इस स्कीम के दूरगामी असर की पुष्टि की है। लगभग 95% बेनिफिशियरीज़ ने अपनी ज़िंदगी में पहली बार फ़ॉर्मल फ़ाइनेंशियल सिस्टम से लोन लिया है, जो फ़ाइनेंशियल इनक्लूजन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। इतना ही नहीं, लगभग 30% बेनिफिशियरी PM SWANIDHI से आगे बढ़कर दूसरे फॉर्मल फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से लोन भी ले पाए हैं, जो उनके बढ़ते फाइनेंशियल कॉन्फिडेंस और मजबूत क्रेडिट प्रोफाइल का सबूत है। इस स्कीम के बेनिफिशियरी की इनकम में सालाना लगभग 20% की एवरेज ग्रोथ दर्ज की गई है। इसके साथ ही, हाउसिंग, न्यूट्रिशन, हेल्थकेयर और बच्चों की एजुकेशन जैसे एरिया में भी सुधार देखा गया है। 2023 और 2025 के बीच UPI बेस्ड ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल लगभग 45% से बढ़कर 83% हो गया है। स्कीम के बड़े पैमाने पर और पॉजिटिव असर को देखते हुए, अगस्त 2025 में, केंद्रीय मंत्रालय ने इसके रीस्ट्रक्चर्ड फॉर्म को मार्च 2030 तक बढ़ाने की मंजूरी दी। रीस्ट्रक्चर्ड स्कीम के तहत, स्ट्रीट वेंडर्स की क्रेडिट लिमिट बढ़ा दी गई है और स्कीम का दायरा अर्बन लोकल बॉडीज से आगे बढ़ाकर सेंसस टाउन्स/पेरी अर्बन तक कर दिया गया है। इसके साथ ही, कैपेसिटी बिल्डिंग पर खास जोर दिया जा रहा है ताकि स्ट्रीट वेंडर्स बदलती इकोनॉमिक जरूरतों के हिसाब से अपने बिजनेस को और मजबूत कर सकें। SWANIDHI क्रेडिट कार्ड की शुरुआत भी इसी कड़ी में एक अहम कदम है। यह सुविधा स्ट्रीट वेंडर्स को उनकी तुरंत की फाइनेंशियल और पर्सनल ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शॉर्ट-टर्म बिना ब्याज का क्रेडिट देती है। हालांकि PM SWANIDHI योजना ने स्ट्रीट वेंडर्स को फाइनेंशियल ताकत दी है, लेकिन आज कई जगहों पर उन्हें शहर की प्लानिंग के स्ट्रक्चर का हिस्सा नहीं माना जाता है। उन्हें प्लान्ड वेंडिंग जगहों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कोई तय जगह न होने की वजह से उनकी रोजी-रोटी और ग्राहकों तक पहुंच पर असर पड़ता है। इस चुनौती से निपटने के लिए, आने वाले सालों में राज्य सरकारों और शहरी लोकल बॉडीज़ को स्ट्रीट वेंडर्स को शहरी प्लानिंग के फ्रेमवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस दिशा में एक छोटी सी पहल – स्ट्रीट फूड हब के ज़रिए, उन्हें सुविधाजनक और ऑर्गनाइज़्ड कमर्शियल जगहें उपलब्ध कराई जाएंगी। इससे

एआई का जनजातीय भाषाओं में संवादः समावेशी विकास का द्योतक या जनजातीय गरिमा को प्रौद्योगिकी का समर्थन 

नई दिल्ली / सत्ता संदेश

हमारे देश भर में फैले जंगलों, पहाड़ियों और दूरदराज की बस्तियों में, एक शांत लेकिन सफल परिवर्तन चल रहा है। जनजातीय समुदाय लंबे समय से भारत की विकास गाथा के केंद्र में अपने उचित स्थान का इंतजार कर रहे थे। आज वे राष्ट्र की प्रगति के सक्रिय वास्तुकार के रूप में उभर रहे हैं। जनजातीय गरिमा उत्सव की यही भावना है: विकसित भारत की यात्रा का एक राष्ट्रीय उत्सव, जहां प्रगति भूगोल या परिस्थिति का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का समान रूप से अधिकार है।

महत्वाकांक्षा का पैमाना

यह समझने के लिए कि प्रौद्योगिकी जनजातीय विकास के लिए अपरिहार्य क्यों हो गई है, किसी को पहले चुनौती की व्यापकता को समझना चाहिए। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन), धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए), राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन और संबंधित पहलों में 549 जिलों और 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 2,911 ब्लॉकों के 63,000 से अधिक गांवों को शामिल किया गया है, जिससे 5.5 करोड़ से अधिक आदिवासी नागरिक लाभान्वित हुए हैं। विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) पर विशेष ध्यान देने के साथ, इन प्रयासों का उद्देश्य आवास, पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, कनेक्टिविटी और आजीविका जैसी आवश्यक सेवाओं का सम्पूर्ण कवरेज सुनिश्चित करना है। इस तरह के विविध और विस्तृत इलाके में हर परिवार तक पहुंचने के लिए ऐसी प्रणाली की आवश्यकता होती है जो डेटा-संचालित, कनेक्टेड और उत्तरदायी होती है और यही हम तैयार कर रहे हैं।

इस वर्ष जनजातीय गरिमा उत्सव का आयोजन लगभग चार विषयगत सप्ताह के आसपास किया जा रहा है, जो एक साथ जनजातीय विकास के पूर्ण आयाम को दर्शाते हैं। उद्घाटन का विषय, “विकास के एक वाहक के रूप में प्रौद्योगिकी”, इस बात को दर्शाता है कि कैसे डिजिटल सिस्टम, विज्ञान और नवाचार भारत के कुछ दूरस्थ समुदायों तक शासन और अवसर का विस्तार करने में मदद कर रहे हैं। इस दृष्टिकोण के केंद्र में एक सरल सिद्धांत निहित है: जनजातीय भाषाओं, संस्कृतियों, विरासत और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का पर्याप्त सम्मान करते हुए विकास को अंतिम दूरी तक पहुंचना चाहिए। 

प्रौद्योगिकी द्वारा जनजातीय गरिमा को बढ़ावा 

उद्देश्य के साथ निर्देशित होने पर प्रौद्योगिकी क्या हासिल कर सकती है, इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण बिरसा 101 यानी सिकल सेल रोग के लिए भारत की पहली स्वदेशी सीआरआईएसपीआर-आधारित जीन थेरेपी है। सिकल सेल रोग लंबे समय से जनजातीय आबादी के लिए स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है और भारत अब समानता और पहुंच में निहित उन्नत विज्ञान के साथ उस चुनौती का जवाब दे रहा है। जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से अनुसंधान, नैदानिक परीक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का समर्थन करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। सीएसआईआर-आईजीआईबी में हाल ही में एक संगोष्ठी में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और सिकल सेल योद्धाओं को एक साथ लाया गया, जो वैज्ञानिक प्रगति और प्रयासों के पीछे की मानवीय तात्कालिकता दोनों को दर्शाता है।

साझा लक्ष्य स्पष्ट है: एक किफायती, एकमुश्त उपचारात्मक उपचार विकसित करना जो जरूरतमंद हर आदिवासी परिवार तक पहुंच सके। बीआईआरएसए 101 केवल चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि से भी बढ़कर है। यह एक घोषणा है कि भारत का सबसे उन्नत विज्ञान अपने सबसे पात्र समुदायों की सेवा करेगा।

यह दृढ़ विश्वास एक पहल से कहीं अधिक गहरा है। ट्रेडिशनल नॉलेज डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) और आयुर्जेनोमिक्स जैसे प्रयास दर्शाते हैं कि कैसे आधुनिक तकनीक आदिवासी समुदायों द्वारा लंबे समय से संरक्षित समृद्ध औषधीय और पारिस्थितिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, मान्यीकरण और संरक्षण में मदद कर सकती है।

समावेशन की यही भावना इस बात को आकार दे रही है कि कैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जनजातीय विकास के साथ जोड़ा जा रहा है। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में, मंत्रालय ने एक सरल लेकिन दृढ विश्वास पर आधारित एआई-सक्षम प्लेटफार्मों की श्रृंखला प्रस्तुत की, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि भाषा एक बाधा नहीं है जिसे दूर किया जाना है, बल्कि एक पहचान है जिसका उत्सव मनाया जाना चाहिए। आदि वाणी, जनजातीय भाषाओं के लिए एआई-संचालित अनुवादक, टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट और टेक्स्ट-टू-स्पीच अनुवाद, ओसीआर और आदिवासी भाषाओं में सरकारी योजना की जानकारी के वितरण का समर्थन करता है, जिससे नागरिकों को घर पर बोलने वाली भाषा में सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ने में सक्षम बनाया जाता है। ट्राइबॉट एक बहुभाषी संवादी एआई सहायक है, जो दूरदराज के क्षेत्रों में नागरिकों को तत्क्षण मार्गदर्शन और शिकायत निपटारे में सहायता प्रदान करके इस प्रयास को और मजबूत करता है। भगवान बिरसा मुंडा सेल और आईआईटी दिल्ली के साथ आयोजित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान भी इन प्रयासों पर चर्चा की गई, जो जनजातीय भाषाओं के दीर्घकालिक संरक्षण और सुदृढ़ीकरण सहित एआई के सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और समुदाय-केंद्रित इस्तेमाल पर केंद्रित थी।

प्रौद्योगिकी सांस्कृतिक अभिकथन और आर्थिक सशक्तिकरण का एक शक्तिशाली माध्यम भी बन रही है। आगामी ट्राइबएक्स प्लेटफॉर्म का उद्देश्य जनजातीय कलाओं, भाषाओं, पारंपरिक ज्ञान, संगीत, शिल्प और सांस्कृतिक अनुभवों को बढ़ावा देने के लिए एक डिजिटल इकोसिस्टम बनाना है। इस प्रयास को पूरा करते हुए, जनजातीय भारत का प्रस्तावित जीआई संभावित कला और शिल्प एटलस भौगोलिक संकेत क्षमता के साथ जनजातीय हस्तशिल्प, वन उत्पादों और पारंपरिक कला रूपों का डिजिटल रूप से मानचित्रण करेगा, जिससे ब्रांडिंग, बाजार पहुंच और जनजातीय बौद्धिक विरासत की पहचान को मजबूत करने में मदद मिलेगी। पायलट आधार पर पांच राज्यों के जनजातीय अनुसंधान संस्थानों में इनोवेशन हब की योजना बनाई गई है, जो नवाचार के नेतृत्व वाले आदिवासी उद्यमियों और स्टार्टअप के लिए डिजाइन और उत्पाद विकास सहायता, जीआईएस-आधारित योजना डैशबोर्ड और इनक्यूबेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को जोड़कर और आगे बढ़ेंगे। 

प्रौद्योगिकी जनजातीय समुदायों तक शासन के तरीके को समान रूप से बदल रही है। पीवीटीजी घरेलू सर्वेक्षणों के लिए पीएम-जनमन के तहत सर्वेक्षण सेतु दूरदराज के क्षेत्रों में कल्याण वितरण की तत्क्षण, जियो-टैग निगरानी को सक्षम बनाता है। 18 राज्यों और 1 केंद्र शासित प्रदेश में संचालित, इस प्लेटफॉर्म ने 8,552 सर्वेक्षणकर्ताओं के समर्थन के साथ पहले ही 3.43 लाख घरेलू प्रस्तुतियां दर्ज की हैं। इस तरह की डेटा-संचालित प्रणालियां यह सुनिश्चित करने में मदद करती हैं कि प्रत्येक पात्र परिवार की पहचान की जाए और उसे आवश्यक सेवाओं से जोड़ा जाए। इसके साथ ही मंत्रालय दावा प्रस्तुतीकरण, जीआईएस-आधारित मानचित्रण, वर्कफ्लो की निगरानी और शिकायत निवारण को सुव्यवस्थित करने के लिए एक एआई-सक्षम वन अधिकार अधिनियम शासन मंच विकसित कर रहा है। साथ में, ये पहल आदिवासी नागरिकों के लिए शासन को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और सुलभ बना रही हैं।

जनजातीय समुदाय: विकसित भारत के वाहक

एक क्षण ऐसा होता है, जो उस सार को पकड़ लेता है, जिसके लिए हम काम कर रहे होते हैं। यह किसी नीतिगत दस्तावेज या मंत्रिस्तरीय समीक्षा में नहीं पाया जाता है। यह तब पाया जाता है जब दूरदराज की बस्ती की एक आदिवासी महिला, तकनीक से, भाषा से सशक्त होती है और उसे इस बात का अहसास होता हो कि उसकी बात को राष्ट्र सुन रहा है। ऐसे में वह अपनी शर्तों पर सरकारी सेवाओं से जुड़ती है और पूरी गरिमा के साथ जवाब प्राप्त करती है। वह क्षण किसी यात्रा का अंत नहीं है। यह भारत की राष्ट्रीय गाथा में एक नए अध्याय की शुरुआत है।

जनजातीय गरिमा उत्सव इस संदेश को गर्व के साथ ले जाता है। जनजातीय समुदाय, अपनी दृढता, अपने पारिस्थितिक ज्ञान, अपनी कलात्मक परंपराओं और इस भूमि में अपनी गहरी जड़ों के साथ, विकसित भारत की दहलीज पर इंतजार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे इसके सबसे शक्तिशाली और प्रेरक वाहकों में शामिल हैं। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी दूरियों को पाटती है, जैसे-जैसे विज्ञान उपचार प्रदान करता है, जैसा कि एआई जंगलों और पहाड़ियों की भाषाओं में बोलता है, और जैसे-जैसे शासन सबसे दूर के गांव के अंतिम परिवार तक पहुंचता है, हम हर दिन भारत के करीब आते हैं जो न केवल व्यापकता के रूप में विकसित है, बल्कि अपनी मानवता में परिपूर्ण है। यह वह विकसित भारत है जिसे हम माननीय प्रधानमंत्री के विजन से प्रेरित होकर एक साथ मिलकर निर्मित कर रहे हैं। 

(लेखिका भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव हैं) 

सोमनाथ से सिंदूर तक: पुनरुत्थानशील भारत की भावना

75 वर्ष पहले किया गया भव्य सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा भारत के
सभ्यतागत गौरव की पुनर्स्थापना का निर्णायक क्षण था। इसने भारत की उस दृढ़ता और
संकल्प को पुनः स्थापित किया, जो प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’
मिशन का मूल आधार है।
इस पवित्र उपलब्धि की 75वीं वर्षगांठ राष्ट्र को भारतीय सभ्यता की मजबूत नींव और शक्ति
पर सर्वोच्च विश्वास प्रदान करती है, जो 1,000 वर्षों तक कट्टरपंथियों द्वारा मंदिर पर किए
गए भीषण हमलों को झेलने के बाद भी और अधिक सशक्त होकर उभरी।
गुजरात के शांत समुद्र तट पर स्थित यह मंदिर हर आक्रमण के बाद खंडहरों से अपनी पूरी
भव्यता के साथ फिर उठ खड़ा हुआ। कई मायनों में इसका इतिहास भारत के अतीत का
प्रतिबिंब है, जहाँ हमारे शांतिप्रिय लोगों ने अपनी आस्था, संस्कृति और विरासत पर हुए क्रूर
हमलों के बाद फिर से मजबूती से वापसी की।
जैसा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा, जिस प्रकार सोमनाथ को नष्ट करने के लिए बार-बार
षड्यंत्र और प्रयास हुए, उसी प्रकार विदेशी आक्रमणकारियों ने सदियों तक भारत को समाप्त
करने की कोशिश की। फिर भी न तो यह पूजनीय तीर्थ नष्ट हुआ और न ही भारत।
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि सोमनाथ पर हमलों का उद्देश्य लूटपाट से ज़्यादा खतरनाक
था। उन्होंने कहा, “यदि हमले केवल लूट के लिए होते, तो एक हजार वर्ष पहले हुई पहली
बड़ी लूट के बाद ही रुक गए होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोमनाथ की पवित्र मूर्ति को
अपवित्र किया गया, मंदिर के स्वरूप को बार-बार बदला गया। और हमें यह सिखाया गया
कि सोमनाथ को केवल लूट के लिए नष्ट किया गया था। घृणा, उत्पीड़न और आतंक का यह
क्रूर इतिहास हमसे छिपाया गया।”
नेहरू का विरोध- स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण के मिशन का
नेतृत्व किया। यह नवस्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय आत्मविश्वास की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों में से
एक था। लेकिन इस प्रयास की राह में भी मुश्किलें आईं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री

जवाहरलाल नेहरू ने इसके ऐतिहासिक लोकार्पण समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र
प्रसाद के शामिल होने का औपचारिक तौर पर विरोध किया। इसके बावजूद राष्ट्रपति ने 11
मई 1951 को मंदिर का लोकार्पण किया।
सदियों के क्रूर उत्पीड़न के बाद इस पुनर्निर्माण ने भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और
सभ्यता पर गर्व के बीज बोए। काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के
पुनरुद्धार से लेकर अयोध्या में भव्य राम मंदिर तक; केदारनाथ के पुनर्जीवन से लेकर असंख्य
धरोहर स्थलों के संरक्षण तक — भारत अपनी सभ्यता की कहानी को गरिमा और उद्देश्य के
साथ पुनः स्थापित कर रहा है। इन प्रयासों से पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है और स्थानीय
लोगों के लिए रोजगार एवं व्यापार के अनेक अवसरों का सृजन हो रहा है।
वैश्विक पहचान- सोमनाथ की ही भांति भारत भी और अधिक सशक्त होकर उभरा है। यह
विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के साथ-साथ अपनी समृद्ध विरासत
और आधुनिकता के अद्वितीय संगम के लिए वैश्विक पहचान बना रहा है। 2014 में जब देश
भारी बहुमत से मोदी सरकार को सत्ता में लाया, तो संयुक्त राष्ट्र महासभा ने रिकॉर्ड 175
देशों के समर्थन से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का प्रस्ताव पारित किया। योग आज एक
वैश्विक वेलनेस मुहिम बन चुका है, जिसने दुनिया की सभी संस्कृतियों के लोगों को लाभ
पहुंचाया है।
एक दशक बाद, प्रधानमंत्री श्री मोदी ने पश्चिम एशिया में संयुक्त अरब अमीरात सरकार
द्वारा उपहार में दी गई भूमि पर बने एक भव्य मंदिर का लोकार्पण किया। इससे पहले,
प्रधानमंत्री ने बहरीन में 200 वर्ष पुराने मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य का शुभारंभ किया था।
वह नियमित रूप से प्रवासी भारतीयों से संवाद करते हैं जिससे वे भारतीय सांस्कृतिक
विरासत का गौरवशाली दूत बन जाते हैं।
आयुष और योग का वैश्वीकरण-भारत की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देना और
पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से जुड़े पेशेवरों के लिए वैश्विक अवसरों का सृजन करना, हाल के
वर्षों में भारत द्वारा विकसित देशों के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का
महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। हमारे कारीगरों, श्रमिकों, किसानों, मछुआरों, छोटे व्यवसायों और
स्टार्टअप्स के लिए लाभकारी वैश्विक अवसरों का सृजन करने के साथ-साथ ये समझौते
प्रधानमंत्री के “विकास भी, विरासत भी” के विजन को आगे बढ़ाते हैं।
हाल ही में न्यूजीलैंड के साथ संपन्न एफटीए पारंपरिक चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं
में भारत की वैश्विक पहुँच में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें आयुष चिकित्सकों और योग
प्रशिक्षकों के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक एवं ज्ञान-आधारित पेशेवरों को न्यूजीलैंड में
कार्य करने के लिए वीजा कोटा प्रदान किया गया है।
यह एफटीए आयुर्वेद, योग और अन्य पारंपरिक चिकित्सा सेवाओं के व्यापार के लिए
अनुकूल वातावरण तैयार करता है तथा आयुष को समकालीन और वैश्विक रूप से प्रासंगिक
स्वास्थ्य समाधान के रूप में स्थापित करता है।

ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए व्यापार समझौतों में भी इसी प्रकार के
प्रावधान हैं। यूरोपीय संघ के साथ एफटीए आयुष चिकित्सकों को भारत में प्राप्त
व्यावसायिक योग्यता के आधार पर यूरोपीय देशों में सेवाएँ देने की अनुमति देगा। यह
यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में आयुष वेलनेस सेंटर और क्लीनिक बनाने में भी मदद करता
है।
नई चुनौतियों पर विजय-जहाँ एक ओर भारत की सांस्कृतिक विरासत दुनिया का ध्यान
आकृष्‍ट कर रही है, वहीं देश कट्टरपंथियों के निशाने पर बना हुआ है, जो आतंकवाद और
घुसपैठ के माध्यम से भारत की सामंजस्यपूर्ण विरासत को बिगाड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में नया भारत ऐसी चुनौतियों का ज़ोरदार जवाब देता है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से भारत ने आतंकवादियों और सीमा पार मौजूद उनके संरक्षकों
को करारा सबक सिखाया। हाल के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने
उन दलों को नकार दिया, जो घुसपैठियों का समर्थन कर रहे थे, वोट-बैंक की राजनीति कर
रहे थे और भारत की सांस्कृतिक विरासत को कमजोर कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि
ऑपरेशन सिंदूर और सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण, दोनों की वर्षगांठ में कुछ ही दिनों का
अंतर है। ये दोनों ही भारत की दृढ़ता और शक्ति को दर्शाती हैं।
सोमनाथ की कहानी अंततः राजनीति से कहीं आगे है। यह एक ऐसी सभ्यता की दास्‍तान है,
जिसने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। अपने पुनर्निर्माण के 75 वर्ष बाद, आज सोमनाथ
केवल मंदिर नहीं, बल्कि भारत की दृढ़ता, निरंतरता और राष्ट्रीय आत्मविश्वास का कालजयी
प्रतीक बनकर खड़ा है।
(लेखक केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री हैं।)

सोमनाथ : आस्था, संकल्प और पुनर्जागरण की अनंत धारा

न हन्यते हन्यमाने शरीरे
(शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती।)
— भगवद्गीता 2.20

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में निहित भाव और भारतीय सभ्यता की सनातन चेतना का सबसे जीवंत स्वरूप गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के दक्षिणी तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर में दिखाई देता है। बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले सोमनाथ ने इतिहास में अनेक आक्रमणों और विनाश को सहा, लेकिन हर बार फिर खड़ा हुआ और उसकी आरती, घंटियों और श्रद्धा की ध्वनि कभी थमी नहीं।

भारतीय इतिहास के हजारों वर्षों में सनातन धर्म ने कई तरह की चुनौतियों का सामना किया। राजनीतिक परिवर्तन, आक्रमण और सत्ता परिवर्तन के दौर में मंदिरों, मठों और ज्ञान केंद्रों को नुकसान पहुंचाया गया, उनकी संरचनाएं बदली गईं और उन्हें संरक्षण देने वाली व्यवस्थाएं भी प्रभावित हुईं। इसके बावजूद भारतीय आध्यात्मिक परंपरा न केवल जीवित रही, बल्कि समय के साथ स्वयं को पुनर्स्थापित भी करती रही। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यही रही कि संस्थागत क्षति और राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद इसकी आत्मा कभी समाप्त नहीं हुई।

प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिर केवल पूजा के स्थल नहीं थे, बल्कि आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन के भी केंद्र थे। राजसत्ता से उनके गहरे संबंध के कारण वे युद्ध और संघर्ष के समय सबसे पहले निशाने पर आए। महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ पर किया गया आक्रमण इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है। फारसी ग्रंथों में इसे विजय के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि भारतीय परंपरा में इसे पीड़ा, संघर्ष और पुनर्निर्माण की कथा के रूप में याद किया गया। लेकिन ऐतिहासिक सत्य यह है कि सोमनाथ कभी श्रद्धा से विलुप्त नहीं हुआ। चालुक्य शासकों सहित अनेक राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया और यह निरंतर आस्था का केंद्र बना रहा। ऐसी अनेक घटनाएं भारत के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिलती हैं।

सोमनाथ का इतिहास केवल एक आक्रमण की कहानी नहीं है। प्राचीन काल से ही प्रभास पाटन एक महान तीर्थभूमि रहा है। इसे विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में प्रभास-पट्टन, शिव-पट्टन और प्रभास-तीर्थ जैसे नामों से जाना गया। यहां तीन पवित्र नदियों का संगम होता है और यही वह स्थान माना जाता है जहां भगवान श्रीकृष्ण के देहत्याग के बाद उनका अंतिम संस्कार हुआ। निकट ही वैराग्य क्षेत्र और गोपी तालाब स्थित हैं, जहां से गोपी चंदन प्राप्त होता है। इस संपूर्ण क्षेत्र की यात्रा को भारतीय तीर्थ परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है। काठियावाड़ और गुजरात की प्राचीन धरोहरों पर आधारित कई ऐतिहासिक अभिलेखों और पुरातात्विक रिपोर्टों में भी इस क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।

सोमनाथ भारत की समावेशी सांस्कृतिक परंपरा का भी प्रतीक है। यह शैव और वैष्णव परंपराओं के अद्भुत संगम का केंद्र है और हमें यह याद दिलाता है कि भारतीय संस्कृति हमेशा से बहुलतावादी और समावेशी रही है।

स्वतंत्र भारत में सोमनाथ के पुनर्जागरण का आधुनिक अध्याय 12 नवंबर 1947, दीपावली के दिन आरंभ हुआ, जब देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने इस पवित्र स्थल का दौरा किया। विभाजन की पीड़ा के बीच सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। यह केवल एक मंदिर के पुनर्निर्माण का निर्णय नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करने का एक ऐतिहासिक प्रयास था। इसके बाद सोमनाथ को एक सांस्कृतिक और बौद्धिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में कार्य प्रारंभ हुआ।

11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में प्रातःकाल संपन्न हुई प्राण-प्रतिष्ठा ने पूरे राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति और आत्मविश्वास को नई शक्ति प्रदान की।

आज जब भारत ‘भारत@2047’ की ओर बढ़ रहा है, तब सोमनाथ से जुड़े ये सभ्यतागत मूल्य और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। तकनीकी बदलाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में भारत दुनिया को यह संदेश देता है कि विकास का अर्थ करुणा को त्यागना नहीं है और शक्ति का अर्थ संयम को छोड़ देना नहीं है। सोमनाथ हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व केवल सामर्थ्य से नहीं, बल्कि स्मृति, विवेक और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से निर्मित होता है।

इसी दृष्टि से “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026-27” की परिकल्पना की गई है। यह वर्षभर चलने वाला राष्ट्रीय आयोजन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की आध्यात्मिक शक्ति, सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत चेतना को समर्पित है। सदियों तक अनेक बार विध्वंस झेलने के बाद भी जिस प्रकार समाज के सामूहिक संकल्प से सोमनाथ पुनः स्थापित होता रहा, वह भारत की सांस्कृतिक आत्मशक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान का जीवंत उदाहरण है।

8 से 11 जनवरी 2026 के बीच प्रारंभ हुए इस पर्व के माध्यम से दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ावों को स्मरण किया जा रहा है – 1026 में सोमनाथ पर हुए प्रथम दर्ज आक्रमण के एक हजार वर्ष और स्वतंत्रता के बाद 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर के पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष।

इस आयोजन का उद्देश्य सोमनाथ को राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और सामूहिक स्मृति के प्रतीक के रूप में स्थापित करना है। 11 मई 2026 को आयोजित होने वाले प्रमुख राष्ट्रीय कार्यक्रम तक देशभर में यात्राएं, सांस्कृतिक आयोजन, संवाद, शैक्षिक कार्यक्रम और विभिन्न ज्योतिर्लिंगों, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, जिलों और शिवालयों में समन्वित गतिविधियां आयोजित की जाएंगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, जो श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं, सोमनाथ ने एक नए पुनर्जागरण का दौर देखा है। प्रशासनिक सुधार, आधारभूत संरचना का विकास, धरोहर संरक्षण और सांस्कृतिक पहलों ने सोमनाथ को एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र के रूप में और अधिक सशक्त किया है। पर्यावरणीय संतुलन और महिला-सशक्तिकरण आधारित सेवा पहलों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि भारतीय सभ्यतागत मूल्य आधुनिक जिम्मेदारियों और समावेशिता के साथ कैसे आगे बढ़ सकते हैं।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व आधुनिक समाज को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का एक प्रयास है। यह हमें याद दिलाता है कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति उन मूल्यों, परंपराओं और जिम्मेदारियों में है, जिन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया जाता रहा है। इसी कारण आज सोमनाथ केवल पुनर्निर्मित मंदिर नहीं, बल्कि एक जीवंत तीर्थ है।

21वीं सदी में आगे बढ़ते भारत के लिए सोमनाथ एक महत्वपूर्ण संदेश देता है — कोई भी सभ्यता तब मजबूत रहती है जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे, समय के साथ स्वयं को ढालती रहे और सभी को साथ लेकर चले।

सोमनाथ की यह विरासत हमें निरंतर प्रेरित करती रहे — उद्देश्यपूर्ण निर्माण करने के लिए, संतुलित आचरण के लिए और अपनी पहचान के प्रति सजग रहते हुए आगे बढ़ने के लिए।

जय सोमनाथ!

(लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री, भारत सरकार है)