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ऑपरेशन सिंदूर: वह अवधारणा जिसने भारत की रणनीतिक भूमिका को पुनर्परिभाषित किया

— लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)

ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ केवल याद रखने की एक तिथि नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक सोच में एक मजबूत और निर्णायक बदलाव पर विचार करने का अवसर है। 7 मई 2026 की घटनाएं एक सफल सैन्य अभियान से कहीं अधिक थीं—इन घटनाओं ने राजनीतिक इच्छाशक्ति, सैन्य तैयारी, तकनीकी क्षमता और राष्ट्रीय संकल्प के समन्वय को रेखांकित किया। कई मायनों में, ऑपरेशन सिंदूर को जटिल, बहु-क्षेत्रीय परिदृश्य में भारत के भविष्य के संघर्ष संचालन के रूप में याद किया जाएगा।

इस सफलता के केंद्र में अटूट राजनीतिक स्पष्टता थी। दशकों तक, सीमा पार उकसावे की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया अक्सर स्व-निर्धारित संयम तक सीमित रहती थी। ऑपरेशन सिंदूर ने संयम को त्यागने के बजाय उसे परिष्कृत किया—इसने भारत की संवेदनशीलता के साथ शक्ति के प्रयोग की क्षमता को प्रदर्शित किया, सटीक रणनीतिक संदेश दिया और आवश्यकता पड़ने पर निर्णायक रूप से स्थिति के विस्तार की क्षमता को बनाए रखा। राजनीतिक नेतृत्व ने न केवल निर्णायक कार्रवाई के इरादे का प्रदर्शन किया, बल्कि सैन्य कमांडरों को संचालन में लचीलापन देने का आत्मविश्वास भी दिखाया। उद्देश्य की यह स्पष्टता गति, सटीकता और समन्वय में परिवर्तित हुई—ये तीन विशेषताएं आधुनिक सफल सैन्य अभियानों को परिभाषित करती हैं।

भारत की बहु-क्षेत्रीय क्षमताओं का निर्बाध एकीकरण भी उतना ही महत्वपूर्ण था। आधुनिक युद्ध अब केवल भूमि, समुद्र और वायु तक सीमित नहीं रहा; यह साइबर, अंतरिक्ष और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्रों तक विस्तृत हो चुका है। ऑपरेशन सिंदूर ने इन क्षेत्रों में प्रभाव पैदा करने की भारत की बढ़ती दक्षता को प्रदर्शित किया। सटीक हमलों में साइबर अभियानों ने पूरक भूमिका निभाई, जिससे विरोधी के संचार और लॉजिस्टिक तंत्र बाधित हुए। विशेष रूप से हमले के बाद नुकसान के आकलन में अंतरिक्ष-आधारित संसाधनों ने वास्तविक समय की निगरानी और लक्ष्य निर्धारण सुनिश्चित किया, जबकि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं ने दुश्मन की जवाबी कार्रवाई को कमजोर किया। यह अभियान संयुक्त संचालन क्षमता में परिपक्वता का प्रतीक था—सिर्फ तालमेल से आगे बढ़कर वास्तविक एकीकरण तक।

नागरिक-सैन्य एकीकरण की भूमिका पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य अभियान नहीं था; यह पूरे राष्ट्र का प्रयास था। खुफिया एजेंसियों, तकनीकी संस्थानों और नागरिक नेतृत्व ने सशस्त्र बलों के साथ समन्वय में कार्य किया। स्वदेशी तकनीकों—निगरानी प्रणालियों से लेकर सटीक हथियारों तक—ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो आत्मनिर्भरता में निरंतर निवेश के लाभों को दर्शाती हैं। इस अभियान ने भारत की निर्णय-निर्माण संरचना की दक्षता को भी प्रदर्शित किया, जहां अंतर-एजेंसी समन्वय नौकरशाही बाधाओं से प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि साझा उद्देश्य की भावना से प्रेरित रहा।

अभियान से पहले और उसके दौरान भारत की पहलों में रणनीतिक दूरदर्शिता स्पष्ट दिखाई दी। कूटनीतिक संचार ने यह सुनिश्चित किया कि भारत की कार्रवाइयों को वैश्विक स्तर पर सही संदर्भ में समझा जाए—सटीक, आवश्यक और संतुलित।

दूसरी ओर, पाकिस्तान की प्रतिक्रिया एक अनुमानित पैटर्न पर चली। सैन्य दृष्टि से, वह प्रभावी जवाब देने में संघर्ष करता रहा, जो क्षमता की कमी और आश्चर्य के तत्व दोनों से सीमित था। कूटनीतिक रूप से उसने स्थिति को अंतरराष्ट्रीय बनाने का प्रयास किया, लेकिन सीमित सफलता मिली। हालांकि, उसकी प्रतिक्रिया का सबसे स्पष्ट पहलू सूचना क्षेत्र में था, जहां वास्तविक स्थिति को छिपाने के लिए गलत जानकारी का प्रसार किया गया। फिर भी, विश्वसनीयता और निरंतरता की कमी के कारण ऐसे प्रयास जल्द ही उजागर हो गए।

इस भ्रामक प्रचार का स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ सामना करना आवश्यक है। ऑपरेशन सिंदूर आक्रामकता का प्रतीक नहीं था, बल्कि स्पष्ट उकसावे के प्रति संतुलित प्रतिक्रिया थी। इसके उद्देश्य सटीक थे, लक्ष्य वैध थे और क्रियान्वयन अनुशासित था। भारत की कार्रवाई ने अनुपातिकता और आवश्यकता के सिद्धांतों का पालन किया—जो संयम के मूल तत्व हैं। पारदर्शिता और विश्वसनीय संचार के माध्यम से भारत ने गलत कथाओं को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी किया।

ऑपरेशन सिंदूर से कई महत्वपूर्ण सबक सामने आए हैं। पहला, राजनीतिक इच्छाशक्ति की केंद्रीय भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता—रणनीतिक अस्पष्टता विरोधियों को प्रोत्साहित करती है, जबकि स्पष्टता उन्हें हतोत्साहित करती है। दूसरा, बहु-क्षेत्रीय एकीकरण का विकास निरंतर जारी रहना चाहिए, विशेषकर साइबर, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता में निवेश के माध्यम से। तीसरा, नागरिक-सैन्य समन्वय को और अधिक संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय शक्ति का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित हो सके।

सूचना युद्ध का क्षेत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। धारणा की लड़ाई निरंतर चलती रहती है। भारत को गलत सूचना की पहचान, उसका मुकाबला और पूर्व-नियोजन की अपनी क्षमताओं को मजबूत करना होगा। त्वरित और विश्वसनीय संचार के लिए तकनीकी और संस्थागत दोनों प्रकार के साधनों की आवश्यकता है।

यह अभियान रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता के महत्व को भी रेखांकित करता है। स्वदेशी प्रणालियों ने अपनी प्रभावशीलता सिद्ध की, जिससे बाहरी निर्भरता कम हुई और संचालन की स्वतंत्रता बढ़ी। अनुसंधान, विकास और नवाचार में निरंतर निवेश आवश्यक है, जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग महत्वपूर्ण होगा।

साथ ही, यह अभियान अस्थिर सुरक्षा वातावरण में निरंतर तैयार रहने की आवश्यकता को भी उजागर करता है। निरोधक क्षमता स्थिर नहीं होती; इसे प्रदर्शित क्षमता और दृढ़ संकल्प से बनाए रखना पड़ता है। ऑपरेशन सिंदूर ने एक मानक स्थापित किया है, जिसे बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण, आधुनिकीकरण और सिद्धांत विकास में निरंतर निवेश जरूरी है।

जब भारत इस अभियान की वर्षगांठ पर विचार करता है, तो संदेश स्पष्ट है—यह एक रणनीतिक प्रभाव वाला अभियान था। इसने दिखाया कि भारत के पास अपने हितों की रक्षा करने की क्षमता और इच्छाशक्ति दोनों हैं। इसने यह भी सिद्ध किया कि संयम एक विकल्प है—मजबूरी नहीं।

आने वाले वर्षों में, ऑपरेशन सिंदूर का अध्ययन बहु-क्षेत्रीय प्रभावी अभियानों के एक उदाहरण के रूप में किया जाएगा, जिसमें मजबूत राजनीतिक नेतृत्व और राष्ट्रीय एकता की भूमिका स्पष्ट है। इसने अपेक्षाओं को पुनर्परिभाषित किया है—देश के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने एक सरल लेकिन शक्तिशाली सिद्धांत को मजबूत किया है: जब राष्ट्रीय संकल्प और क्षमता का संगम होता है, तो परिणाम निर्णायक होते हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की विरासत इसकी तात्कालिक सफलता तक सीमित नहीं है। यह उस आत्मविश्वास में निहित है जो इसने उत्पन्न किया, उन सबकों में है जो इससे सीखे गए हैं, और उस दिशा में है जो इसने भारत के रणनीतिक भविष्य के लिए निर्धारित की है। आने वाले समय में विभिन्न रूपों में चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन जब तक देश की राजनीतिक, सैन्य और संस्थागत शक्तियां एकजुट होकर स्पष्ट उद्देश्य के साथ कार्य करती रहेंगी, तब तक संतुलन भारत के पक्ष में रहेगा।

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने जापान की मंत्री ओनोडा किमी से की मुलाकात

दिल्ली/सत्ता संदेश

जापान की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति मंत्री और अंतरिक्ष नीति राज्य मंत्री ओनोडा किमी ने एक उच्च स्तरीय आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह से मुलाकात की। इस बैठक में विभिन्न क्षेत्रों विशेष रूप से स्वास्थ्य और चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा की गई।

इस बैठक में जापान की चिकित्सा अनुसंधान एवं विकास एजेंसी (एएमईडी), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के बीच स्वास्थ्य और चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में एक सहयोग ज्ञापन (एमओसी) का आदान-प्रदान हुआ।

जापान के कैबिनेट कार्यालय और भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के बीच क्वांटम विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सहयोग के लिए एक आशय पत्र पर हस्ताक्षर किए गए, जो अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों में सहयोग के नए रास्ते खोलेगा।

यह जुड़ाव अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान यात्रा के परिणामों पर आधारित है, जहां दोनों पक्षों ने उद्योग और स्टार्टअप सहित विभिन्न क्षेत्रों में ‘भारत-जापान विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार साझेदारी’ के विस्तार पर सहमति व्यक्त की गई।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, ‘भारत और जापान के बीच विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक स्वाभाविक तालमेल साझा करते हैं। जहां जापान उन्नत प्रौद्योगिकीय क्षमताएं प्रदान करता है, वहीं भारत प्रतिभाशाली मानव संसाधनों का विशाल भंडार उपलब्ध कराता है। उन्होंने आगे कहा कि क्वांटम टेक्नोलॉजीज, साइबर-फिजिकल सिस्टम्स, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, स्‍वच्‍छ ऊर्जा और उन्‍नत कंप्यूटिंग में भारत के बढ़ते राष्ट्रीय मिशन देश के डीप-टेक सेक्टरों की ओर मजबूत रुझान को दर्शाते हैं, जिससे संयुक्त अनुसंधान, सह-विकास और औद्योगिक साझेदारी के नए अवसर पैदा होते हैं।

वहीं ओनोडा किमी ने भारत की तीव्र आर्थिक वृद्धि और नवाचार के प्रति इसकी मजबूत प्रतिबद्धता, विशेष रूप से विभिन्न क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को बड़े पैमाने पर अपनाए जाने की सराहना की। उन्होंने क्वांटम और एआई सहित उन्नत विनिर्माण और कम्प्यूटेशनल प्रौद्योगिकियों में जापान की मज़बूती भारत के बढ़ते प्रौद्योगिकी इकोसिस्‍टम के साथ घनिष्ठ रूप से मेल खाती है।

स्वास्थ्य अनुसंधान और चिकित्सा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दोनों पक्षों ने संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रमों, क्षमता निर्माण और संरचित वित्तपोषण व्यवस्थाओं के माध्यम से सहयोग बढ़ाने पर विचार-विमर्श किया। यह चर्चा हुई कि भारत और जापान में संबंधित वित्तपोषण एजेंसियों द्वारा सहयोगात्‍मक अनुसंधान परियोजनाओं को समर्थन दिया जा सकता है, साथ ही कार्यशालाओं और शोधकर्ता-स्तरीय सहभागिता जैसे संस्थागत तंत्रों के माध्यम से पारस्परिक हित के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है।

भारत-अल्जीरिया संयुक्त आयोग ने उद्घाटन बैठक में रक्षा सहयोग को और बढ़ाने पर सहमति जताई

नई दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत और अल्जीरिया के बीच बुधवार को नई दिल्ली में संयुक्त आयोग की पहली बैठक का आयोजन हुआ। बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने प्रशिक्षण, सैन्य अभ्यास, चिकित्सा सहयोग और रक्षा उद्योगों क्षेत्र में पारस्परिक हित के मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग गतिविधियों को और अधिक विस्तार देने पर सहमति व्यक्त की।

दोनों देशों ने भारत-अल्जीरिया रक्षा सहयोग के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए उत्‍तरदायी कार्यप्रणाली नियमों पर हस्ताक्षर किए, यह संयुक्त आयोग की बैठकों के लिए मार्गदर्शक प्रारूप के रूप में कार्य करेंगे। बैठक की सह-अध्यक्षता संयुक्त सचिव अमिताभ प्रसाद और अल्जीरिया की नौसेना के चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल कायद नूर एड्डिन ने की। भारतीय प्रतिनिधिमंडल में तीनों सेनाओं, मुख्यालय, एकीकृत रक्षा स्टाफ, रक्षा उत्पादन विभाग, डीआरडीओ, सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा और विदेश मंत्रालय के अधिकारी शामिल थे।

भारत और अल्जीरिया के बीच रक्षा संबंध 2024 में रक्षा समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद से निरंतर रूप से आगे बढ़ रहे हैं और दोनों पक्षों की उच्च स्तरीय यात्राओं से यह संबंध और मजबूत हो रहे हैं। अल्जीरिया के नौसेना प्रमुख की यह यात्रा भारत-अल्जीरिया रक्षा संबंधों में एक महत्वपूर्ण पहल है और पारस्परिक हित के क्षेत्रों में संयुक्‍त रूप से कार्य करने की दोनों पक्षों की प्रतिबद्धता को मजबूत करती है।

बैठक से पहले, मेजर जनरल कायद नूर एड्डिन ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। अल्जीरिया का प्रतिनिधिमंडल इस यात्रा के दौरान रक्षा उद्योगों के प्रतिनिधियों से भी वार्तालाप करेगा।

रॉयल नीदरलैंड्स नौसेना के उप-कमांडर और HNLMS डी. रूयटर का कोच्चि दौरा

नई दिल्ली/सत्ता संदेश

रॉयल नीदरलैंड्स नेवी शिप एचएनएलएमएस डी रूयटर (एफ804) 04 मई को कोच्चि पहुंचा। यह डी ज़ेवेन प्रोविंसियन-क्लास का युद्धपोत है।

इस जहाज का आगमन रॉयल नीदरलैंड्स नेवी के उप कमांडर मेजर जनरल रॉब डी विट और कोच्चि स्थित दक्षिणी नौसेना कमान में नीदरलैंड्स की राजदूत मारिसा गेरार्ड्स सहित एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के दौरे के समय में हुआ है।

कोच्चि बंदरगाह पहुंचने पर, एचएनएलएमएस डी रूयटर युद्धपोत को भारतीय नौसेना के फास्ट इंटरसेप्टर जहाज के अनुरक्षण में लाया गया और नौसेना बैंड के साथ औपचारिक स्वागत किया गया।

यह युद्धपोत वर्तमान में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में पांच महीने की तैनाती पर है और सहयोगी देशों के साथ यह विभिन्न समुद्री अभ्यासों में भाग लेगा। डीसीएन के नेतृत्व में नौसैनिक प्रतिनिधिमंडल के साथ-साथ नीदरलैंड के नौसैनिक युद्धपोत का भारतीय बंदरगाह पर पहुंचना दोनों देशों के बीच मजबूत और घनिष्ठ समुद्री संबंधों की दिशा में महत्वपूर्ण है। रॉयल नीदरलैंड नौसेना के डीसीएन ने इससे पहले फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम में आयोजित मिलान 26 के अंतर्गत आईओएस कॉन्क्लेव ऑफ चीफ्स कार्यक्रम में भाग लिया था।

नीदरलैंड के नौसेना प्रतिनिधिमंडल ने दक्षिणी नौसेना कमान के चीफ ऑफ स्टाफ रियर एडमिरल प्रकाश गोपालन से मुलाकात की। दोनों के बीच बातचीत में समुद्री क्षेत्र में पारस्परिक हित के मामलों को शामिल किया गया, जिसमें दोनों नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने के तरीके भी शामिल रहे।

नीदरलैंड्स के राष्ट्रीय स्मरण दिवस (04 मई) के अवसर पर एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए, मेजर जनरल रॉब डी विट और राजदूत मारिसा गेरार्ड्स ने एसएनसी युद्ध स्मारक पर माल्यार्पण कर किया शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

नीदरलैंड्स प्रतिनिधिमंडल प्रशिक्षण सहयोग बढ़ाने और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को साझा करने पर केंद्रित द्विपक्षीय बैठकों की एक श्रृंखला में भाग लेगा। प्रतिनिधिमंडल दक्षिणी नौसेना कमान के विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों का दौरा करेगा और उन्नत सिमुलेटरों तथा अत्याधुनिक प्रशिक्षण अवसंरचना के प्रदर्शन देखेगा। यह प्रतिनिधिमंडल भारत की जहाज निर्माण क्षमताओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने और औद्योगिक सहयोग के अवसरों का पता लगाने के लिए कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड का भी दौरा करेगा। दोनों नौसेना कर्मियों के बीच कई पेशेवराना और सामाजिक मेलजोल की भी योजना बनाई गई है।

कोच्चि से प्रस्थान करने पर, एचएनएलएमएस डी रुयटर भारतीय नौसेना के किसी जहाज के साथ पैसेज एक्सरसाइज (पासेक्स) में भाग लेगा, जिससे अंतरसंचालनीयता और परिचालन तालमेल को और मजबूत किया जा सकेगा।

चंडीगढ़ के युवाओं को पीएम इंटर्नशिप योजना के लिए आवेदन करने का आमंत्रण, मिलेगी आर्थिक सहायता

चंडीगढ़ /सत्ता संदेश

प्रतिष्ठित *प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना* के अंतर्गत 12वीं, आईटीआई, डिप्लोमा अथवा स्नातक उत्तीर्ण युवाओं के लिए विभिन्न इंटर्नशिप अवसर उपलब्ध हैं।

श्री विनय कुमार, जिला युवा अधिकारी, MY Bharat, युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारत सरकार ने जानकारी देते हुए बताया कि पात्र युवा MY Bharat पोर्टल पर स्वयं को पंजीकृत कर प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना हेतु आवेदन कर सकते हैं।

उन्होंने आगे बताया कि चंडीगढ़ में वर्तमान में विभिन्न इंटर्नशिप अवसर उपलब्ध हैं तथा चयनित अभ्यर्थियों को इंटर्नशिप अवधि के दौरान प्रतिमाह ₹9,000 की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

इच्छुक युवा निम्न वेबसाइट पर पंजीकरण एवं आवेदन कर सकते हैं:

http://www.mybharat.gov.in

आवेदन प्रक्रिया से संबंधित किसी भी जानकारी हेतु युवा जिला युवा अधिकारी से मोबाइल नंबर *9805832503* पर संपर्क कर सकते हैं अथवा MY Bharat कार्यालय, आरजीएनआईवाईडी भवन, PEC कैंपस, गेट नंबर 1, सेक्टर 12, चंडीगढ़ में संपर्क कर सकते हैं।

हमला, घेराबंदी, विजय: ऑपरेशन सिंदूर और वह सिद्धांत जिसे भारत ने 88 घंटों में गढ़ा

एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त)

6–7 मई 2025 की रात, भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया—यह 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 निर्दोष लोगों की जान चली गई थी, के जवाब में चलाया गया एक योजनाबद्ध और समयबद्ध सैन्य अभियान था। इसके बाद अगले 88 घंटों में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत के एक नए और पूरी तरह विकसित रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। यह सिद्धांत स्पष्ट उद्देश्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता, राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकजुटता से परिभाषित होता है।

ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच सैन्य टकराव के नियमों को फिर से परिभाषित किया और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आने वाले दशकों तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा दिशा तय करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पहली बार भारत ने ऐसे दुश्मन का सामना किया—और उसे परास्त किया—जो वस्तुतः एक ही मोर्चे पर दो देशों की संयुक्त शक्ति के रूप में सामने आया। चीन ने औपचारिक रूप से दूरी बनाए रखी, लेकिन उसने पाकिस्तान को सैटेलाइट खुफिया जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध समर्थन, साइबर सहायता और PL-15 जैसी ‘बियॉन्ड-विजुअल-रेंज’ (BVR) मिसाइलों सहित अग्रिम सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए। इसके बावजूद भारत ने इस संयुक्त चुनौती को हराया।

नियंत्रित युद्ध का सिद्धांत

आधुनिक संघर्षों की सबसे बड़ी विफलता—चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या पश्चिम एशिया के संघर्ष—यह रही है कि उनमें कोई स्पष्ट ‘एग्जिट स्ट्रेटेजी’ नहीं होती। लंबे खिंचने वाले युद्ध अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करते हैं, जन-मन को थका देते हैं और न तो स्पष्ट जीत दिलाते हैं और न ही स्थायी शांति। इसके विपरीत, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस जाल से खुद को बचाया और वह कर दिखाया जो बहुत कम आधुनिक सेनाएं कर पाती हैं—पहली मिसाइल दागने से पहले ही सफलता की परिभाषा तय करना।

भारत के उद्देश्य पूरी तरह स्पष्ट थे: आतंकी ढांचे और उन्हें संरक्षण देने वालों को नष्ट करना, दुश्मन को अधिकतम नुकसान पहुंचाना और अपनी शर्तों पर अभियान समाप्त करना—साथ ही नागरिकों को किसी भी प्रकार की क्षति से बचाना। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने खुफिया जानकारी के आधार पर नौ लक्ष्यों की पहचान की, जो लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी नेटवर्क से जुड़े थे। पहला हमला मात्र 23 मिनट में पूरा हुआ और पूरा अभियान 88 घंटों में समाप्त कर दिया गया। इसके बाद भारत ने दुश्मन को अपनी शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर किया।

यह सिद्धांत—स्पष्ट उद्देश्य के साथ प्रवेश करना, सटीकता के साथ कार्रवाई करना और बिना अनावश्यक विस्तार के बाहर निकलना—नियंत्रित युद्ध की एक दुर्लभ शैली है, जिसका अध्ययन आने वाले वर्षों में सैन्य संस्थानों में किया जाएगा।

दुश्मन के गढ़ में गहरी चोट

ऑपरेशन सिंदूर का भौगोलिक दायरा अभूतपूर्व था। भारत ने अपने हमले केवल पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर तक सीमित नहीं रखे, बल्कि पाकिस्तान के मुख्य भूभाग—विशेषकर पंजाब—के भीतर गहराई तक प्रहार किए। सियालकोट और बहावलपुर जैसे ठिकानों पर सटीक हमले किए गए, जो भारतीय सीमा से 140 किमी से भी अधिक दूर हैं।

बाद में रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और सरगोधा जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को भी भारत की मारक क्षमता के दायरे में लाया गया। संदेश स्पष्ट था: कोई भी ठिकाना पहुंच से बाहर नहीं है।

100 से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया, जिनमें IC-814 अपहरण से जुड़ा यूसुफ अजहर, अब्दुल मलिक रऊफ और पुलवामा हमले से जुड़ा मुदस्सिर अहमद शामिल थे। जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अजहर के परिवार के 10 सदस्य भी मारे गए। इन हमलों ने आतंकी संगठनों की कमांड संरचना को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया।

सबसे अहम बात यह रही कि इस अभियान ने ‘न्यूक्लियर ब्लैकमेल’ की अवधारणा को तोड़ दिया। दशकों से पाकिस्तान परमाणु छत्रछाया का उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए करता रहा था, इस धारणा के साथ कि भारत प्रतिक्रिया नहीं देगा। भारत ने इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

सीमापार अधिकतम क्षति, देश के भीतर न्यूनतम प्रभाव

जहां अधिकांश युद्धों का प्रभाव सीमाओं से बाहर फैलता है, वहीं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। भारत ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि अपने देश में इसका प्रभाव लगभग शून्य रहा।

भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की चीनी मूल की वायु रक्षा प्रणालियों को निष्क्रिय कर दिया। राफेल जेट, स्कैल्प क्रूज मिसाइल और हैमर प्रिसिजन बमों का इस्तेमाल करते हुए शुरुआती हमले 23 मिनट में पूरे किए गए।

9–10 मई को पाकिस्तान द्वारा जवाबी हमले के बाद भारत ने एक ही समय में 11 एयरबेस पर हमला किया—यह इतिहास में पहली बार था। इसमें पाकिस्तान की वायुसेना की लगभग 20% क्षमता नष्ट हो गई।

भारत की बहु-स्तरीय वायु रक्षा प्रणाली—जिसमें S-400, आकाश और MRSAM शामिल हैं—ने पाकिस्तान द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइलों को लगभग 100% सफलता के साथ नष्ट कर दिया। यहां तक कि 314 किमी दूर एक पाकिस्तानी AEW&C विमान को मार गिराया गया।

समन्वय, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण

इस अभियान की सफलता ‘JAI’—संयुक्तता, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण—पर आधारित थी। तीनों सेनाओं ने मिलकर बेहतरीन तालमेल के साथ काम किया। नौसेना ने अरब सागर में दबदबा बनाए रखा, वायुसेना ने सटीक हमले किए और थलसेना ने रक्षा को मजबूत किया।

भारत का रक्षा उत्पादन 2014-15 के ₹46,429 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में ₹1.54 लाख करोड़ हो गया, जिसमें 65% से अधिक उपकरण देश में ही बन रहे हैं। ब्रह्मोस, आकाश और अन्य स्वदेशी प्रणालियों ने निर्णायक भूमिका निभाई।

राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका

सैन्य शक्ति तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे मजबूत राजनीतिक नेतृत्व हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान की पूरी जिम्मेदारी ली और सेना को स्पष्ट निर्देश दिए: आतंकियों को निशाना बनाओ, लेकिन नागरिकों को नुकसान नहीं होना चाहिए।

सिंधु जल संधि को स्थगित करना और अन्य रणनीतिक फैसले इस व्यापक नीति का हिस्सा थे, जिससे पाकिस्तान पर दीर्घकालिक दबाव बना।

एकजुट राष्ट्र: ‘Whole-of-Nation’ दृष्टिकोण

यह अभियान केवल सैन्य नहीं था, बल्कि पूरे राष्ट्र का संयुक्त प्रयास था। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने उपग्रह निगरानी प्रदान की, जबकि अन्य एजेंसियों ने खुफिया समर्थन दिया।

नागरिक प्रशासन, उद्योग और स्टार्टअप्स ने भी योगदान दिया। सूचना युद्ध में भी भारत ने बढ़त बनाई और गलत सूचनाओं को तुरंत खारिज किया।

निष्कर्ष: एक नया मानक

‘ऑपरेशन सिंदूर’ सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक परिपक्व रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था। इसने दिखाया कि आत्मनिर्भरता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय एकता के साथ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्णायक जीत हासिल कर सकता है।

हालांकि, आगे की चुनौतियां बनी हुई हैं—फाइटर स्क्वाड्रन बढ़ाना, ड्रोन क्षमता मजबूत करना और रक्षा बजट को बढ़ाना आवश्यक होगा।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने एक नया मानक स्थापित किया है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि यह बढ़त बनी रहे—क्योंकि विरोधी भी सीख रहे हैं और स्थिर नहीं रहेंगे।

भारतीय स्वास्थ्य प्राधिकरण-इंडिया एआई मिशन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस : 8–9 मई को AB PM-JAY हैकाथॉन फिनाले

नई दिल्ली/सत्ता संदेश

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण 8-9 मई को बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के एवी रामाराव सभागार में एबी पीएम-जेएवाई ऑटो-एडजुडिकेशन हैकाथॉन के भव्य फिनाले और शोकेस का आयोजन करेगा। यह कार्यक्रम इंडियाएआई मिशन और आईआईएससी बेंगलुरु के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है।

देशव्यापी हैकाथॉन को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है, जिसमें आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से 3,500 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है। यह उत्साहपूर्ण भागीदारी भारत की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा प्रक्रियाओं की दक्षता बढ़ाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का लाभ उठाने में नवप्रवर्तकों, प्रौद्योगिकीविदों और शोधकर्ताओं की बढ़ती रुचि को रेखांकित करती है।

दो दिवसीय इस कार्यक्रम को आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य दावों के प्रबंधन के अगले चरण को आकार देने वाले अत्याधुनिक नवाचारों को प्रदर्शित करने के लिए एक गतिशील मंच के रूप में परिकल्पित किया गया है। फाइनलिस्ट टीमें उन्नत एआई/एमएल-आधारित समाधान प्रस्तुत करेंगी जो नैदानिक ​​दस्तावेज़ वर्गीकरण और एसटीजीएस के अनुपालन, रेडियोलॉजिकल छवि-आधारित सत्यापन और जाली या एआई-जनित चिकित्सा दस्तावेजों का पता लगाने जैसे महत्वपूर्ण समस्या क्षेत्रों को संबोधित करते हैं।

“दावों के निपटारे का भविष्य” शीर्षक से एबी पीएम-जेएवाई कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, अंतरसंचालनीय डिजिटल प्लेटफार्मों और डेटा-संचालित शासन ढांचे के एकीकरण के माध्यम से एक तेज, अधिक पारदर्शी और जवाबदेह दावा प्रणाली को कैसे सक्षम बनाया जाए इस विषय पर भी एक अन्य पैनल चर्चा की जाएगी।

लगभग 40,000 दावों का प्रतिदिन 1,900 से अधिक उपचार पैकेजों के तहत निपटान करने वाली एबी पीएम-जेएवाई विश्व स्तर पर सबसे बड़ी सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में से एक है और दावा प्रबंधन के लिए एआई-आधारित दृष्टिकोण अपनाने में अग्रणी है। हैकाथॉन शोकेस, एनएचए द्वारा चिकित्सा पैकेजों और विशिष्टताओं की एक विस्तृत श्रृंखला में स्वतः निर्णय लेने की क्षमताओं का विस्तार करने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

भारत–यूरोपीय संघ TTC के तहत EV बैटरी रीसाइक्लिंग के लिए 169 करोड़ की संयुक्त पहल

दिल्ली/सत्ता संदेश

भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (टीटीसी) के हरित एवं स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकी कार्य समूह-2 के ढांचे के अंतर्गत, भारत सरकार और यूरोपीय संघ ने 5 मई 2026 को इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) बैटरियों के पुनर्चक्रण पर केंद्रित तीसरे समन्वित प्रस्‍ताव आमंत्रण की घोषणा की। इसके लिए प्रस्ताव जमा करने की अंतिम तिथि 15 सितंबर 2026 है।

प्रस्ताव आमंत्रण पहल का उद्देश्य महत्वपूर्ण कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना, वैश्विक स्तर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव को गति देना और भारत तथा यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है। 15.2 मिलियन यूरो (लगभग 169 करोड़ रुपये) के संयुक्त वित्त पोषण के साथ, इस पहल को यूरोपीय संघ के होराइजन यूरोप कार्यक्रम के माध्यम से वित्त पोषित किया जाएगा, जबकि भारी उद्योग मंत्रालय (एमएचआई) भारतीय घटक का समर्थन करेगा।

यह कार्यक्रम भारत में भारत-यूरोपीय संघ की संयुक्त पायलट लाइन की स्थापना में भी सहयोग करेगा, जिससे वास्तविक स्तर पर सत्यापन और औद्योगिक तैनाती संभव हो सकेगी और अग्रणी शोधकर्ताओं, उद्योगों तथा स्टार्टअप्स को एक साथ लाया जा सकेगा। प्रस्ताव आमंत्रित करने की प्रक्रिया में उच्च पुनर्प्राप्ति दर; मिश्रित रसायन प्रबंधन; लॉजिस्टिक्‍स एवं समावेशन और लिथियम, ग्रेफाइट एवं कोबाल्ट जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के लिए सुरक्षा तथा द्वितीयक जीवन पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

इन प्रस्तावों की शुरुआत के अवसर पर, भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर अजय कुमार सूद ने कहा कि यह शुरुआत भारत-यूरोपीय संघ की रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। भारत के इलेक्ट्रिक वाहन बाजार के तेजी से विस्तार के साथ, एक मजबूत घरेलू पुनर्चक्रण प्रणाली का निर्माण हमारी संसाधन सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं के लिए आवश्यक है।

भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत हर्वे डेल्फ़िन ने हरित परिवर्तन के मूल में स्थित बैटरियों के महत्व पर प्रकाश डाला। इसका लक्ष्य विकास चरण से नवाचारों को वास्तविक दुनिया में लागू करना है; जिससे खनिज सुरक्षा और साझा जलवायु लक्ष्यों में प्रत्यक्ष निवेश हो सके।

प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय के वैज्ञानिक सचिव डॉ . परविंदर मैनी ने बताया कि यह संयुक्त पहल भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण कदम है और एक डिजिटल, समावेशी लॉजिस्टिक्स मॉडल को आगे बढ़ाने के लिए गति प्रदान करती है। यह अनौपचारिक क्षेत्र को एकीकृत करता है और साथ ही साथ द्वितीय-जीवन अनुप्रयोगों के लिए उच्चतम सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करता है।

यूरोपीय आयोग के अनुसंधान और नवाचार महानिदेशालय (आरटीडी) के महानिदेशक मार्क लेमैत्रे ने हरित नवाचार के क्षेत्र में यूरोपीय संघ और भारत के बीच मजबूत होते संबंधों तथा एक सुदृढ़, अंतर-महाद्वीपीय मूल्य श्रृंखला के सह-निर्माण पर जोर दिया। इससे यह सुनिश्चित होगा कि भविष्य की रणनीतिक सामग्रियां हमारी अर्थव्यवस्थाओं के भीतर ही रहें।

पंजाब में हफ्तेभर में तीन धमाके: CM मान ने BJP पर लगाया साजिश का आरोप; विपक्ष बोला- ‘कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त’

लुधियाना/अमृतसर: पंजाब में पिछले एक हफ्ते के दौरान शंभू रेलवे लाइन, जालंधर और अब अमृतसर में मिलिट्री कैंप के पास हुए लगातार तीन धमाकों ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं को लेकर मुख्यमंत्री भगवंत मान और विपक्षी दलों के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है।

CM मान का आरोप: “चुनाव से पहले धमाके करवाना BJP का स्टाइल” मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इन धमाकों के लिए सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने श्री आनंदपुर साहिब में कहा कि चुनाव से पहले हिंसा फैलाकर लोगों को डराना और वोट लेना भाजपा का तरीका है। मान ने चेतावनी देते हुए कहा कि पंजाब एक शांत राज्य है और भाजपा अपनी ऐसी हरकतों से बाज आए क्योंकि पंजाबियों के जख्म अभी भी हरे हैं।

केंद्रीय मंत्री और विपक्ष का पलटवार : केंद्रीय मंत्री रवनित सिंह बिट्टू ने मान सरकार को घेरते हुए कहा कि राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल हो चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इन घटनाओं को रोकने के बजाय उन्हें ‘कवर-अप’ (दबाने) करने की कोशिश कर रही है। बिट्टू ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट बताते हुए कहा कि अपराधियों में पुलिस का कोई खौफ नहीं रह गया है।

अकाली दल: बिक्रम सिंह मजीठिया ने कहा कि खासा (अमृतसर) धमाके के CCTV फुटेज ने सरकार के सुरक्षा दावों की पोल खोल दी है। उन्होंने कहा कि जालंधर विस्फोट को पहले ‘स्कूटी में आग’ बताकर दबाने की कोशिश की गई थी।

कांग्रेस: प्रदेश अध्यक्ष राजा वड़िंग और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने मुख्यमंत्री के बयान को ‘बेहूदा’ और अपनी विफलता स्वीकार करना बताया। रंधावा ने सवाल किया कि अगर CM भाजपा को जिम्मेदार मान रहे हैं, तो क्या वे एफआईआर में केंद्र सरकार का नाम दर्ज करेंगे?

भाजपा: भाजपा नेता फतेहजंग बाजवा ने मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि वे खुद को मुख्यमंत्री के बजाय विपक्ष का नेता मान रहे हैं और अपनी नाकामी छुपाने के लिए बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं।

IPL 2026 प्लेऑफ का शेड्यूल जारी: धर्मशाला में होगा पहला मुकाबला, अहमदाबाद में सजेगा फाइनल का मंच

स्पोर्टस डेस्क : भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) 2026 के प्लेऑफ मुकाबलों के कार्यक्रम की आधिकारिक घोषणा कर दी है। 70 रोमांचक लीग मैचों के समापन के बाद अब टूर्नामेंट अपने निर्णायक दौर में पहुँच गया है, जहाँ हर मुकाबला टीमों के लिए खिताबी जीत की राह तय करेगा।

धर्मशाला और चंडीगढ़ में होंगे अहम मुकाबले: प्लेऑफ की शुरुआत 26 मई को धर्मशाला के एचपीसीए (HPCA) स्टेडियम में क्वालिफायर-1 के साथ होगी। इस मैच में अंक तालिका की टॉप-2 टीमें फाइनल में जगह बनाने के लिए भिड़ेंगी। इसके बाद कारवां चंडीगढ़ की ओर मुड़ेगा:

एलिमिनेटर: 27 मई को न्यू चंडीगढ़ में तीसरे और चौथे स्थान की टीमों के बीच ‘करो या मरो’ का मुकाबला खेला जाएगा।

क्वालिफायर-2: 29 मई को न्यू चंडीगढ़ में ही क्वालिफायर-1 की हारने वाली टीम और एलिमिनेटर की विजेता टीम के बीच भिड़ंत होगी, जिससे दूसरी फाइनलिस्ट टीम का फैसला होगा।

अहमदाबाद में होगा ग्रैंड फिनाले: टूर्नामेंट का सबसे बड़ा और अंतिम मुकाबला यानी फाइनल 31 मई को दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम, अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में आयोजित किया जाएगा। यहीं आईपीएल 2026 के नए चैंपियन का फैसला होगा।

बेंगलुरु से क्यों छीना फाइनल का मौका? पहले आईपीएल का फाइनल मुकाबला बेंगलुरु में आयोजित होना तय था। हालांकि, बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने स्पष्ट किया कि कुछ विशेष ऑपरेशनल और लॉजिस्टिक कारणों के चलते वेन्यू में बदलाव करना पड़ा।

सूत्रों के अनुसार, स्थानीय एसोसिएशन और प्रशासन की कुछ शर्तें बीसीसीआई के तय प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं थीं, जिसके कारण बोर्ड ने फाइनल को अहमदाबाद शिफ्ट करने का फैसला लिया।